जिन खोजा तिन पाइयां

इस ब्लॉग में विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं के उत्तर देने की कोशिश की जाएगी। हिन्दी साहित्य से जुड़े कोर्सेस पर यहाँ टिप्पणियाँ होंगी,चर्चा हो सकेगी।

Saturday, 4 September 2010

HIN-404 लोकजागरण कालीन हिन्दी पद्य

भारतीय भक्ति साहित्य का परिचय

( इस विवेचन का आधार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का लेखन है। अधिक विस्तृत जानकारी के लिए विद्यार्थी उनकी ग्रंथावली के पाँचवे खंड को देख सकते हैं। इसमें बहुत सारी बातें आचार्यजी में से शब्दशः भी ली हैं। अतः यह कोई मौलिक चिंतन नहीं है। परन्तु आचार्यजी के ग्रंथों को देखने के लिए विद्यार्थी प्रेरित हों इस आशय से गुरु-वचन को सरल कर के इसमें रखने का प्रयास किया है।)


भारतीय भक्ति कविता की बात जब भी की जाती है, तब काल की दृष्टि से कहीं- न-कहीं हमारे चिंतन के पार्श्व में मध्यकाल होता है। पश्चिम में मध्यकाल की जो अवधारणा है उससे भारतीय मध्यकाल नितांत भिन्न रहा है। मध्यकाल को पश्चिम में पतनशील मानसिकता अथवा अंधकार युग के रूप में देखा जा सकता है। जबकि भारतीय संदर्भ में मध्यकाल कला, साहित्य, चिंतन, दर्शन और राजकीय दृष्टि से भी अत्यन्त समृद्ध एवं उत्कर्ष का काल रहा है। भारतीय मध्यकाल को हम मोटे तौर पर दो भागों में बाँट सकते हैं। पूर्व मध्यकाल (5वीं-6ठी से 10वीं शताब्दी तक) तथा उत्तर मध्य-काल ( 10वीं से 16वीं शताब्दी तक) पूर्व-मध्य काल में कुमारिल भट्ट, जैसे विख्यात मीमांसकों का प्रादुर्भाव हुआ। भुवन विश्रुत आचार्य शंकर, प्रसिद्ध बौद्ध आचार्य चंद्रकीर्तिका का भी यही समय था। साथ ही सामंत भद्र, और अकलंक जैसे जैन मनीषी भी इसी समय हुए। यही वह समय है जब काव्य, नाटक, आख्यायिक, अंलकार-शास्त्र आदि के विख्यात आचार्य हुए। इसी समय में पुराणों, आगमों तथा संहिताओं की रचनाएं अस्तित्व में आती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय मध्यकाल का पूर्वार्ध धर्म, दर्शन तथा बैद्धिक मनीषा का एक ऐसा सुवर्ण काल था जिसने भारतीय सांस्कृतिक चेतना का पिंड निर्मित किया।
दसवीं शताब्दी के बाद का समय जिसे प्रायः हम भक्तिकाल के नाम से पहचानते हैं तथा उसमें भारतीय धर्म, दर्शन तथा भाषिक व्यवस्था की जो विभिन्नताएं दिखाई पड़ती हैं – उसकी मानों पृष्ठभूमि इस पूर्व-मध्यकाल में बनती है। इस समय के मीमांसकों, आचार्यों तथा वेद-विरोधी धर्म-संप्रदायों का उद्भव उत्तर-मध्यकाल की भारतीय भक्ति परंपरा के लिए ज़िम्मेदार है, ऐसा कहा जा सकता है।
यहाँ पर यह समझ लेना होगा कि ईसा की छठी शताब्दी के पहले ही भारतीय धर्म साधना के चित्र फलक पर जैन तथा बौद्ध धर्म मतों का उद्भव हो चुका था। इन मतों के धर्म प्रचार तथा धार्मिक मान्यताओं में जो प्रमुख बात उभर कर आती है वह यह कि ये संप्रदाय वेद-विरोधी थे। वेद-विरोधी होने का मुख्य कारण यज्ञ में होने वाली बलि( जिसमें मानव बलि भी शामिल है) के कारण होने वाली हिंसा तथा वौदिक काल के बाद के समय में ,जाति प्रथा के फलस्वरूप समाज में उच्चावचता की व्यवस्था का निर्माण। वैदिक काल में भी ईश्वर तथा देवताओं की परिकल्पना इस तरह से थी कि समाज के एक विशेष वर्ग को ही उसका लाभ मिल सकता था। क्रमशः जाति प्रथा के दृढ बन्धन में बंधे हुए वैदिक धर्म संप्रदायों को इन बौद्धों ने शिथिल करने का आरंभ किया। इस पूर्व पूर्वभूमिका में जब हम पूर्व-मध्यकाल के धार्मिक चित्र को देखते हैं, तो यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि उस समय दो प्रकार की मान्यताएं प्रचलित थीं।एक मान्यता के अनुसार किसी को भी हीन बताने के लिए उसे वेद-विरोधी कहा जाए । दूसरी मान्यता में वे लोग थो जो इस प्रकार के – यानी कि वेद-विरोधी संप्रदायों को बेहतर समझते थे। वैदिक धर्मऔर संप्रदायों के विरोध में जिन सम्प्रदायों का उद्भव हुआ वे यही वेद-विरोधी संप्रदाय थे।कुल्लूक भट्ट ने मनु की टीका में इस शब्द की व्याख्या इस तरह की है - नास्तिक शब्द का अर्थ है- वह जो परलोक में विश्वास नही करता। सातवीं शताब्दी के बाद भारत में यह प्रवृत्ति उत्तरोत्तर प्रबल होती गई। इसका मुख्य आशय अ-वैदिक लोगों/संप्रदायों को अपने से हीन साबित करना रहा है। इससे यह पता चलता है कि भारतीय भक्ति साहित्य में आस्तिक और नास्तिक होनें प्रकार के मत थे परन्तु प्रबलता तो आस्तिकों की ही थी।
इस काल के प्रमुख नास्तिक संप्रदाय मुख्यतः छः थे। चार बौद्धों के तथा दो अन्य। बौद्धों के चार संप्रदाय इस प्रकार थे-
1- माध्यमिक 2- योगाचार 3- सौत्रांतिक तथा वैभाषिक
इनके अलावा
5- चार्वाक एवं 6- दिगंबर जैन।
जहाँ तक आस्तिक श्रेणी का संबंध है यह कहा जा सकता है कि इनमें वे तमाम धर्म-मत तथा दार्शनिक संप्रदायों की गिनती की जा सकती है जो वेद को प्रमाण मानते थे। उत्तर मध्य-काल तक आते-आते वेदांत के अनंत परस्पर विरेधी संप्रदाय हुए और मज़े की बात यह है कि सभी अपने को श्रुति परंपरा से निकले संप्रदाय मानते हैं। अद्वैत, द्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद आदि परस्पर विरोधी मत ऐसे हैं जो एक ही वेद को अपना आधार मानते हैं। इसी प्रकार शैव, शाक्त, पाशुपत गाणपत्य सौर आदि अनेक धार्मिक संप्रदाय अपने को वेद-प्रतिपादित बताते हैं। कूर्म पुराण में कापाल, लकुल, वाम,भैरव,पूर्व, पश्चिम, पांचरात्र, पाशुपत आदि को अवैदिक बताया गया है। एक मज़ेदार बात यह है कि प्रायः ही शिवजी या स्वयं विष्णु भगवान के मुख से कहलवाया गया है कि उन्होंने असुरों को पथभ्रष्ठ बनाने के लिए मोह शास्त्रों की रचना की थी। उत्तर कालीन मध्य युग में यह धारणा दृढ हुई कि प्रत्येक संप्रदाय के लिए एक भाष्य का होना आवश्यक माना गया। ये या तो उपनिषदों पर या ब्रह्मसूत्र पर अथवा गीता पर आधारित होना चाहिए। इसी को प्रस्थान-त्रयी कहा गया।[i]


उत्तर-मध्य युग में भाष्य-हीन संप्रदायों को अ-वैदिक समझ लिया गया। कहा जाता है कि अपना भाष्य नहीं होने के कारण गौडीय वैष्णव को एक बार जयपुर में कठिनाइयों में पड़ना पड़ा था। जैसा कि यह ज्ञात है कि आगसों की तीन श्रेणियाँ हैं – अर्थात् वैष्णव , शैव और शाक्त। उनके भी उपभेद हैं। ये सभी भेद और उप-भेद उत्तर मध्यकाल में विकसित रूप पाते चले गए। मध्यकालीन भक्ति साहित्य में जो महत्वपूर्ण साधनाएं दृष्टिगोचर होती हैं उनमें से पाँचरात्र और वैष्णव मत विशेष महत्वपूर्ण हैं।
पाँचरात्र मत के उपासकों को भागवत् कहते हैं। पाँचरात्र संहिता कहाँ और कब लिखी गई इसके संदर्भ में कुछ भी निर्णय करना कठिन है। लेकिन ईस्वी सन् की 8वीं सदी से पूर्व दस से बारह संहिताएं निश्चित् रूप से लिखी गई थीं। बाद में दक्षिण भारत में भी पाँचरात्र संहिताएं बनीं। इन संहिताओं में क्या है ? शैव आगमों की भाँति इन संहिताओं में चार विषयों का प्रतिपादन है। यथा- ज्ञान, योग, क्रिया, चर्या।
ज्ञान- अर्थात् ब्रह्म, जीव तथा जगत के पारस्पारिक संबंधों का निरूपण है।
योग- अर्थात् मोक्षके साधन-भूत योग प्रक्रियाओं का वर्णन।
क्रिया- अर्थात् देवालय का निर्माण मूर्ति स्थापना आदि।
चर्या- अर्थात् नित्य-नैमित्तिक क्रिया। मूर्ति तथा यंत्र की पूजा पद्धति परम विशेष के उत्सव आदि।
वस्तुतः क्रिया और चर्या ही संहिताओं के प्रिय और प्रधान विषय हैं। इन संहिताओं को वैषणवों का कल्प-सूत्र भी कहा जाता है। दक्षिण में इस समय बहुत से मंदिरों में भागवत अर्चक हुए हैं। तमिल देश के अधिकांश मंदिरों पाँचरात्र संहिताओं के अनुसार पूजा होती है। परन्तु अभी भी ऐसे देवालय हैं जिनमें वैखानस संहिताओं के अनुसार पूजा होती है। कहते हैं कि रामानुजाचार्य द्वारा विरोध के कारण बहुत से मंदिरों में वैखानस संहिताओं का व्यवहार उठ गया और पांचरात्र संहिताओं का प्रचलन हुआ। अप्पय दीक्षित का कहना है कि पाँचरात्र मत अवैदिक हैं और वैखानिस मत वैदिक हैं। वस्तुतः इन संहिताओं के मत से भगवत् के अनुग्रह से ही जीव के मल का नाश होता और उनकी कृपा से ही वह मुक्ति पाता है। इस भवजाल से मुक्ति पाने का उपाय निरीह हो कर भगवान की शरण में जाना ही है। जो भगवान के प्रति अनुकूलता के संकल्प, प्रतिकूलता के त्याग, रसकत्वम, विश्वास तथा आत्मसमर्पण और निरीहता से प्राप्त है। विक्रम की सातवीं सदी से लेकर दसवीं सदी तक तमिल देश में ऐसे भक्त गायकों का प्रादुर्भाव हुआ था जो भक्ति के उल्लास में एक मंदिर से दूसरे मंदिर तक भजन गाते फिरते थे। अपने इष्टदेव की मूर्ति का वियोग इनके लिए असह्य था। इन भक्तों में यह विश्ष्टिता थी कि ये शैव तथा वैष्णव दोने प्रकार के थे। वैष्णव संत दस आळवार संज्ञक प्रसिद्ध हैं। शैव भक्तों में भी तीन बहुत प्रसिद्ध हैं। उन पर भी आगमों का प्रभाव बहुत कम है। इससे यह पता चलता है कि तमिल देश में संहिताएं देर से पहुँची। आलवार लोग अस्पृश्यों को भी उपदेश देते थे। कई अस्पृश्य कही जाने वाली जातियाँ में ऐसे भक्त भी उत्पन्न हुए जो वैष्णव संप्रदाय के आदि गुरु माने जाते हैं।

(शेष अगली पोस्ट में...)


[i] ( महाभारत, रामायण तथा गीता को भी प्रस्थान त्रयी कहा गया है।)

Wednesday, 25 August 2010

1-साहित्य में काव्यशास्त्र का महत्व एवं उपादेयता

(काव्य-शास्त्र के इस कोर्स में हमें काव्य-शास्त्र संबंधी कुछ मूलभूत जानकारी प्राप्त करनी होगी जिस के फलस्वरूप हमने क्लास में विस्तार से चर्चा की है। आपको याद रहे इसलिए कुछ बातें मैं यहाँ दे रही हूँ।)

साहित्य में काव्य शास्त्र का महत्व निर्विवाद है इसमें कोई संदेह नहीं है। जो महत्व व्याकरण-शास्त्र के भाषा के संदर्भ में होता है वही महत्व काव्यशास्त्र का साहित्य के संदर्भ में होता है। अर्थात् जिस तरह व्याकरण भाषा को व्यवस्था देता है, उसके प्रयोग के नियम गढ़ता है, उसे एक सामाजिक पहचान देता है और उसमें विचार के विकास की संभावनाएं खड़ी करने के साथ-साथ सामाजिक विकास के विभिन्न चरणों को भाषाई अभिव्यक्ति देता है। उसी तरह काव्य शास्त्र के महत्व एवं उपादेयता को समझने के लिए पहले हमें कुछ प्राथमिक बातों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करना पड़ेगा। साहित्य के क्रमशः विकास के साथ-साथ काव्य-शास्त्रीय मापदंडों में भी विकास हुआ है। जिस तरह मध्यकाल तक का काव्य-शास्त्र संस्कृत की परंपरा के अनुसार था, यहाँ तक कि हिन्दी का रीतिकालीन काव्य-शास्त्र भी उसी परंपरा के अनुसार ही रचा गया। रामचंद्र शुक्ल से चलकर नगेन्द्र तक रस-चिंतन की धारा क्षीण अवश्य हुई थी, पर विद्यमान तो थी ही। क्रमशः आधुनिकता के दबाव और पाश्चात्य काव्य-शास्त्रीय चिंतन के प्रभाव में आ कर हिन्दी का साहित्य-शास्त्र अनेक आयामी हो गया।
लेकिन काव्य-शास्त्र के बनने की प्रक्रिया बड़ी रोचक रही होगी। हमें इतनी जानकारी प्राप्त होती है कि आज जिसे हम साहित्य-शास्त्र के नाम से जाने हैं उसके लिए इसके पूर्व कई नाम प्रचलित थे। ये नाम वस्तुतः काव्य शास्त्र के एक शास्त्र के रूप में विकसित होने का भी इतिहास दर्शाते हैं। सबसे पहले एक नाम आता है- काव्य-कल्प। एक संदर्भ इस प्रसंग में यों है कि जब राम के दरबार में लव-कुश पहुँचते हैं तो सभी में कई तरह के लोग बैठे हैं. उनमें से कुछ काव्य-कल्प के ज्ञाता भी थे। इस संदर्भ से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपने आरंभिक रूप में काव्य-शास्त्र का एक नाम काव्य-कल्प था। फिर अलंकार-शास्त्र तो लंबे समय तक प्रचलन में रहा। एक नाम काव्य-लक्षण भी मिलता है। राजशेखर ने पहली बार साहित्य-शास्त्र शब्द का प्रयोग किया।
काव्य-शास्त्र के महत्व पर सोचते हुए पहला प्रश्न हमारे मन में यह आता है कि आखिर काव्य-शास्त्र क्या करता है? वह सबसे पहले तो साहित्य के आकलन को वैज्ञानिकता देता है। अब यहाँ फिर एक प्रश्न आता है कि आकलन करना यानी क्या – आकलन से हमारा तात्पर्य है- साहित्य का मूल्यांकन, साहित्य की समझ और साहित्य की उपयोगिता । काव्य-शास्त्र इन तीनों संदर्भों में – यानी साहित्य का मूल्यांकन करने में काव्य-शास्त्र हमारी मदद करता है। वह हमें साहित्य की समझ भी देता है और यह भी बताता है कि कौन सा साहित्य किस दृष्टि से उपयोगी है। जैसे राम-कथा पर रामचरित मानस भी आधारित है, रामचंद्रिका भी और संशय की एक रात भी । पर काव्य-शास्त्र की मदद से हम तीनों का आकलन सही परिप्रेक्ष्य में कर सकते हैं। तभी भक्ति के मापकों से रामचंद्रिका का और छन्द एवं भक्ति के मापकों से संशय की एक रात का मूल्यांकन नहीं करेंगे। काव्य शास्त्र हमें वह विवेक देता है कि हम साहित्य का आकलन ठीक-ठीक कर सकें। क्योंकि काव्य-शास्त्र तथ्यपरक होता है, विश्वसनीय होता है तथा उसकी अपनी एक प्रविधि है- एक मैथेडोलॉजी है, अतः साहित्य के इस आकलन को वैज्ञानिकता प्राप्त होती है।

Tuesday, 17 August 2010

'Agyeya' Hindi Poetry recital/4 poems.wmv

Monday, 9 August 2010

रवीन्द्रनाथ की कविताएँ

भारतीय साहित्य- रवीन्द्रनाथ की कविताएँ -2 कविता किस तरह अपने आस-पास के वस्तु जगत को कविता जगत में रूपांतरित करती है इसका उदाहरण रवीन्द्रनाथ की वैशाख और नव-वर्षा कविताएं हैं। हम लोगों नें इन कविताओं को विस्तार से पढ़ा। आपने देखा कि इन दोनों कविताओं में वस्तु-जगत के कुछ पदार्थ समान हैं पर काव्य का विषय अलग होने के कारण काव्य-वस्तु बदल जाती है। घास दोनों में है। पर वैशाख में वह घास पात हो जाती है तो नव-वर्षा में वह कोमल दूर्वा बन जाती है। वैशाख में नदी क्षीण-धारा है तो नव-वर्षा में वह गाँव के पास तक चली आती है। पर चूँकि नव-वर्षा की नदी है अतः अपने तटों को बाँध रखती है। अभी बाढ़ जैसी स्थिति नहीं आती। वैशाख में क्षुधा-तृषित मैदान हैं जो नव-वर्षा में कोमल दूर्वा से बिछ जाते हैं।
नव-वर्षा कविता में कवि ने काव्य-उपादानें का कैसा दोहरा प्रयोग किया है , यह भी देखते ही बनता है। वर्षा है तो मोर होगा ही । फिर कलाप करता हुआ मोर होगा। यह मोर बाहर भी नाच रहा है और मन-मयूर भी नाच ही रहा है। कलाप करते मोर का चित्र जहाँ एक ओर वर्षा ऋतु के लिए उपादान बनता है तो दूसरी ओर उसके कलाप के सुंदर रंगों को कवि अपनी मन की भावनाओं के साथ जोड़ कर उनका वर्णन भी करता है। कवि कल्पना की उड़ान भरता है तो भी यथार्थ जगत का उनका निरीक्षण हमें प्रभावित करता है। धरती से आसमान तक जो स्तर हैं उनका बयान नव-वर्षा में है। कवि नीचे धरती पर खड़ा है, नव-वर्षा बादलों पर बैठी है और वहाँ से आसमान में न जाने किसे पुकार रही है। हम इस बात को जानते हैं और हमारा अनुभव भी है कि जब हम पहाड़ों पर रहते हैं या हवाई-जहाज में सफ़र करते हों तो बादलों के ऊपर बैठे हों, या जा रहे हों या बादल हमारे घर में आ जाते हैं, इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।
रवीन्द्रनाथ की कविताओं की विशेषता है कि वे हमें वस्तु जगत के बाहर और अपने भीतर ले जाते हैं। कल्पना की सैर भी कराते हैं। निर्झर का स्वप्न भंग कविता में हम यह अनुमान कर सकते हैं कि कवि तो पहाड़ पर बहते हुए झरने को देख रहा है। पर अपनी जिज्ञासा के कारण हमें भी उस पहाड़ के भीतर ले जाते हैं और उनकी इस कल्पना का हिस्सा बना लेते हैं कि यह झरना जो बाहर बह रहा है भीतर कैसा होगा और हमारे अन्जाने अपने रचना-आकुल मन में भी ले जाते हैं कि कवि आखिर कविता कैसे रचता होगा।
सचमुच, रवीन्द्रनाथ की कविता पढ़ना यानी सौन्दर्य का साक्षात्कार करना।
यहाँ दो-एक और बातें बताना ज़रूरी लगता है। हम रवीन्द्रनाथ की कविताओं को जब पढ़ते हैं तो एक तरफ़ उन पर उपनिषदों के प्रभाव को देखते हैं। उपनिषदों में जिस प्रकार सृष्टि का रहस्य प्रकृति के आनंदमय स्वरूप के साथ उजागर होता है उसी तरह रवीन्द्रनाथ में भी वह दिकाई पड़ता है। फिर रवीन्द्रनाथ पर कालिदास का प्रभाव हम उनकी मेघदूत नामक रचना में पढ़ ही चुके हैं। प्रेम में तो मुक्ति है- पर उसे हमेशा सामाजिक बंधनों का सामना करना पड़ता है- कविवर रवीन्द्रनाथ के मन में यह टीस कविता के अंत में आती दिखाई पड़ती है। पूरी कविता में वे कविदास के मेघ की पीठ पर सवार उस पूरे प्रदेश की यात्रा हमें करवाते हैं जिस रास्ते यक्ष ने मेघ को भेजा था। वे हमें उन वनांगनाओं, सिद्दांगनाओं और ग्राम वधुओं से भी मिलवाना नहीं भूलते जिनसे कालिदास ने दूत बने मेघ को मिलवाया था। वे अपनी ही भूमि के जयदेव को भी याद करते हैं। पर रवीन्द्रनाथ को पढ़ते हुए हमें अपने जयशंकर प्रसाद और निराला और शमशेर याद आए बिना नहीं रहते जिनकी कविताओं पर रवीन्द्रनाथ का प्रभाव पड़ा है। रवीन्द्रनाथ जब नव-वर्षा में घने वनों की दूब और नदी को आसमान में कल्पित करते हैं तो हमें शमशेरजी की ये पंक्तियां याद आती हैं- आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही थी और मैं उसी में कहीं कीचड़ की तरह सो रहा था। या जब इसी कविता में रवीन्द्रनाथ कहते हैं कि कि यब कौन है जिसने मेघों के वस्त्र को अपने वक्ष के बीच खींच लिया है या जो बिजली के बीच चल रही है- तो हमें सहसा प्रसाद की पंक्तियाँ याद आ जाती हैं- कामायनी में श्रद्धा का वर्णन कुछ इन्हीं शब्दों में जयशंकर प्रसाद ने किया है- नील परिधान बीच सुकुमार / खिल रहा मृदुल अधखुला अंग,/ खिला हो ज्यों बिजली का फूल/ मेघ वन बीच गुलाबी रंग।
दिवसावसान के समय मेघमय आसमान से उतरने वाली सुन्दरी परी –सी संध्या हो या बादलों के भपर किसे ऊँचे प्रासाद में बैठी कबरी खोल अपने बाल फैलाए बैठी नव-वर्षा हो- दोनों एक ही कुल-गोत्र की लगती हैं। इसी नव-वर्षा कविता में आसमान में जिस प्रासाद की कल्पना है, जिसके शिखर पर नव-वर्षा की कल्पना कवि ने की है, वह कबीर के सुन्न-महल का रोमानी रूप है।
उसी तरह निर्झर अपनी कारा को आखिर क्यों तोड़ना चाहता है ? इसलिए कि एक तो उसके पास कहने के लिए बहुत कुछ है फिर उसमें वह करुणा हो जिससे वह जगत को आप्लावित करना चाहता है। कवि के पास अगर करुणा न हो तो वह किस बात का कवि ! क्या इस समय आपको वे प्रसिद्ध पंक्तियाँ नहीं याद आतीं—वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान..... रवीन्द्रनाथ की इस करुणा के बीज आदि कवि में होंगे ही यह तो आप इसे पढ़ते-पढ़ते ही समझ गए होंगे।
यही तो साहित्य की अपनी परंपरा है। उपनिषदों से आरंभ हो कर कालिदास और कबीर से रवीन्द्रनाथ से होते हुए प्रसाद, निराला, महादेवी...शमशेर तक हमें मिलती है। आप अधिक अध्ययन करेंगे तो और भी कवियों को इस परंपरा में देख सकेंगे। शमशेर से आगे भी। आप याद कीजिए--- टी.एस. इलीयट भी तो परंपरा की ही बात करता है। ये वे सारे कवि हैं जिन्होने अपनी वैयक्तिक प्रतिभा से अपनी परंपरा को पुष्ट किया है।
यही साहित्य की हमारी भारतीय परंपरा है।

रवीन्द्रनाथ की कविताएँ

भारतीय साहित्य ( रवीन्द्रनाथ की कविताएं)इस वर्ष पूरी दुनिया कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 150 वीं जयंति मना रही है और हिन्दी जगत अपने चार महत्वपूर्ण कवियों – अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन एवं केदारनाथ अग्रवाल- की जन्मशती वर्ष मना रहा है। इसे हमें अपना सौभाग्य मानना चाहिये कि कविवर टैगोर की कविताएं हमें अपने पाठ्यक्रम में पढ़ने का सौभाग्य मिल रहा है। यह हमारी पीढ़ी की कविवर को स्मरणांजलि भी है और कविवर का हमें दिया हुआ आशिर्वाद भी है। कविवर के शब्दों, भावों और उनकी सौन्दर्य चेतना का हमें जो साक्षात्कार होगा इससे हम बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में आगे कदम भी बढ़ाएंगे।
हमारा सबसे पहला प्रश्न यह होना चाहिए कि आखिर रवीन्द्रनाथ में ऐसा क्या है कि इतने बरसों बाद भी हम उन्हें पढ़े? क्या केवल इसलिए कि वह हमारे एकमात्र नोबेल पारितोषिक पाने वाले कवि हैं? या इसलिए कि रवीन्द्रनाथ विश्व के फलक पर भारतीय साहित्य की एक गहरी पहचान हैं? या फिर इसलिए कि मानवीय गरिमा और विश्व-मानव की बात करते हुए रवीन्द्रनाथ ने राष्ट्रीय अस्मिता के अर्थ को व्यापकता दी ? या फिर इसलिए कि हम यह भी जानना चाहते हैं कि सौन्दर्य क्या है! फिर हमारा एक प्रश्न यह भी होना चाहिए कि रवीन्द्रनाथ को किस तरह पढ़ा और समझा जाए? इन बातों की चर्चा हम उनकी कविताओं के माध्यम से करेंगे।
यह बारिश के दिन हैं। रवीन्द्रनाथ ने अपनी कविताओं के माध्यम से प्रकृति के असीम सौन्दर्य तथा रहस्य को हमारे सामने खोल कर रख दिया है। आप से मैंने इस बात की चर्चा की है कि गीतांजलि के गीतों में रवीन्द्रनाथ ने प्रकृति में ही ईश्वर की उपस्थिति को देखा, महसूस किया और अभिव्यक्त किया है। हवा की हल्की-सी लहर हो या तेज़ चलती हवाएं हों, वर्षा की फुहारें हों, या मूसलाधार, वसंत की बयार या फिर पतझड़ ही क्यों न हो, पेड़, पौधे, नदी, झरने ....कुछ भी की उपस्थिति में वह उस रहस्यमय को अनुभव करते हैं- बल्कि स्वयं प्रकृति ही वह रहस्यमय का रूप है- कुछ इस तरह का बोध हमें गीतांजलि को पढ़ कर होता है।
हम रवीन्द्रनाथ की कविताओं को पढ़ते हैं तो हमें यह अनुभव होता है कि हर वह व्यक्ति जो यह जानना चाहता है कि आखिर कविता की रचना कैसे होती है, उसे रवीन्द्रनाथ को पढ़ना चाहिए। या अगर हम यह जानना चाहें कि आखिर कविता क्या है- तो हमें रवीन्द्रनाथ की कविताएं पढ़नी चाहिए। आचार्य रामचंद्र शुक्ल हमारे महत्वपूर्ण आलोचक हैं। उन्हेंने एक निबंध लिखा- कविता क्या है। रवीन्द्रनाथ मूलतः सर्जनात्मक कलाकार हैं। उन्होंने इसी बात को बहुत पहले अपनी रचनात्मकता के द्वारा कह दिया था।
आखिर एक कवि अपनी कविता में करता क्या है? वह ऐसा क्या करता है कि वह जो लिखता है उसे हम कविता अथवा साहित्य की संज्ञा देते हैं। कविता असल में हमारे चारों तरफ फैले अथवा तो कहें कि व्याप्त वस्तु जगत को शब्दों के माध्यम से सौन्दर्य-बोध में रूपांतरित कर देना है। ये शब्द कभी अलंकारों का वेष धर कर तो कभी छन्द का बाना पहन कर तो कभी विशिष्ट उक्तियों द्वारा कल्पना के माध्यम से इस वस्तुजगत को एक नए विश्व में रूपांतरित कर देते हैं। यह नया विश्व ही कविता का, यानी कला का यानी एक नयी भावना का विश्व बन जाता है जो हमारा परिचित होते हुए भी एकदम नया-सा लगता है। यही कवि की कविता है। तो इसका मतलब यह हुआ कि कवि हमारी परिचित दुनिया में एक नए विश्व का सृजन कर देता है। इस बात को हम कविताओं के उदाहरण से समझने की कोशिश करेंगे।
अगली पोस्ट में इस संबंध में चर्चा होगी।

भारतीय साहित्य

भारतीय साहित्य- सैद्धान्तिक पक्षविषय-प्रवेश के लिए मार्गदर्शनभारतीय साहित्य के सैद्धांतिक पक्ष में हमें तीन मुद्दे पढ़ने हैं-
v अवधारणा
v स्वरूप
v अध्ययन की समस्याएँ
आइए, इसे कैसे पढेंगे, इस पर थोड़ा सोच लें। सबसे पहले अवधारणा की बात-


1-अवधारणाअवधारणा से हमारा तात्पर्य है कि किसी भी शब्द/संज्ञा के विषय में हमारी क्या धारणा हो सकती है। या उस संज्ञा/शब्द में किस अर्थ की धारणा छिपी हुई है/ संगोपित है। भारतीयता की अवधारणा को समझने के लिए हमें पहले समझना होगा कि-
v भारतीय का तात्पर्य
इसके लिए हमें कुछ आधारबिन्दुओं का सहारा लेना होगा। वे आधार बिन्दु हैं-
-आधार-बिन्दुv -भौगोलिक
v -सांस्कृतिक- धार्मिक मानववाद : श्रेयस की भावना से मंडित मानव गरिमा की स्वीकृति, सहिष्णुता, सम-भाव, आस्तिक बुद्धि, सद्भाव
v -वैचारिक- भेद में अभेद अनेकता में एकता
फिर हमें भारतीय से होने वाला अर्थबोध के विषय पर सोचना होगा।

भारतीय वही है जिसने-
2. उपरोक्त को आत्मसात् कर लिया है।
इसके बाद हम भारतीय साहित्य की चर्चा आरंभ करेंगे। भारतीय साहित्य की संज्ञा सबसे पहले किसने प्रयुक्त की। उसका इतिहास क्या है, इन सारी बातों की चर्चा इसके अन्तर्गत की जा सकती है।
स्वरूप
भारतीय साहित्य किसे कहा जाए, इसकी चर्चा यानी भारतीय साहित्य के स्वरूप की चर्चा।
अनेक भाषों में लिखा हुआ एक भावधारा विचारधारा परंपरा सौन्दर्यशास्त्रीय अवधारणाओं को अभिव्यक्त करने वाला साहित्य- यानी भारतीय साहित्य।
1) वे मुद्दे जो इसे एक बनाते हैं-
v प्रस्थान-त्रयी( हजारी प्रसाद द्विवेदी) रामायण- महाभारत- गीता
v आधुनिक भाषाओं के विकास का संदर्भ ।
v सांस्कृतिक सातत्य ।
v हमारी साहित्यिक एवं भाषाई ही नहीं अपितु राजनैतिक एवं दार्शनिक और धार्मिक की साझा संस्कृति।
v अंग्रेज़ी का प्रभाव ।
v अनुवाद ।
v साहित्यिक स्वरूपों की समानता ।
v भारतीय साहित्य में द्विभाषिता एवं अनेक भाषिता की उपस्थिति ।

अध्ययन की समस्याएं
1.भाषाओं की जानकारी का अभाव तथा उसके प्रति रूचि का भी अभाव ।
2. अनुवाद की अल्पता की समस्या ।
3. अनूदित होने के कारण मूल कृति की भाषा तथा शिल्प की जानकारी का अभाव ।
4. अपरिचय (अन्य भाषा तथा साहित्य का) ।
5. विभिन्न भाषाओं के साहित्य के इतिहास की सभी/ अधिकांश भाषाओं में अप्राप्यता ।
6. संकुचित दृष्टिकोण का उदय एवं राष्ट्रीय भावना का क्रमशः तिरोधान ।
7. ग्लोबलाइज़ेशन के फलस्वरूप दूसरे के प्रति संवेदनहीनता की उपस्थिति ।

Monday, 19 July 2010

मुश्किल कैसे हो दूर

विद्यार्थी के रूप में हमारी सबसे बड़ी समस्या यही होती है कि एम.ए में प्रवेश लेने के बाद उस पाठ्यक्रम में अपने आप को स्थिर करते-करते लम्बा समय निकल जाता है । जब तक होश आता है , साथ-साथ परीक्षाएं भी आ ही जाती हैं। वर्षीय पद्धति में हमारे पास समय था, पर अब नहीं है। अतः जैसे फास्ट फुड होता है, आप भी इस पाठ्यक्रम में अपने आप को जल्दी ही व्यवस्थित कर लीजिए। इसी हेतु से हमने पहले की कुछ पोस्ट लिखी थी।
पहला काम आप यह कीजिए कि पहले दिन क्लास में आपको पाठ्यक्रम के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई थी। पर यह ज़रूरी नहीं कि आप ने सारी ग्रहण कर ही ली होगी। जहाँ आपको समझ में न आया हो, आप निःसंकोच अपने अध्यापकों से पूछ लीजिए। अगर यहाँ आप चूके तो समझ लीजिये कि आगे दिक्कतें आएंगी।
मुझे उम्मीद है आप अवश्य दो-चार दिनों में ही इस बात को समझ लेंगे। आप अगर इस ब्लॉग का उपयोग करेंगे तो आप को और सहूलियत हो जायेगी।

Tuesday, 13 July 2010

चन्द तस्वीरें .............

तस्वीरों में विभाग ....


हिन्दी विभाग, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद



हिन्दी-दिवस २००९- अस्मिता की अहमदाबाद शाखा का शुभारंभ

विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. परिमल त्रिवेदी द्वारा उद्घाटन

कुलपति डॉ.त्रिवेदी एवं भाषा-साहित्य भवन के निदेशक आचार्य वसंत भट्ट



दीप प्रज्जवलन - साथ में अस्मिता की उपाध्यक्षा नीलम कुलश्रेष्ठ


कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डॉ. मीरा वर्मा





स्वागत करते हुए हिन्दी विभाग की अध्यक्षा

डॉ. रंजना अरगडे


कार्यक्रम में शामिल कवियित्रियाँ, विभाग के विद्यार्थी एवं अतिथि गण
हिन्दी विभाग पहले से ही नई-नई और सर्वथा बेहतर कार्यक्रमों का आयोजन करता रहा है। पिछले साल हिन्दी दिवस के अवसर पर स्त्री-रचनाकारों ने कवियाएं पढ़ी गईं तथा अहमदाबद में यह इस तरह का यह पहला अवसर था।















आभार व्यक्त करते हुए विभाग की व्याख्याता डॉ. निशा रम्पाल
15 जुलाई 2010

नए पाठ्यक्रम के नूतन विद्यार्थियों का स्वागत है !

हाँ, यह एक नई शुरुआत है।
अब तक आप केवल सुनते थे, हम अध्यापक बोलते थे। परन्तु इस नए पाठ्यक्रम में आपको सुनने के साथ-साथ केवल बोलने की ही नहीं, सोचने और सृजन करने की ज़मीन भी मुहैय्या होगी। आप जितनी सतर्कता से यह काम करेंगे उतना ही आपको लाभ होगा। लाभ केवल भीतरी और गहरा ही नहीं प्रत्यक्ष और सतह पर भी दिखाई देगा। लेकिन इसके पहले आपको इस नए पाठ्यक्रम की उन विशेषताओं को जान लेना होगा जिसके अन्तर्गत यह पाठ्यक्रम बना है। तो चलिए , इस नए चुनाव आधारित सेमिस्टर पद्धति के देशकाल में घूम आएँ........
हिन्दी का हमारा यह पाठ्यक्रम पूरे भारतवर्ष की (लगभग) आपको सैर कराएगा। यह आपको सुदूर दक्षिण में तमिळनाडु...कर्णाटक से उत्तर-पूर्वी भारत, बंगाल, महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि समन्दर पार चीन, नोर्वे तथा वहाँ जहाँ हमारे ही पूर्वजों के मुख उकेरे गये हैं (शमशेर बहादुर सिंह की पंक्ति) ऐसे छोटे से टापू पर स्थित मॉरिशस की यात्रा भी करवाएगा। यह आपके साहित्यिक संस्कारों को सुदृढ ही नहीं करेगा बल्कि आपको ऐसे कौशलों से अवगत भी कराएगा कि जीवन में आप अपनी एक पहचान भी बना पाएंगे--- बशर्ते आप कुछ बातों को गंभीरता से लें और कुछ बातों की गंभीरता समझेः
अब आराम के दिन लद गए मेरे युवा साथियो ! अब तो मेहनत के दिन आए हैं, आने वाले संघर्ष के दिन एक महीन पर्दे के पीछे से झांक रहे हैं। उनका सामना करने के लिये आपको तैयार होना पड़ेगा। इसीलिए आपको दो-तीन बातें गांठ में बाँध लेनी पडेंगी ताकि सनद रहे और वक्त पे काम आए- (शमशेर बहादुर सिंह की पंक्ति)
पहली बात हैः आपकी हाजरी नियमित होनी चाहिये।
दूसरी बात हैः आपको पूरी सक्रियता के साथ अब पढ़ना पड़ेगा।
तीसरी बात हैः आपको बोलना पड़ेगा।
अगर आप में संकोच होगा तो उसे किसी पेड़ की खोह में रख आना पड़ेगा। यह पाठ्यक्रम इसकी भूमिका बनाएगा।
इस पाठ्यक्रम को इस तरह से आयोजित किया गया है किः
यह एक ऐसा पाठ्यक्रम है जो अब तक की हमारी पाठ्यक्रम संबंधी सोच से गुण तथा परिमाण की दृष्टि में कुछ अधिक बड़ा है।
यह पाठ्यक्रम आपकी बौद्धिक और सर्जनात्मक क्षमता को विकसित करेगा।
अगर अब तक ऐसा नहीं हुआ है आपके साथ, तो निश्चय ही इसका एक वातावरण निर्मित करेगा।
इस पाठ्यक्रम के कोर्सेस को अगर आप ध्यान दे कर पढेंगे तो आपको पता चलेगा कि इसमें पूरे भारत की सभी महत्वपूर्ण भाषाओं के साहित्य का समावेश किया गया है । आज जब राष्ट्र के, राष्ट्रीयता के स्मरण-विस्मरण के मायने बदल गये हैं, सामाजिक समता को हम केवल ऊपर-ऊपर से जानते है, उसकी जड़ों का हमें परिचय नहीं है; तब यह आवश्यक है कि हम अपनी व्यापक साहित्यिक परंपराओं में से ऐसे पाठ ढूँढें कि इन सब बातों की तरफ हमारा ध्यान जाए।
यह पाठ्यक्रम इस बात को भी रेखांकित करता है कि भाषा-साहित्य के पाठ जीवन – मूल्यों के साथ-साथ आजीविका के लिये भी अवसर प्रदान कर सकता है- बशर्ते आप स्वयं तैयार हों!
तो बस अब तैयार हो जाइए !
पुनः शुभकामनाएं !

Saturday, 29 May 2010

स्वागतम्

विद्यार्थी मित्रो,
इस साल से हम नई पठन-पाठन पद्धति में प्रवेश कर रहे हैं। अतः यह आवश्यक है कि हम नई अध्ययन पद्धतियों की तरफ़ मुड़ें। यह ब्लॉग आप के लिये है।
इस ब्लॉग की आवश्यकता क्यों
वर्ग में पढ़ाते हुए हो सकता है कि कुछ बातें अगर छूट जाएं या अधिक जानकारी और समझ की आवश्यकता हो तो हम ब्लॉग पर मिल सकते हैं।
कुछ अतिरिक्त जानकारी चाहिए तो हम यहाँ मिल सकते हैं।
आपके पास कुछ सवाल हों तो आप यहाँ दरवाज़ा खटखटा सकते हैं।