जिन खोजा तिन पाइयां

इस ब्लॉग में विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं के उत्तर देने की कोशिश की जाएगी। हिन्दी साहित्य से जुड़े कोर्सेस पर यहाँ टिप्पणियाँ होंगी,चर्चा हो सकेगी।

Tuesday, 20 March 2012

Department of Hindi
Semester based Credit system Course
Semester-4
From June 2011
HIN 507 हिन्दी भाषा प्रशिक्षण एवं कोश विज्ञान   Course Credit -4
यहाँ इस कोर्स से संबंधित कुछ प्रश्न दिए जा रहे हैं। इस बीच यह सवाल सभी के मन में रहा कि आखिर इसमें प्रश्न कैसे पूछे जा सकते हैं। कई केन्द्रों के छात्रों के मन में यह प्रश्न भी था कि इसे ठीक तरह से पढ़ाया नहीं गया है। यह स्वाभाविक है, क्योंकि यह नितांत नया पाठ्यक्रम है और इसे स विश्वविद्यालय में प्रथम बार ही संकल्पित किया गया है और लागू भी किया गया है।  संभवतः इन प्रश्नों के आधार पर समस्या का निराकरण हो सकेगा। इस बात को ध्यान में रखा जाए कि यह कोर्स विद्यार्थी की भाषा संबंधी, भाषा के प्रयोग संबंधी समझ से जुड़ा है। आज आप हिन्दी पढ़ कर कहीं नौकरी करने जाएंगे तो अगर आप की भाषा ठीक नहीं होगी तो आपके लिए कठिनाई बढ़ेगी। आपका पिछला और वर्तमान कोर्स इसी बात की ओर संकेत करता है। भाषा को रचना के स्तर पर जानना और उसका प्रयोग करना, यही इसका उद्देश्य है। यहाँ आपकी सहायता के लिए कुछ प्रश्न दिए जा रहे हैं ताकि आप इस बात का अंदाज़ा लग सकें कि अभी आपको किस दिशा में अधिक आगे बढ़ने की आवश्यकता है। इस बात का ध्यान रखें की यह केवल पाठ्यक्रम की दिशा सूचक जानकारी है। प्रश्न का स्वरूप बिल्कुल ऐसा ही होगा, यह ज़रूरी नहीं है।
इस कोर्स के प्रथम दो यूनिट के प्रश्न भी बाद की पोस्ट में डाले जाएंगे। अभी यूनिट 3,4 तथा 5 संबंधी जानकारी आपके लिए डाली जा रही है।

यूनिट -3 निबंध लेखन
·         निबंध की भाषा

1.      कथात्मक स्वरूपों की अपेक्षा निबंध में भाषा का महत्व क्या है?
2.      निबंध की वस्तु (विषय) भाषा के माध्यम से किस तरह विकसित होती है?
3.      तत्सम प्रधान भाषा किस तरह के निबंधों में प्रयुक्त होती है। उदाहरण के माध्यम से समझाएं?
4.      बालकृष्ण भट्ट अथवा अपनी पसंद के किसी अन्य निबंधकार की भाषागत विशेषताएं लिखिए।
5.      तद्भव भाषा अथवा बोलचाल की सामान्य भाषा में लिखे निबंधों की विशेषताएं बताइए।
6.      नारी अथवा स्त्री निबंध की भाषा में निहित अंतर समझाएं।
7.      अपने पढ़े किसी भी निबंध के आधार पर सामासिक भाषा तथा सरल भाषा के उदाहरण दें।
8.      विज्ञापन युग निबंध की भाषा पर प्रकाश डालें।
9.      हिन्दी का महत्व नामक विषय पर बोलचाल की अथवा तत्सम प्रधान भाषा में निबंध लिखें।
10.  अगर गद्य कविता की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है- इस विधान को समझाएं।
11.  (406 वाले कोर्स के निबंधों को आधार बना कर भी प्रश्न पूछे जा सकते हैं।)


·         निबंध की शैली

1.      निबंध के स्वरूप में शैली का संबंध लेखक के व्यक्तित्व के साथ किस तरह जुड़ा है- उदाहरण दे कर समझाएं।
2.      शैली निबंध का प्राण है- इस कथन पर अपने विचार लिखें।
3.      निबंध की विभिन्न शैलियों पर प्रश्न पूछे जा सकते हैं। जैसे वर्णनात्मक, विवरणात्मक, सामासिक आदि।
4.      निबंध के स्वरूप में शैली का संबंध किन किन तत्वों से जुड़ा है, समझाएं।

Ø  1 अंक के प्रश्न
1.      शैली के लिए प्रयुक्त अन्य समानार्थी शब्दों के नाम लिखें।
2.      (इसमें कुछ उदाहरण दे कर यह पूछा जा सकता है कि शैली कौन सी है अथवा भाषा किस प्रकार की है। ये उदाहरण प्रसिद्ध रचनाओं में से लिए जाएंगे। अथवा 406 में जो आप पढ़ चुके हैं उसमें से पूछा जा सकता है।
·         विभिन्न प्रकार के निबंधों में प्रयुक्त भाषा का पाठ
1.      इसमें कुछ प्रसिद्ध निबंधों के उदाहरण दे कर  उनके भाषा पाठों के संदर्भ में प्रश्न पूछे जा सकते हैं। परीक्षार्थी से अपेक्षित यह है कि उसे भाषा पाठों के बारे में जानकारी होनी चाहिए।

Ø  इसमें आपको बाकायदा निबंधात्मक लेखन करना होगा।(200 शब्दों में)। इसमें आपने अब तक जो पढ़ा है, उसी को आधार बना कर पूछा जा सकता है। इस संदर्भ में ब्लॉग में जानकारी दी है।
1)      
1.      कोश- निर्माण
·         विभिन्न प्रकार के कोशों का परिचय, महत्व एवं उपयोगिता
·         हिन्दी कोशों का परिचय
·         कोश निर्माण के सिद्धांत
·         कोश निर्माण में आने वाली बाधाएं
 इसमें  जिस प्रकार के प्रश्न आ सकते हैं वह स्वतः स्पष्ट हैं अतः अधिक बताने की आवश्यकता नहीं है।


Thursday, 15 March 2012


HIN 509/Unit-5
(2)


अनुवाद और उत्तर-आधुनिकता के संदर्भ में हमने कल क्लास में कुछ बातें समझीं थी। हमने इस बात को जानने का प्रयत्न किया था कि उत्तर आधुनिता के आने पर एक भाषा में लिखा हुआ पाठ जब दूसरी भाषा में जाता है, तब वह एर स्वतंत्र रचना पाठ हो जाता है। हमने इस बात को भी समझा था कि उत्तर आधुनिकता के आने के बाद अनुवाद को देखने का लोगों का नज़रिया बदला । अब वह रचना के बराबर दर्ज़े का समझा जाने लगा है। अनुवाद करना अब दोयम दर्जे का काम नहीं रहा। इसका करारण यह है कि अनुवाद करते समय हम स्रोत पाठ की व्याकरणिक व्यवस्था ही नहीं अपितु एस.एल( सोर्स टैक्स्ट, स्रोत पाठ) में रही सामाजिकता, सांस्कृतिकता,एवं राजनैतिक पक्ष भी टी.एल( टार्जेट टेक्स्ट- लक्ष्य पाठ) में स्थानातरित करते हैं। हमने इस बात की भी चर्चा की थी कि पहले केवल अनुवाद कार्य होता था फिर जब उसके सैद्धांतिक पक्ष की चर्चा होने लगी – मसलन परिभाषा अनुवाद स्वरूप अनुवाद कला-विज्ञान-कौशल अनुवाद की प्रक्रिया, मूल्यांकन आदि तो एक शब्द आया- Translatology( अनुवाद-विज्ञान)। अर्थात् अनुवाद पहले एक कार्य था फिर जब उसता शास्त्र बनने लगा तो अनुवाद विज्ञान की संकल्पना आई। उत्तर आधुनिकता के आने के बाद ही हम अनुवाद-अध्ययन जैसे शब्द की चर्चा करने लगे। अर्थात् एक वाक्य में इसे कहें तो
अनुवाद का कार्य प्राचीन समय से होता आया है जब उसका शास्त्र निर्मित हुआ तो वह अनुवाद-विज्ञान हुआ और उत्तर आधुनिकता के बाद वह अनुवाद –अद्ययन हुआ। यानी कि पहला सूत्र हमने यह जाना
अनुवाद            अनुवाद-विज्ञान          अनुवाद-अध्ययन
(कार्य              मिद्धांत                विमर्श)
आज हम इसी संदर्भ में एक और बात समझने का प्रयत्न करेंगे।
आज हमारे समझने का सूत्र होगा-
पाठ               अन्तर्पाठ              हायपर पाठ
(text                                                inter-text                            hyper text)
इस सूत्र को समझने के लिए कुछ पीछे चलें। हमने मेमिस्टर-2 में विखंडनवाद पढ़ा था। लगभग सभी ने इस बात को समझ लिया है ( या क्-से-कम लिखा ते था ही) कि विखंडन पाठ की एक शैली है।
सबसे पहले पाठ शब्द की ओर अपना ध्यान दें। अनुवाद विज्ञान में सबसे पहले दो शब्दों से हमारा सामना हुआ- स्रोत पाठ तथा लक्ष्य पाठ। इस पर से हमने यह समझा कि सेरोत भाषा में लिखा हुआ कुछ भी पाठ कहलाता है चाहे वह एक वाक्य हो अथवा महाकाव्य हो। यानी जिसका अनुवाद किया जाता है और जो अनूदित होता है वह सब कुछ पाठ होता है।
अनुवाद अध्ययन में
                  लिखी हुई हर चीज़ पाठ(text) है।
                                             पढ़ने की शैली को पाठ कहते हैं।
हर पाठ में                 अन्तर्पाठीयता होती है।
Ø  अन्त्रपाठीयता का अर्थ है कि हर पाठ आपको किसी अन्य पाठ की ओर ले जाता है।
Ø  जैसे तुलसीदास के रामचरित मानस में वाल्मिकी के रामायण का पाठ छिपा है।
Ø  नदी के द्वीप में मृच्छकटिक तथा बाणभट्ट की आत्मकथा का पाठ छिपा है।
Ø  गोदान में भारतीय सामन्ती व्यवस्था, दलित विमर्श तथा स्त्री विमर्श का पाठ छिपा है।
अर्थात्
           एक कृति को पढ़ते हुए हमें अन्य कृतियों के पाठ का स्रण होता है।
           अथवा
    अन्य सामाजिक तथा सांस्कृतिक पाठ छिपे होते हैं जिनका हमें उस पाठ को पढ़ते संय स्मरण होता है। जैसाकि हमने पिछली क्लास में पढ़ा था कि अनुवाद में हं केवल भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था का ही पुनः स्थापन नहीं करते बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक पाठ का भी पुनः स्थापन करते हैं।
    अब हम अन्तर्पाठीयता से हायपर टैकेस्ट की ओर आते हैं। आपने ही कल मुझे पिछली क्लास में बताय था कि उत्र आदुनिकता से एक अर्थ यह समझ में आता है कि इसका संबंध सूचना प्रौद्योगिकी से भी जुड़ता है। यानी सूचना प्रौद्योगिकी उत्तर आधुनिकता का एक लक्षण है। तो इसका अर्थ यह लेंगे कि सूचना प्रौद्योगिकी संबंध का इंटरनैट है। हायपर टेक्स्ट का संबंध इसी भाषा प्रौद्योगिकी से है, यानी आपके इंटरनैट से भी है। आप इसे इस तरह समझते हैं।
आपने सेमिस्टर-3 में नेट तथा हिन्दी कंप्यूटिंग पढ़ा था। आपने यूनिकोड़ के अन्त्रगत यह समझा था कि कंप्यूटर की अपनी कोई भाषा नहीं होती। (यानी हिन्दी, गुजराती, अंग्रेज़ी आदि)  आप अपने कंप्यूटर पर कोई अक्षर लिखते हैं- मसलन र या R । कंप्यूटर उसे बाइनरी डिजिट में समझता है। वह आपके लिखे को अपनी भाषा में लिखता है। जैसे नीचे दो चित्र दिए गए हैं। चित्र-1 गूगल के सर्च इंजन का मुख पृ।ठ है। उसे कंप्यूटर ने जिस तरह पढ़ा है उसे चित्र -2 में दिया गया है।( यह असल में बहुत अधिक विस्तृत है।)
(चित्र-1)
India


Google.co.in offered in: Hindi Bengali Telugu Marathi Tamil Gujarati Kannada Malayalam Punjabi
(इसमें गूगल का चित्र प्रतिलिपित नहीं हुआ है।

    ( चित्र-2)
<!doctype html><html itemscope itemtype="http://schema.org/WebPage"><head><meta http-equiv="content-type" content="text/html; charset=UTF-8"><meta itemprop="image" content="/images/google_favicon_128.png"><title>Google</title><script>window.google={kEI:"XFxhT_fbHsP4rQfZ98SCBA",getEI:function(a){var d;while(a&&!(a.getAttribute&&(d=a.getAttribute("eid"))))a=a.parentNode;return d||google.kEI},https:function(){return window.location.protocol=="https:"},kEXPI:"17259,23756,24878,27400,31701,35703,36683,36888,37003,37102,37153,37453,37568",kCSI:{e:"17259,23756,24878,27400,31701,35703,36683,36888,37003,37102,37153,37453,37568",ei:"XFxhT_fbHsP4rQfZ98SCBA"},authuser:0,
ml:function(){},pageState:"#",kHL:"en",time:function(){return(new Date).getTime()},log:function(a,d,f,h){var e=new Image,g=google,k=g.lc,i=g.li,m="";e.onerror=(e.onload=(e.onabort=function(){delete k[i]}));k[i]=e;if(!f&&d.search("&ei=")==-1)m="&ei="+google.getEI(h);var j=f||"/gen_204?atyp=i&ct="+a+"&cad="+d+m+"&zx="+google.time(),b=/^http:/i;if(b.test(j)&&google.https()){google.ml(new Error("GLMM"),false,{src:j});
delete k[i];return}e.src=j;g.li=i+1},lc:[],li:0,j:{en:1,l:function(){google.fl=true},e:function(){

(यह बहुत विस्तृत है जिसका एक छोटा-सा अंश यहाँ दिया गया है)
   
अर्थात्
    हम जो लिखते हैं उसे कंप्यूटर अलग ढंग  पढ़ता है। अपने ढंग से लिखता है। उसके पाठ की दृश्यात्मकता तथा हमारे पाठ की दृश्यात्मकता में अंतर है। इसी को मूलतः हापर जैक्स्ट कहते है। मोटे तौर पर कंप्यूटर पर लिखा कुछ भी हायपर टैक्स्ट होता है। इसका मतलब यह हुआ कि कंप्यूटर हमारे पाठ को अपनी अभिव्यक्ति पद्धति (भाषा) में हम तर संप्रेषित करता है। बिना अर्थ को परिवर्तित किए। हमारा पाठ कंप्यूटर अपनी तरह पढ़ता है। हायपर टैक्स्ट की दृश्यात्मकता स्क्रीन पर की दृश्यात्मकता से अलग दिखती है पर है वह वही।
अनुवाद में हम क्या करते हैं ?
बिना अर्थ बदले स्रोत पाठ को अपनी अभिव्यक्ति पद्धति (भाषा) में स्थानातरित करते हैं।
यही अनुवाद की उत्तर आधुनिक तकनीकी समझ है।
लेकिन हमारी बात अबी अधूरी है।शेष अगली पोस्ट में।

HIN509-अनुवाद में उत्तर आधुनिकता
(1)
"अनुवाद में उत्तर-आधुनिकता" हमारे HIN509 कोर्स का पाँचवा यूनिट है। अनुवाद और उत्तर आधुनिकता की चर्चा कोई नई नहीं है। उत्तर आधुनिकता का प्रभाव जिस तरह साहित्य पर पड़ा उसी तरह अनुवाद पर भी पड़ा। इसकी चर्चा करने के पूर्व हम इसकी एक भूमिका समझ लें।
जेम्स होम्स ने 1972 में 'दू नेम एंड नेचर ऑफ ट्रांस्लेशन स्टडीज' में जैसे अनुवाद अध्ययन की शुरुवात का घोषणा-पत्र जारी कर दिया। अगर इस वर्ष को आधार मानें तो यह कहना पडेगा कि कि अभी अनुवाद अध्ययन को पूरे पचास वर्ष भी नहीं हुए हैं। अभी यह विद्या शाखा अपने बचपन या किशोर अवस्था में ही है। परन्तु तेज गति से दौड़ते इस समय को देखते हुए ज्ञान शाखाएं बहुत जल्दी और तेज़ी से बड़ी हो रही हैं अतः हम कह सकते हैं कि इस विद्या शाखा का यह फुल्ल-यौवन काल है।
अनुवाद संबंधी हमारी समझ को हम तीन हिस्सों में बाँट सकते हैं
1-       

अनुवाद कार्य (यह अनुवाद से जुड़ा सबसे प्राचीन स्वरूप है।
2-       अनुवाद सिद्धांत-( Translatology)
3-       अनुवाद अध्ययन-1972 से (Translation Studies)
अनुवाद अध्ययन का संबंध उसके उत्पादन तथा उसके वर्णन से भी संबंद्ध है। एक ऐसे सिद्धांत की खोज जो अनुवाद उत्पादन के लिए भी भी मार्ग दर्शिका रहे। अतः अनुवाद अध्ययन के दो भाग किए जा सकते हैं-
1-      शुद्ध अनुवाद अध्ययन जिसमें सैद्धांतिक तथा वर्णात्मक अनुवाद अध्ययन तथा
2-प्रायोगिक अनुवाद अध्ययन
Ø  शुद्ध अनुवाद अध्ययन के अन्तर्गत सैद्धांतिक में इन बातों को शामिल किया जा सकता है-
1. सामान्य अनुवाद अध्ययन तथा     2. आंशिक अनुवाद अध्ययन
·         आंशिक अनुवाद के अतर्गत निम्नलिखित  मुद्दों का समावेश संभव है-
a) माध्यम द्वारा मर्यादित
b) क्षेत्र द्वारा मर्यादित
c) रैंक द्वारा मर्यादित
d) पाठ द्वारा मर्यादित
e) समय द्वारा मर्यादित
f) समस्या द्वारा मर्यादित

·         (2) शुद्ध अनुवाद अध्ययन के अन्तर्गत वर्णनात्मक अनुवाद अध्ययन में इन बातों का समावेश  संभव है


a)  उत्पाद आधारित-     जिसमें पहले से ही अनूदित प्राप्त अनुवाद की चर्चा हो


b)  प्रक्रिया आधारित-     जिसमें प्रक्रिया दौरान होने वाले मानसिक प्रक्रियाओं की बात हो।


c)  प्रकार्य आधारित- जिसमें इस बात का अध्ययन हो कि लक्ष्य भाषा की संस्कृति में इन अनुवादों का क्या असर पड़ सकता है या अनुवाद की क्या भूमिका हो सकती।


Ø  अनुवाद के प्रायोगिक पक्ष का संबंध अनुवाद प्रशिक्षण, अनुवाद उपकरण तथा अनुवाद समीक्षा से संबंधित है।


आज अनुवाद के उत्तर आधुनिक संदर्भ के साथ-साथ उसके उत्तर-औपनिवेशिक संदर्भ को भी देखा जा रहा है, अतः एक महत्व का प्रश्न यह भी उठता है कि पश्चिमी जगत ने जो अनुवाद की समझ, संकल्पना तथा सिद्धांत दिए हैं, क्या हम अपने अनुवादों के परिप्रेक्ष्य में उन्हे अपने तरीके से नहीं देख सकते।

इस भूमिका के बाद जब हम अनुवाद के उत्तर आधुनिक स्वरूप की बात करते हैं तो भाषा प्रौद्योगिकी , संगणक, बाज़ार, विज्ञापन आदि की बात तो करते ही हैं पर साथ ही परिधि पर स्थित , अलक्षित को लक्षित करने की भी बात है। चाहे 1972 के पहले की बात करें या फिर उसके की बात हो , अनुवाद हमेशा दोयम दर्ज़े पर रहा है। परन्तु वाल्टर बेंजामिन और उनसे भी अधिक जाक देरिदा के बाद अनुवाद को देखने का नज़रिया बदल जाता है। पहले साहित्य केन्द्र में था अनुवाद हाशिए पर  था। वह मूल का पिछलग्गू था। लेकिन उत्तर-आधुनिकता के आने के बाद अनुवाद का स्थान बदल गया।

अनुवाद का मुख्य उद्देश्य संप्रेषण है- भावों, विचारों तथा भाषा सौन्दर्य का संप्रेषण। भाव तथा विचार की अभिव्यक्ति भाषा के माध्यम से होती है। भाषा में शब्द होते हैं और शब्दों के अर्थ होते हैं। उत्तर-आधुनिकता में प्रवेश करने का एक रास्ता यह भी रहा कि शब्द तथा अर्थ के संदर्भ में समझ बदली। अर्थ स्थिर नहीं होते। अर्थ संदर्भ के अनुसार तय होते हैं। वे अनिश्चित होते हैं, अनंत होते हैं। अतः स्रोत पाठ के किसी भी शब्द का कोई एक निश्चित अर्थ होता नहीं हैं। अतः यह तय कर पाना कि कौन-सा अर्थ लिया जाए यह बहुत मुश्किल होता है।
पहले अनुवाद का संबंध भाषा विज्ञान से ही था। व्याकरण से था। उत्तर आधुनिक समय में आ कर अनुवाद का संबंध राजनीति, समाज-शास्त्र, संस्कृति अध्ययन तथा विचारधारा से जुड़ गया।
जब हम कहते हैं हैं कि अनुवाद में एक पाठ दूसरे पाठ में, एक भाषा से दूसरी भाषा में स्थानांतरित होता है तो केवल एक भाषा व्यवस्था को दूसरी भाषा व्यवस्था में ही नहीं ले जाते बल्कि एक समाज को दसरे समाज में, एक संस्कृति को दूसरी संस्कृति को स्थानांतरित करते हैं, रूपांतरित करते हैं।
अनुवाद अध्ययन के संदर्भ में कुल तीन पोस्ट मैं भेजूंगी। इस संदर्भ में आप अफने सवाल भी भेज सकते हैं।



Monday, 13 February 2012

विद्यार्थी मित्रो,
इस ब्लॉग की बायीं ओर एक नया गेजेट मैंने जोड़ा है। हिन्दी समय। जिस तरह आप समालोचन में जा कर कई सारे नए मुद्दों को देख सकते हैं, उसी तरह इस गेजेट पर जा कर आपको हिन्दी संबंधी नई जानकारियाँ मिलेंगी। यह अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्द्धा की वेब-साईट है। मैं चाहूँगी आप इसे अवश्य देखें। आपको हिन्दी से जुड़ी विपुल जानकारियाँ मिलेंगी। यहाँ तक कि अगर आप एम. ए. के बाद वहाँ जा कर पढ़ना चाहते हैं,  तो आप उस विश्वविद्यालय के अनेक कोर्सेस से परिचित होंगे। इसमें छबियाँ हैं, फिल्में हैं, कई पुस्तकें ई-स्वरूप में भी हैं। इसे देख कर मुझे तो लगा कि भविष्य में हम भी गुजरात युनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग की एक ऐसी वेब-साईट बना सकेंगे।

Tuesday, 7 February 2012

सुरेखा बहन,
आपने लिखा है कि आप बाह्य छात्रा हैं। आप कुछ पूछना चाहती थीं। मैं जो जानती हूँ, आपको अवश्य बताऊंगी, अगर वह मेरे लिए संभव हो तो। आपको इस ब्लॉग से नई दिशा मिली, यह अच्छी बात है। आप हिन्दी कंप्यूटिंग की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, यह उत्साहवर्द्धक  बात है। पर आपका काम केवल ब्लॉग से नहीं होगा। आपको पढ़ना भी पड़ेगा। यह आपसे मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि आप ही की तरह और विद्यार्थी भी होंगे। यह उनके लिए भी है। 
लगता है आपका प्रश्न अधूरा है अभी। आपने कौन-सी पोस्ट पढ़ी है। 
रंजना अरगडे

पिछली पोस्ट से जारी ( HIN507 )
आपने पिछली पोस्ट पढ़ी होगी और आपको यह बात समझ में आ गयी  होगी कि इस प्रकार के सर्जनात्मक लेखन में टार्गेट ऑडियन्स का कितना महत्व है। अब एक काम आप कर सकते हैं। किसी भी परिचित कृति को आधार बना कर निबंधात्मक विवरण लिखने का प्रयत्न करें। सबसे अधिक सरल और परिचित कृति हमारे लिए रामचरितमानस हो सकती है। आप चाहें तो कामायनी, गोदान जैसी आधुनिक कृतियां भी ले सकते हैं। परन्तु आधुनिक कृतियाँ, तुलना में अधिक चुनौति भरी होती हैं।
आप किसी एक कृति को आधार बना कर दो निबंधात्मक विवरण लिख कर देखें। इसके शब्दों की अधिकतम सीमा 200 शब्दों की हो। अगर 200 शब्दों में संभव नहीं है तो आरंभ में 500 शब्द लिखें और बाद में उसे 200 शब्दों में संपादित करें। 200 शब्दों का आग्रह इसलिए कि हमारी परीक्षा में सबसे बड़ा प्रश्न 200 शब्दों का ही होता है। दूसरे, यह कार्य व्यावसायिक क्षेत्र के लिए आप करेंगे। वहाँ किसी के पास विस्तृत लेख पढ़ने का समय नहीं होता। तीन सेमिस्टर में अध्ययन करने के बाद आप अब तक तो 200 शब्द-लेखन कौशल में माहिर हो ही चुके होंगे ! आपका पहला टार्गेट ऑडियन्स है, स्कूल के छात्र ( यानी 7/8-13 वर्ष की आयु के बच्चे) और दूसरा टार्गेट ऑडियन्स है, 25 वर्ष की आयु से अधिक के लोग। आप इसे लिखते समय सबसे पहले भाषा का ध्यान रखेंगे और उसके बाद उसमें प्रकट होते अथवा किए जाने वाले मूल्यों की ओर आपका ध्यान होना चाहिए।
इस दो प्रकार के लेखन को करते समय आप अपनी लेखन प्रक्रिया का भी निरीक्षण अवश्य करें तथा बाद में उसका विश्लेषण करें। पर मन-ही-मन। इस प्रक्रिया-विश्लेषण-निरीक्षण के फलस्वरूप आपका अगला लेखन अधिक सरल एवं बेहतर होगा।
      अब हम यूनिट -4 की बात करेंगेजिस तरह यूनिट 3 में निबंधात्मक लेखन के विषय में हमने जानकारी ली, उसी तरह यूनिट-4 में कथात्मक लेखन की हमें जानकारी होनी चाहिए। इस यूनिट में आपको चार मुद्दे पढ़ने हैं और कहानी भी लिखनी है। कहानी की भाषा, भाषा की सर्जनात्मकता, विभिन्न प्रकार की कहानियों में प्रयुक्त भाषा पाठ, कहानी लेखन । यहाँ आप देख सकते हैं कि ज़ोर फिर एक बार भाषा पर है। आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि जहाँ तक निबंध का प्रश्न है यह तो समझ में आ गया कि कथा होती नहीं है, अतः भाषा और विचारों पर अधिक बल दिया जाता है। पर कहानी में तो कथा तत्व, पात्र, देशकाल, वातावरण सभी कुछ होता है। फिर इन तत्वों को छोड़ कर हम केवल भाषा पर ही क्यों केन्द्रित हैं ? आपने यह भी देखा होगा कि इसमें भाषा पर दो यूनिट हैं। एक केवल भाषा और एक भाषा की सर्जनात्मकता। भाषा की सर्जनात्मकता, कहानी में उसके वर्णन, पात्र तथा कथा-विकास, मनोमंथन देशकाल आदि से संबंद्ध होती है। जैसे आपने प्रसाद की कहानियाँ पढ़ी होंगी। उन कहानियों में देश काल के वर्णन में ही, प्रकृति के वर्णन में ही पात्र की मानसिकता और कहानी का विकास दिखाई पड़ता है। इकाई एक में कहानी की भाषा पर आपको सोचना है। अब कहानी की भाषा निबंध की भाषा की तरह तो नहीं होगी। उसमें न व्याकरण की व्यवस्था की बाध्यता है न ही मानक भाषा के प्रयोग का आग्रह। आप की कहानी का जो परिवेश होगा वैसी ही भाषा होगी। प्रसाद की कहानियों के साथ-साथ आपने प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ीं हैं और निर्मल वर्मा की भी पढ़ी हैं। तीनों की एक-एक कहानी लें और देखें की भाषा का पोत क्या है। पोत शब्द का अर्थ है वस्त्र जिस तरह स्पर्श के बाद हाथ को महसूस होता है। तो भाषा का पोत यानी कहानी पढ़ते हुए उसकी भाषा का कैसा असर आपके मन पर पड़ता है। अगर कोई पाठ कर रहा है तो मन के साथ-साथ कानों पर किस तरह का असर पड़ रहा है। जैसे ही भाषा का यह स्वरूप और भाषा की बारीकियों का आपको अंदाज़ा होता जाएगा आपकी समझ में यह आ जाएगा कि कहानी में किस तरह की भाषा होती है। इसमें भी आप निबंध से उसकी भिन्नता को पहचानें, कविता-(लंबी, कथात्मक कविता से उसकी भिन्नता को जानें और कहानी की भाषा की विशेषताएं जाने। असाध्य वीणा अज्ञेय की लंबी कविता है जिसमें कथात्मकता का अंश है। आप को अगर इसे कहानी में लिखना होगी तो तुरंत आपकी भाषा बदल जाएगी। उसमें केशकंबली का, राजा का प्रजा का चरित्र आएगा। आरंभिक वर्णन देशकाल में चला जाएगा। वहाँ भाषा का अलग स्वरूप होगा। दूर क्यों जाते हो... आपने सेमिस्टर-1 में रवीन्द्रनाथ की कई कथात्मक कविताएं पढ़ी हैं। आपको अगर इन कथात्मक कविताओं की कहानियाँ लिखनी हैं तो ...... कर के देखिए।
      इसमें एक और बात जोड़िए। इन कविताओं के निबंधात्मक विवरण लिखें। यानी कविता की कहानी बनाएं और कविता का निबंधात्मक विवरण। भाषा के स्वरूप की भिन्नता का आपको पता चल जाएगा। आज के लिए इतना ही। बाक़ी चर्चा अगली पोस्ट में। 
  

Monday, 6 February 2012

समस्या और निराकरण (HIN507)



आपके मन में इस बीच अपने कोर्सेस पढ़ते हुए कई तरह के प्रश्न उठे होंगे। आपने इस संदर्भ में मुझसे चर्चा भी की है। सबसे पहले तो आप अब यह सोच रहे होंगे कि इन नए प्रकार के कोर्सेस पढ़ तो रहे हैं, पर अब परीक्षा में प्रश्न किस तरह के आएंगे ? प्रश्न किस तरह के आ सकते हैं, यह सोचने की अपेक्षा आप इस बात को यों समझिए कि इन सर्जनात्मक कोर्सेस में प्रश्न किस तरह के बन सकते हैं। मुझे मालूम है कि इस के बाद आपका प्रश्न होगा कि इसमें जो सामग्री हमें मिली है, वह क्या काफ़ी है ?
अब इन दोनों प्रश्नों पर हम क्रमशः विचार  करेंगे।
आज हम बात कोर्स  507 HIN से आरंभ करेंगे।
इस कोर्स में हम जो यूनिट्स पढ़ रहे हैं, उन्हें हम तीन हिस्सों में बाँट सकते हैं। प्रायोगिक भाषा विज्ञान, सर्जनात्मक लेखन एवं सर्जनात्मक लेखन के आधार उपकरण। सबसे पहले आप यूनिट 3 एवं 4 को ही लें। ये यूनिट निबंध लेखन एवं कहानी लेखन से संबंधित हैं। आप यह भी याद रखें कि इस कोर्स के माध्यम से किसी को भी साहित्यकार बनाया नहीं जा सकता। लेकिन लेखन का कौशल सिखाया जा सकता है। यह लेखन- कौशल आपको आगे चल कर स्क्रिप्ट लेखन एवं अख़बारी लेखन करने में उपयोगी हो सकता है। आपने पहले सेमिस्टर में कोर्स 406 में निबंध पढ़े हैं। इसके अलावा आपने बी.ए में भी निबंध पढ़े होंगे। अब अगर आप ध्यान से देखेंगे तो यूनिट 3 में चार मुद्दे हैं निबंध की भाषा, निबंध की शैली, विभिन्न प्रकार के निबंधों में प्रयुक्त भाषा का पाठ तथा निबंध लेखन।
अब आपको अपने व्यावसायिक काम के लिए निबंध लिखना है। या निबंधात्मक लेखन करना है। निबंधात्मक लेखन से हमारा क्या मतलब है ? तो जब तक आप इसके तत्वों को लेखन के स्तर पर नहीं जानेंगे, तब तक आप इसे(निबंध को) लिख नहीं सकेंगे। इसका मतलब यह है कि इस कोर्स में आपको ये तत्व वास्तविक लेखन के स्तर पर समझने हैं। तो निबंध की भाषा कैसी होनी चाहिए इसकी आपको जानकारी होनी चाहिए। निबंध की भाषा का चुनाव आप अपने विषय के अनुरूप ही करेंगे। उसी के अनुरूप आपकी शैली भी होगी, अतः आप वैसी ही शैली चुनेंगे। आपने जो भी निबंध पढ़े हैं, फिर सेमिस्टर एक में आठ निबंध तो आप पढ़ चुके हैं, उन्हीं को ध्यान में रखते हुए इस बात को आप समझ सकते हैं। किस तरह काका कालेलकर की भाषा गुणाकर मुळे की भाषा से अलग है, उसके क्या  कारण हैं, इस बात को आप समझ ही सकते हैं- विषय भी भिन्न है और लेखक का व्यक्तित्व भी अलग है आदि। या फिर व्यंग्य-शैली होते हुए भी किस तरह प्रतापनारायण मिश्र की शैली और बालकृष्ण भट्ट की शैली अलग है। अथवा तो नारी और स्त्री नामक निबंध लिखने वाले एक ही रचनाकार होने के बावजूद शैली तथा भाषा में क्या अंतर है। आप इन मुद्दों पर सोचेंगे तो अपने आप आपको अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे। कौन से प्रश्न ? किस तरह के प्रश्न पूछे जाएंगे इत्यादि। सेमिस्टर एक में पढ़े सभी निबंधों में भाषा के अलग-अलग पाठ आपको दिखाई देंगे। अंत में आपको स्वयं निबंध लिखना है।
तो पाँचवां यूनिट तो आपके सुनियोजित रचनाकर्म से संबंधित है। लेकिन इस यूनिट के करने के लिए पहले चार यूनिट आपको आने होंगे। निबंध की भाषा नामक पहले यूनिट में आपको इन बातों को ध्यान में रखना है। इसमें आप निबंध की भाषा किस तरह कथात्मक गद्य साहित्य (कहानी, उपन्यास) से अलग है, निबंध में, भाषा का क्या स्थान होता है। निबंध लेखक को भाषा पर अधिकार क्यों होना चाहिए, अगर गद्य कवियों की कसोटी है तो निबंध क्यों गद्यकारों की कसौटी है- इस प्रश्न पर आपको सोचना होगा। तत्सम प्रधान भाषा कैसी होती है, बोलचाल की भाषा क्या निबंध में होती है ? निबंध अगर मुख्यतः विचारों को वहन करता है तो क्या बोलचाल की भाषा का उसमें प्रयोग हो सकता है ? तो किस तरह के शब्दों का उसमें अधिक प्रयोग होगा। तत्सम, तद्भव या फिर देशज? आप निबंधों को पढ़िए और देखिए। किस तरह की शैली को साथ किस तरह के शब्दों का प्रयोग होगा। अगर आपकी शैली सामासिक होती तो शब्द किस प्रकार के होंगे? क्या आप तब तद्भव शब्दों का प्रयोग कर सकेंगे? निश्चित रूप से नहीं। आप द्विवेदीजी (हजारीप्रसाद) के निबंध पढ़िए, आपकी समझ में आ जाएगा। तो यही सारे प्रश्न हैं..... समझ गए आप।
उसी तरह निबंध में वर्णनात्मक, विवरणात्मक, सामासिक, व्यास आदि शैलियों का प्रयोग किया जाता है। अब आपको एक निबंध लिखना है, यात्रा के विषय में, तो ज़ाहिर है आप वर्णनात्मक शैली का ही प्रयोग करेंगे। पर आपको एक घटना के विषय में लिखना है तो आप विवरणात्मक शैली का ही प्रयोग करेंगे। लेकिन इसमें भी कई पेंच हैं। आपका स्वभाव, आपका विषय आपकी भाषा और शैली को तय करेंगे। लेकिन अगर कोई विषय दे दिया गया हो तो क्या करेंगे आप ? अगर आप व्यावसायिक कामों के लिए लिख रहे हैं तो आपका टार्गेट ऑडियंस, यानी कि आप किसके लिए लिख रहे हैं, यह भी तय करेगा कि आपकी भाषा कैसी हो। यही हमें सीखना भी है। जैसे अगर आपको  कंब रामायण का परिचय देता हुआ एक निबंधात्मक विवरण देना चाहते हों, तो आपका टार्गेट ऑडियंस जो होगा उसके अनुसार आपको अपनी भाषा को स्वरूप देना होगा। अगर आपका टार्गेट ऑडियंस रिसर्च स्कॉलर अथवा स्नातकोत्तर विद्यार्थी है तो आपकी भाषा और शैली अलग होगी और अगर वह स्कूल का छात्र हो अथवा आम जनता हो तो आपकी भाषा शैली अलग हो जाएगी।
इस कोर्स में हमें असल में इन्हीं मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अध्ययन करना है। अतः इसमें जिन प्रश्नों के उत्तर आपको देने होंगे उसमें विषय को लेकर आपकी समझ ज़्यादा काम करेगी।
आपको इस बात को समझ लेना होगा कि इस स्पर्द्धा के युग में अब कहने भर को डिग्रीधारी बनने से काम नहीं चलेगा, उसमें भी हिन्दी के छात्रों को। इस बात की गांठ  बांध लीजिए कि अगर हम साहित्य के विद्यार्थी सही भाषा में अपने विचारों को व्यक्त नहीं कर सकेंगे तो हमें कोई काम नहीं मिलेगा। इन कार्सेस से हम इसी बात को समझ रहे हैं और अपने को तैयार कर रहे हैं। हमें केवल अन्य भाषा तथा साहित्य के विद्यार्थियों से ही स्पर्द्धा नहीं करनी अपितु अन्य विषयों के विद्यार्थियों के बीच अपनी साख़ बनानी है। हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ने वाला विद्यार्थी किसी भी अन्य विषय पढ़ने वाले विद्यार्थी से कमतर नहीं है- यह तभी आप साबित कर सकेंगे जब आप अपने ढंग से सोच सकेंगे और सोचे हुए को अभिव्यक्त कर सकेंगे। हमारा यह नया पाठ्यक्रम इसी के प्रति आपको अभिमुख करने के लिए और तैयार होने के उपकरण आपको दे रहा है।
यूनिट चार के बारे में कल बात करेंगे। आज के यूनिट के  संदर्भ में आपको कुछ पूछना है तो आपके प्रश्नों का स्वागत है।