जिन खोजा तिन पाइयां

इस ब्लॉग में विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं के उत्तर देने की कोशिश की जाएगी। हिन्दी साहित्य से जुड़े कोर्सेस पर यहाँ टिप्पणियाँ होंगी,चर्चा हो सकेगी।

Friday, 22 July 2011

कुछ ज़रूरी बातें




मुझे उम्मीद है कि आपने अब तक विज्ञापन वाला लेख पढ़ लिया होगा। विज्ञापन के संदर्भ में आप नेट पर ITpedia में तथा 'भारतीय पक्ष' नामक साईट पर जाएं तथा और सामग्री प्राप्त करें। अगर इसके अलावा आपको कुछ मिले तो आप अपनी सूचना को अन्यों के साथ इस ब्लॉग पर बाँट सकते हैं। सेमिस्टर-3 के संदर्भ में कुछ प्रश्न आपके मन में और होंगे। मसलन HIN505EC के कोर्स के संदर्भ में । आगर आपके केन्द्र में तुलनात्मक साहित्य का विकल्प है तो आपको इसमें केवल दो कांड ही पढ़ने हैं। बालकांड तथा अयोध्या कांड। यानी कि रामचरित मानस के दो कांड एवं कम्ब रामायण के दो कांड। तुलनात्मक साहित्य के सैद्धांतिक प्रश्नों के अलावा आपको टैक्स्ट के जो सवाल करने होंगे उसमें ये दोनों कांड ही रहेंगे। यूं तो पूरा कंब रामायण बहुत रोचक है, पर हम छः महिने के सेमिस्टर में बहुत अधिक तो नहीं पढ़ सकते। फिर आप अपनी इच्छा से पूरा पढ़ सकते हैं। किंतु परीक्षा में तो केवल दो कांड ही आएंगे। मुझे विश्वास है आप सबने राहत की साँस ली होगी।
एक बात और मैं आपको बताना चाहती हूँ। अब तक आपने दो सेमिस्टर का अध्ययन कर लिया है। यूं तो अब इस नयी पद्धति से आप वाकिफ़ हो गए होंगे। पर मैं आपको याद दिलाना चाहूँगी और इस याद दिलाने के बहाने हमारे नए विद्यार्थियों को भी बताना चाहती हूँ कि आप इस बात को गाँठ में बाँध लें कि हम जब परीक्षा में लिखते हैं तो अगर यह पूछा जाए कि प्रश्न का उत्तर 200 शब्दों में देना है तो इसका मतलब 200 शब्द ही। अधिक से अधिक 250 तक की आपको छूट है। आप कितना भी सही और अच्छा लिखें पर अगर 400,600 शब्दों में लिखते चले जाएंगे तो आपको अच्छे अंक नहीं मिलेंगे। अब वह समय गया जब जितने ज्यादा पन्ने उतने ज्यादा अंक मिलते थे। आप सूचना का पालन करते हुए अगर लिखेंगे तो यह आदत आपको नेट, स्लेट की परीक्षा तथा अन्य स्पर्धात्मक परीक्षाओं में काम आएगी। वहाँ तो उत्तर लिखने के लिए एक निश्चित स्थान दिया जाता है, जिसमें आपको लिखना होता है। हमारे यहाँ चूँकि स्थान की बाध्यता नहीं है, अतः हम अपने उत्तर को फैलाने की छूट ले लेते हैं।
HIN501 के कोर्स में यूनिट चार तथा पाँच दोनों में उपन्यास छप गया है। परन्तु एक में उपन्यास है तो दूसरे में कहानी है, यह सुधार आप कर लें।
बस, आज के लिए इतना ही।

Monday, 4 July 2011

प्रयोजनमूलक हिन्दी

1
आप कल्पना कीजिए एक ऐसे समूह की, जिसमें कई तरह के लोग बैठे हैं। विभिन्न धर्म, जाति वर्ग के इस समूह में एक रोबो भी है - दिखता तो वह मनुष्य की तरह ही है, पर है तो वह मानवेतर -इतर-मानव। अगर हम जाति प्रथा में मानते हैं या पुरुष वर्चस्व वाली मानसिकता हमारी है, तो स्त्रियों एवं वर्णेतर समूह के प्रति हम कुछ संकोचशील एवं खिंचे-खिंचे रहेंगे। पर उस रोबो के प्रति हमारी वैसी मानसिकता नही होगी। केवल एक कुतुहल – सा , पर, फिर 'वह है तो मनुष्य-इतर', यह सोचकर हमारे लिए वह कोई खास महत्व का कभी नहीं होगा। परिधि पर का साहित्य( विशेष रूप से -दलित, नारी) अब भी कई लोगों के लिए वैसा ही है (अछूत-सा),पर प्रयोजन-मूलक तो उस रोबो की तरह है जो कुतूहल तो पैदा करता है परन्तु उपेक्षा जितना भी महत्वपूर्ण हमें कभी नहीं लगता। जहाँ तक कार्यालय से जुड़े प्रयोजनमूलक का संबंध है , तो हमें वह कभी भी अवरोध-रूप नहीं लगता । अर्थात् हमें उससे कोई ख़ास लेना-देना नहीं होता। पत्रकारिता ठीक है , कई बार हमें काम आती है और विज्ञापन से तो हमारा कोई लेना- देना ही नहीं होता। वही रिश्ता,अर्थात् कौतूहल अथवा मतलब का, किसी भी ग्राहक का एक उत्पाद से होता है। लेकिन हमारे कान तब खड़े हो जाते हैं जब हम साहित्यिक कृतियों के विज्ञापन में रूपांतरण करने की बात करते हैं। हमें अचानक लगने लगता है कि यह तो ज्यादती है। और लगना भी चाहिए। जो सुन्दर छवियां हमारे मन में कविताओं आदि की छप चुकी हैं उन्हें बाज़ार में लाते हुए हमारी सौन्दर्य-धर्मी ( जिसे ज़रूरत पड़ने पर हम मूल्य-धर्मी भी कहते हैं) रूह काँप जाती है।
साहित्य क्या है- इस परम्परागत प्रश्न का उत्तर देते हुए हम अपनी बात को शुरु करते हैं। उसके अनेकविध जवाब ढेरों पन्नों में छप चुके हैं, जिन्हें आप फुर्सत से पढ़ सकते हैं। उन तमाम परिभाषाओं के साथ, साहित्य आखिरकार तो एक कंटेंट है जिसे कवि-लेखक अपने बिम्बों , प्रतीकों, विचारों अलंकारों के माध्यम से एक स्वरूप देता है। उसे साहित्य बनाता है। यानि, हर साहित्यिक कृति को अगर रिड्यूस करें तो उसकी सबसे छोटी इकाई उसकी संकल्पना है। जब हम कहते हैं दाने आए घर के अंदर – तो इसका अर्थ हम रोटी ही लेते हैं, या फिर दाने लाने वाले मज़दूर -लक्षणा शक्ति के बल पर। और भूख का निदान, भरापन और समृद्धि क्रमशः अर्थ लेते हैं व्यंजना शक्ति के बल पर। मूल बात कंटेंट की है। साहित्य में जो सामग्री है उसमें विचार निहित होते हैं। असल में सबसे मूल्यवान तो विचार ही होते हैं। यही विचार, साहित्य,

विज्ञान, समाज-शास्त्र सभी प्रकार के ज्ञान का निर्माण करते हैं और इन्हीं को साहित्य में से परख कर/ढूँढ कर हम विज्ञापन का निर्माण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए यह विज्ञापन देखिए-



अब इस विज्ञापन को देख कर आपको कुछ परिचित –परिचित-सा लगा। हाँ, आपने कली और अलि पढ़ कर बिहारी को याद किया होगा। जी हाँ, नहिं पराग नहिं मधुर मधु वाला ही यह दोहा है। लेकिन साहित्य के अध्येताओं को इतनी सरलता से यह बात गले नहीं उतरेगी। यह बात बड़ी बेतुकी और विचित्र भी लग सकती है। इसे हम अपनी परंपरागत साहित्यिक दृष्टि पर आक्रमण ही समझेंगे। हम अब तक इस दोहे के साथ जिस सौन्दर्य दृष्टि को जोड़ते आए हैं, वह जैसे एकाएक कहीं ग़ायब हो जाती है। लेकिन अगर आप सोचेंगे तो इस दोहे के अब तक हुए अर्थ हमारी ज्ञान-संपदा का हिस्सा तो बन ही चुके हैं। इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। वह तो यथावत् है ही। इसमें कोई परिवर्तन तो नहीं होगा। जितनी सूक्ष्मता से हमारे इन कवियों का विश्लेषण हुआ है वह तो हमारे पास सुरक्षित है ही। उसे कोई बदल तो नहीं सकता। पुराने साहित्य को हम नए विमर्शों की दृष्टि से भी देखते-परखते हैं। उससे पुराने विश्लेषण पर कोई खतरा तो नहीं आ जाता। सवाल यह है कि यह हमारी एक पूँजी है जिसे हम अपने लिए नई दृष्टि से उपयोग मे ला सकते हैं। वेदादि तथा पुराणों को हमने भक्ति विमर्श में इस्तेमाल किया फिर उसी को हमने श्रृंगार-चित्रण तथा सत्ता की तरफ़दारी में प्रयुक्त किया। सामग्री वही है पर उसका उपयोग युगानुरूप अलग-अलग ढंग से करते रहे हैं।
इसी तरह एक और प्रसिद्ध दोहा लीजिए- कहत, नटत, रीझत खीजत...... इस दोहे को याद कर के हम सभी का दिल बाग़-बाग़ हो जाता है। इस के मूल विचार तक इसे जब हम रिड्यूस करते हैं , तो हमारी समझ में आ जाता है कि –Privacy in public place. भीड़ के स्थानों पर हमें अपने प्रियजन से संवाद करना है। इसका विस्तार करें तो भीड़ में खोए हुए लोगों को एक दूसरे को खोजना है। आपको यह बताना है कि अब कुंभ के मेले में कोई भाई अपने भाई से जुदा नहीं होगा। यानी कि कहत नटत .... एक मोबाईल का विज्ञापन बन सकता है। आप इसमें समाज के कई अन्य चित्र और संदर्भ जोडते चले जाएं। एक पूरी सीरीज़ बन सकती है विज्ञापन की।

हम सब कहीं-न-कहीं इस बात को समझते हैं कि अब हमारे पाठ्यक्रमों में मध्यकाल को पढ़ने-पढ़ाने वालों की संख्या भी कम होती जा रही है। उसकी उपयोगिता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। अतः हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या पर उसका असर पड़ता जा रहा है। ज़रूरी यह है कि अपने पाठ्यक्रमों के इन यूनिट्स को आज की आवश्यकता के अनुसार ढाल लेना चाहिए। हम यह भी सोचते हैं कि इसका मतलब तो यह हुआ हमें बाज़ार की आवश्यकताओं के सामने क्या घुटने टेक देने चाहिए। लेकिन बात को इस सिरे से नहीं पकड़ना चाहिए। हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि कृति के केन्द्र में तो विचार अथवा भाव ही है। उस विचार के बीज को अगर आप पकड़ सकते हैं, तो आप उसका विनियोग विज्ञापन में कर सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्य पक्ष तथा उसके सामाजिक पक्ष की जानकारी जितनी गहरी होगी उतने बेहतर विज्ञापन आप बना सकते हैं। हैवेल्स का विज्ञापन प्रेमचंद की ईदगाह कहानी ही तो है। वहाँ हामिद और दादी है यहाँ एक बच्चा और उसकी माँ है। हैवेल्स के इस विज्ञापन की संवेदनशीलता के मूल में प्रेमचंद की उस कहानी की संवेदनशीलता ही तो है, जो उस तरह के मेले और उस तरह के बच्चे समाप्त हो जाने पर भी समय के साथ बदल जाती है, किन्तु प्रभावित तो करती ही है।
आपने देखा होगा कि श्रृंगार रस का यह(बिहारी) दोहा सामाजिक जागृति का काम करता है। (अगर इस तरह आप देखेंगे तो) आपको यह भी ध्यान आएगा कि उस समय के कवि समाज के प्रति विमुख तो नहीं थे। क्योंकि कोई भी रचना अपना कंटेंट समाज से ही लेती है। उस समय राजा से प्रजा तक यह बात विद्यमान होगी। लेकिन जिस के सिर पर राष्ट्र की, शासन की, राज्य की ज़िम्मेदारी है वह तो विमुख नहीं ही हो सकता है। लेकिन अगर वही कंटेंट आज भी है , और अगर लोकतंत्र भी है, तो इसका इस्तेमाल हम सामाजिक जागृति के विषयों में कर सकते हैं। साहित्य में देखा जाए तो सामाजिक संदर्भों के ऐसे कूट समाए होते हैं जो हो सकता है कि हमें तत्काल समझ में न आएं, पर परिस्थितियाँ, भूतकाल में रचे साहित्य के वर्तमान अर्थों को खोलने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एक ही कंटेंट को अभिव्यक्ति के भिन्न माध्यमों द्वारा भिन्न अर्थ-स्तरों तक पहुँचते हुए हम देख सकते हैं। रीतिकाल में जो श्रृंगार रस की रचना थी आज विज्ञापन के माध्यम से आप उसके द्वारा सामाजिक जागृति के अर्थ तक पहुँच सकते हैं।
आज बाज़ार में सर्वाधिक अगर कुछ बिकता है तो सौन्दर्य प्रसाधन। रीतिकाल में नायक-नायिकाओं के सौन्दर्य निरूपण एवं अंग-निरूपण के इतने उदाहरण हैं कि सौन्दर्य प्रसाधनों से पटे पड़े बाज़ार में इससे बेहतर और कौन-सा कंटेंट हो सकता है।
2
विज्ञापन की दुनिया हमारी वास्तविक दुनिया के इतने क़रीब एक ऐसा मायाजाल रचती है कि हम उसे एक ठोस वास्तविकता के रूप में ही स्वीकारने लगते हैं। विज्ञापन की दुनिया हमारी वास्तविक दुनिया से ही पदार्थ लेती है, वह हमारी इच्छा, स्वप्न तथा आकांक्षाओं पर पलती-बढ़ती है, निर्मित होती है। अतः वह एक तरह से हमारी वास्तविक दुनिया ही है ऐसा कहा जा सकता है। परन्तु यह मायाजाल इसलिए है कि यह दुनिया हमें ऐसे काल्पनिक और कई बार असंभव दुनिया में ले जाने का स्वप्न दिखाती है, जो अक्सर सही नहीं साबित होते , अतः यह मायाजाल है। जैसे कोई भी शैंपू आपके बालों को इतना सशक्त नहीं बनाता कि आप अपने बालों से ट्रैक्टर खींच सकें। या कोई भी साबुन आपको सुंदर नहीं बना सकता अगर आप सुंदर नहीं हैं तो ! या आप अचानक स्वस्थ नहीं बन सकते, चाहे जो खाएं। अतः यह एक प्रकार का मायजाल ही है। पर फिर भी विज्ञापन के बिना आज की दुनिया की कल्पना करना कठिन ही है। ये विज्ञापन हमारे संबंधों, भावनाओं के साथ जुड़ गए-से लगते हैं। समय के साथ हम यह भी देख सकते हैं कि जिन्सों के अलावा अब हमारे तीज-त्यौहार, हमारी पूजा अर्चना, हमारे पारिवारिक व्यवहार तथा संवेदना के मूल्य भी विज्ञापनों के द्वारा ही हमारी स्मृति का द्वार खटखटाते दिखाई पड़ते हैं। अपने काम-काज में व्यस्त बाहरी दुनिया में काम करती पीढ़ी(स्त्री-पुरुष- दोनों ही) को इन विज्ञापनों से ही पता चलता है कि कब करवा चौथ है, कब रक्षा-बंधन और कब गणेश-चतुर्थी। उसे जो कुछ भी करना-कराना है, विज्ञापन ही बताएंगे मसलन उसे तोहफ़े में क्या ले जाना है और कौन-सी मिठाई खानी है।
विज्ञापन हमें प्रभावित करते हैं। चाहे जितना हम उनसे बचना चाहें, पर रेडियो द्वारा, टी.वी द्वारा. सड़क पर लगे होर्डिंग्स द्वारा, अख़बारों, पत्रिकाओं, पैम्फ्लेट, दीवारें.... कितनी ही जगहों के बारे में और तरीकों के बारे में आप सोचें – विज्ञापन तो आपको दिख ही जाएंगे। उत्पाद बेचते विज्ञापन, सरकारी योजनाओं को प्रचारित करते विज्ञापन, विकास की सरकारी नीतियों की ओर ले जाते विज्ञापन .... अर्थात् हमारा पूरा जीवन, हमारी सोच, हमारी भविष्य संबंधी चिंताएं.... सभी को इस दौर में अभिव्यक्त करने का काम विज्ञापन करते हैं।
विज्ञापन अभिव्यक्ति (कॉम्युनिकेशन) का एक अलहदा माध्यम है। और जैसा कि ऊपर कहा गया है वह हम तक उत्पाद, विकास तथा विचार का संप्रेषण करते हैं। उत्पाद तथा विकास ठोस हैं। दृश्यमान है। विचार ठोस तो हो सकते हैं पर दृश्यमान नहीं होते। उत्पाद पदार्थ है, विकास क्रिया है, कार्य है। पर दोनों ठोस हैं, दिखाई पड़ते हैं। विचा,र पदार्थ तथा विकास की तरह नहीं होते। अर्थात् न ही वह पदार्थ की तरह

स्थिर है, न विकास की तरह क्रियाशील ही ।( यही बात साहित्य के बारे में भी कही जा सकती है। लेकिन इनके अंतर के विषय में आगे बात होगी।) परन्तु विज्ञापन के माध्यम से, विचार, ठोस तथा क्रियाशील दोनों ही बन सकता है। विचार उत्पाद में वैचारिकता तथा विकास में ठोसत्व लाने का काम करता है। वह उसमें एक प्रकार का आकर्षण भी उत्पन्न करता है।
साहित्य भी एक प्रकार का संप्रेषण ही है।( एक दृष्टि से वह(साहित्य) स्वयं उत्पाद है।) पर वह न तो पदार्थ का संप्रेषण करता है न ही विकास की क्रियाशील प्रस्तुति करता है। आपके मन में तुरंत यह बात आ सकती है कि रस की चर्चा करते समय रस का उल्लेख पदार्थ की तरह किया गया है। लेकिन रस का पदार्थत्व उत्पाद के पदार्थत्व से भिन्न है। एक का भौतिक तथा दूसरे का अ-भौतिक। अतः साहित्य अ-भौतिक पदार्थों(भाव रसादि एवं छन्द-अलंकारादि) का संप्रेषण करता है। इन सब अ-भौतिक तत्वों से मिल कर वह एक अ-भौतिक पदार्थ बनता है। प्राचीन काल में पांडुलिपियाँ तथा वर्तमान काल में पृष्ठों(कागज़) में निबद्ध उसका उत्पादन असल में उसकी पैकेजिंग है। जो प्रकाशन संस्था जितनी समृद्ध है वह उतना ही बढिया पैकेजिंग करती है।
साहित्य का संबंध मनुष्य की उन वृत्तियों से है जो बाजार में बिकाऊ नहीं हैं। पर इन अ-भौतिक पदार्थों को (भाव-सौन्दर्यादि) समाज में संप्रेषणीय बनाने के लिए साहित्यकार कुछ बिम्ब कुछ चित्र कुछ ऐसे सामाजिक प्रतीकों को चुनता है, जो भौतिक पदार्थों का आकार ग्रहण करते हैं। नायिका की सुन्दरता को चाँद, गुलाब, कमल मछली आदि बताना या लोगों के बीच को संबंधों तथा आशा-निराशाओं वफादारियाँ-धोखेबाज़ियाँ, उत्साह-ईर्ष्या को बताने के लिए पदार्थ-प्रतीकों,प्रसंगों, घटनाओं, मिथकों का उपयोग किया ही जाता है। यही वह स्थान है जब साहित्य की रचनाएं हमारे काम आ सकती हैं। साहित्य में भी भाव-सौन्दर्य का जो ठोस स्वरूप है जिसे बिम्बों,अलंकारों आदि के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है, वह विज्ञापन की संकल्पना निर्माण में बहुत उपयोगी हो सकता है।
विज्ञापन में विचार की संकल्पना के बीज साहित्य की कृतियों में बिखरे पड़े हैं। लेकिन इन बीजों को पकड़ने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम इन बातों को समझ लें-
1-विज्ञापन-निर्माण के बिन्दु
2-विज्ञापन का टार्गेट-ग्रुप

3-विज्ञपित वस्तु, पदार्थ का प्रकार( कैटेगरी)
4-विज्ञापन का माध्यम (पत्र-पत्रिकाएं, दृश्य-श्राव्य आदि)
5- साहित्य कृति में से विचार, संकल्पना को आकारित करने की क्षमता का विकास करना।
6- कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करने की क्षमता को विकसित करना।
7- संकल्पना को ठीक-ठीक भाषा में अभिव्यक्त करने के लिए भाषा की बारीकियों को समझना तथा भाषा का दोष-हीन प्रयोग करने के लिए भाषा-ज्ञान की पूरी जानकारी।
8-साहित्य के सौंदर्य-पक्ष तथा साहित्य के समाज-शास्त्रीय पक्ष की पहचान करना।
हम लोग तो साहित्य के विद्यार्थी हैं, अतः हमें विज्ञापन कैसे बनता है, इसकी तकनीकी जानकारी नहीं होती, यह स्वाभाविक ही है। पर जैसे नाट्यकार के लिए रंगमंच का ज्ञान होना ज़रूरी है, इतना भर कि वह नाटक लिखते समय यह देख सके कि रंगमंच पर लिखा हुआ दृश्य संभव है या नहीं। यानी उसे अपने माध्यम की जानकारी होनी चाहिए ठीक उस स्क्रिप्ट लेखक की तरह जिसे कुछ-कुछ फिल्म टेकनीक का पता होना चाहिए जैसे कि एक अंपायर, चाहे न बल्लेबाजी करता हो न गेंदबाजी, पर उसे क्रिकेट की जानकारी तो होनी ही चाहिए। हम विज्ञापन की कॉपीराइटिंग करने का काम कर सकते हैं। पर कॉपीराइटर के रूप में हमें यह पता होना चाहिए कि इस विज्ञापन का टार्गेट ऑडियंस कौन-सा है। हमारा कंटेंट, हमारी भाषा , हमारा अंदाज़- सभी उस टार्गेट ऑडियन्स पर आधारित होना चाहिए। फिर हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि जिस विज्ञापन के लिए हमें कॉपीराइटिंग करना है, उसकी श्रेणी कौन-सी है। वह व्यावसायिक विज्ञापन है अथवा सामाजिक, राजनैतिक जागृति से संबंधित है अथवा विकास से जुड़ा है। सभी श्रेणियों के विज्ञापन का स्वरूप तथा गौण संरचना अलग होगी। प्राथमिक संरचना तो एक जैसी ही होती है। प्राथमिक संरचना का अर्थ है- प्रत्येक विज्ञापन प्रचार के लिए होता है और संप्रेषणीयता उसकी पहली शर्त है। वह बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि वह प्रभावशाली होना चाहिए। गौण संरचना का अर्थ यह है कि श्रेणियों के अनुरूप भाषा तथा दृश्यों का प्रयोग। वैसे, दृश्य भी विज्ञापनों में भाषा का काम देते हैं। पर दृश्य कैसा होना चाहिए, यह भी विज्ञापन की कॉपीराइटिंग का कच्चा हिस्सा होते हैं।(कच्चा इसलिए कि बाद में उस पर काम होता है।) फिर व्यावसायिक विज्ञापन कई बार श्रेणी बद्ध रूप से तैयार

किए जाते हैं। एक ही विचार या संकल्पना को विभिन्न परिस्थितियों में विकसित किया जाता है। जैसे कोई कवि एक ही बात को विभिन्न बिम्बों के माध्यम से प्रकट करता है। इस बात को हमने कहत नटत वाले उदाहरण से भी देखा ।
विज्ञापन मीडिया के किस माध्यम के द्वारा प्रसारित होना है, उसके आधार पर कॉपीराइटर को अपना काम करना होता है। वह पत्र-पत्रिकाओं में अथवा अख़बार में छपने वाला है अथवा रेडियो से प्रसारित होगा या फिर दृश्य माध्यमों द्वारा पहुँचाया जाने वाला। दृश्य माध्यमों में कम लेखन, श्रव्य माध्यमों में ध्वनि का आधिक्य (संगीत आदि) एवं लेखन तथा प्रकाशित माध्यमों में ज़बरदस्त प्रभावशाली भाषा-प्रयोग- बहुत आवश्यक है। आप अगर हिन्दी में कंप्यूटिंग सीख लेंगे तो आप इन तीनों माध्यमों द्वारा बेहतर विज्ञापन के कॉपीराइटर बन सकेंगे। लेकिन इतना सब करने के लिए भाषा का दोषहीन प्रयोग अथवा भाषा की पूरी जानकारी या सही जानकारी ही आपको अच्छा कॉपीराइटर बना सकेगा। निराला ने छन्द तोड़ने की बात इसलिए की, क्योंकि उन्हें छन्द का ज्ञान था। ठंडा यानी कोका कोला सुनने पर सरल लगता है, पर इस सरलता तक तभी पहुँच सकेंगे जब आप भाषा पर अधिकार रखते हों। कोका कोला तभी कोकाकोला होता है जब वह ठंड़ा होता है। उसका मूल कंसेप्ट साहित्य के विद्यार्थी बेहतर निकाल सकते हैं क्योंकि हमने अपने विभिन्न कोर्सेस में उसे पढ़ रखा है। आप देखिए आपको विज्ञापन के लिए कॉपीराइटर बनाने में साहित्य की बेहतर समझ ही काम आएगी। आप साहित्य के समाजशास्त्रीय पक्ष को तथा सौन्दर्य पक्ष को जितनी गहराई से समझेंगे उतना ही विज्ञापन लेखन में सफल होंगे।
देश की सुरक्षा बिना सैनिकों के संभव नहीं है। सालभर में सैनिकों को हम अलग अलग अवसरों पर याद करते हैं। हमारे कवियों ने ढेरों रचनाएं इन पर लिखी हैं। आप को अगर इस से संबंधित कोई कॉपीराइटिंग करनी हो, तो आप कौन-सी कविता चुनेंगे ? आप जब देखना शुरु करेंगे और कॉपीराइटिंग की दृष्टि से उस पर सोचना आरंभ करेंगे कि संदेश पहुँचे भी, मार्मिक भी हो, दृश्य की दृष्टि से सटीक भी और आपका पढ़ा साहित्य आपके काम भी आए..... तो आप किस कविता को चुनेंगे। आप सोच कर देखिए। क्या पुष्प की अभिलाषा कविता प्रभावशाली होगी... तो बना कर देखिए कोई विज्ञापन। उसका टार्गेट ऑडिएंस कौन-सा होगा, उसकी भाषा कौन-सी होगी, वह किस श्रेणी में आता हे......इत्यादि, इत्यादि।
अब आप देखिए उसने कहा था कहानी है... वह किस प्रकार के विज्ञापन में आपकी मदद कर सकती है। कहानी तो प्रेम की है, उसका बैकड्रॉप युद्ध है.....। आप सोच कर देखिए। इसकी एक प्रोसेस है। प्रेम

आपको क्या देता है- आश्वासन एवं शीतलता। वह आजीवन साथ का आश्वासन देता है। उससे आपका जीवन निश्चिंत हो जाता है। अब इस थीम के आस पास आप एक व्यावसायिक एवं जीवन सुरक्षा का कोई विज्ञापन बना सकते हैं। जीवन सुरक्षा में क्या आता है, यह अब आप सोचिए। बीमा पॉलिसी ? व्यावसायिकता में किस उत्पाद की बात हो सकती है। लेखक ने तो कहानी में लिखा ही है। लहनासिंह क्या खरीदने बाज़ार गया था। अब यह एक कहानी आपको दो श्रेणियों के विज्ञापनों की कॉपीराइटिंग करने में मदद कर सकती है।
' देखा मुझे उस दृष्टि से जो मार खा रोई नहीं...' यह पंक्ति ग्रास रूट के स्तर तक हुए स्त्री –सशक्तिकरण तथा स्त्री जागृति को बताने के लिए कितना प्रभावशाली विज्ञापन बनाने में मददरूप हो सकती है।
पूरा शहर अँधेरे में डूबा है,
शर्माजी के घर उजाला !?! कैसे।
जी हाँ...--------- लैंप का कमाल!
अब बताइए, इस विज्ञापन के मूल में कौन-सी रचना है। (आप भी खरीदिए और एक चाँद अपने घर ले आइए।)
आपको किसी नए वाद्य या किसी म्यूज़िक कंपनी के लिए विज्ञापन बनाना हो तो आप को किस कविता से मदद मिल सकती है ? क्या आप को कुछ याद आता है ? आपको यह बताना है कि यह नया वाद्य सर्वथा नया है, औरों से अलग... तो आप किस कविता के उपयोग के बारे में सोच सकते हैं- इस पर सोचिए। क्या- नव गति नव लय ताल छन्द नव- से आप कुछ बना सकते हैं ?!?
आपने अब तक अंदाज़ा लगा लिया होगा कि अगर हम अपने विषय ( हिन्दी साहित्य) को ठीक से हृदयंगम करेंगे और भाषा पर प्रभुत्व प्राप्त कर सकेंगे तो इस क्षेत्र में हम से अच्छा कॉपीराइटर कहाँ मिलेगा। आप इतिहास पढ़ते हैं, तो सामग्री को एकत्रित करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। आप गद्य-पद्य पढ़ते हैं तो सौन्दर्य तथा समाजशास्त्रीय पक्ष को जानने लगते हैं, आप काव्य-शास्त्र पढ़ते हैं तो संकल्पनाओं का आकलन करना आपको आ जाता है, आप अनुवाद, प्रयोजन मूलक आदि पढ़ते हैं तो सही स्थान पर सही एवं

9498औचित्यपूर्ण शब्द रखने का बोध आपको हो जाता है, मध्यकालीन साहित्य आपको एक सांस्कृतिक आधार देता है, नाटक आपको सिखता है कि समय को सही रूप में कैसे पकड़ें.... यह सभी गुण एक कॉपीराइटर में होना ज़रूरी है।


Sunday, 3 July 2011

विज्ञापन


एक आवश्यक सूचना

आपने साहित्य का विज्ञापन में विनियोग वाला लेख देखा होगा। उसमें लेख के बीच में बड़ा गैप आपको मिलेगा। असल में वहाँ एक विज्ञापन जाना था जो कुछ तकनीकी समस्या की वजह से नहीं जा सका। मैं कोशिश कर रही हूँ कि उसे किसी अन्य फ़ॉर्मेट में भेजूँ। वरना उसी हार्ड-कॉपी आप को सत्र आरंभ होते ही मिल जाएगी। अतः उस विज्ञापन की कल्पना कर के आगे का लेख पढ़ें।

Saturday, 2 July 2011

विज्ञापन उद्योग में साहित्य का विनियोग



1
आप कल्पना कीजिए एक ऐसे समूह की, जिसमें कई तरह के लोग बैठे हैं। विभिन्न धर्म, जाति वर्ग के इस समूह में एक रोबो भी है - दिखता तो वह मनुष्य की तरह ही है, पर है तो वह मानवेतर -इतर-मानव। अगर हम जाति प्रथा में मानते हैं या पुरुष वर्चस्व वाली मानसिकता हमारी है, तो स्त्रियों एवं वर्णेतर समूह के प्रति हम कुछ संकोचशील एवं खिंचे-खिंचे रहेंगे। पर उस रोबो के प्रति हमारी वैसी मानसिकता नही होगी। केवल एक कुतुहल – सा , पर, फिर 'वह है तो मनुष्य-इतर', यह सोचकर हमारे लिए वह कोई खास महत्व का कभी नहीं होगा। परिधि पर का साहित्य( विशेष रूप से -दलित, नारी) अब भी कई लोगों के लिए वैसा ही है (अछूत-सा),पर प्रयोजन-मूलक तो उस रोबो की तरह है जो कुतूहल तो पैदा करता है परन्तु उपेक्षा जितना भी महत्वपूर्ण हमें कभी नहीं लगता। जहाँ तक कार्यालय से जुड़े प्रयोजनमूलक का संबंध है , तो हमें वह कभी भी अवरोध-रूप नहीं लगता । अर्थात् हमें उससे कोई ख़ास लेना-देना नहीं होता। पत्रकारिता ठीक है , कई बार हमें काम आती है और विज्ञापन से तो हमारा कोई लेना- देना ही नहीं होता। वही रिश्ता,अर्थात् कौतूहल अथवा मतलब का, किसी भी ग्राहक का एक उत्पाद से होता है। लेकिन हमारे कान तब खड़े हो जाते हैं जब हम साहित्यिक कृतियों के विज्ञापन में रूपांतरण करने की बात करते हैं। हमें अचानक लगने लगता है कि यह तो ज्यादती है। और लगना भी चाहिए। जो सुन्दर छवियां हमारे मन में कविताओं आदि की छप चुकी हैं उन्हें बाज़ार में लाते हुए हमारी सौन्दर्य-धर्मी ( जिसे ज़रूरत पड़ने पर हम मूल्य-धर्मी भी कहते हैं) रूह काँप जाती है।
साहित्य क्या है- इस परम्परागत प्रश्न का उत्तर देते हुए हम अपनी बात को शुरु करते हैं। उसके अनेकविध जवाब ढेरों पन्नों में छप चुके हैं, जिन्हें आप फुर्सत से पढ़ सकते हैं। उन तमाम परिभाषाओं के साथ, साहित्य आखिरकार तो एक कंटेंट है जिसे कवि-लेखक अपने बिम्बों , प्रतीकों, विचारों अलंकारों के माध्यम से एक स्वरूप देता है। उसे साहित्य बनाता है। यानि, हर साहित्यिक कृति को अगर रिड्यूस करें तो उसकी सबसे छोटी इकाई उसकी संकल्पना है। जब हम कहते हैं दाने आए घर के अंदर – तो इसका अर्थ हम रोटी ही लेते हैं, या फिर दाने लाने वाले मज़दूर -लक्षणा शक्ति के बल पर। और भूख का निदान, भरापन और समृद्धि क्रमशः अर्थ लेते हैं व्यंजना शक्ति के बल पर। मूल बात कंटेंट की है। साहित्य में जो सामग्री है उसमें विचार निहित होते हैं। असल में सबसे मूल्यवान तो विचार ही होते हैं। यही विचार, साहित्य,

विज्ञान, समाज-शास्त्र सभी प्रकार के ज्ञान का निर्माण करते हैं और इन्हीं को साहित्य में से परख कर/ढूँढ कर हम विज्ञापन का निर्माण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए यह विज्ञापन देखिए-

































अब इस विज्ञापन को देख कर आपको कुछ परिचित –परिचित-सा लगा। हाँ, आपने कली और अलि पढ़ कर बिहारी को याद किया होगा। जी हाँ, नहिं पराग नहिं मधुर मधु वाला ही यह दोहा है। लेकिन साहित्य के अध्येताओं को इतनी सरलता से यह बात गले नहीं उतरेगी। यह बात बड़ी बेतुकी और विचित्र भी लग सकती है। इसे हम अपनी परंपरागत साहित्यिक दृष्टि पर आक्रमण ही समझेंगे। हम अब तक इस दोहे के साथ जिस सौन्दर्य दृष्टि को जोड़ते आए हैं, वह जैसे एकाएक कहीं ग़ायब हो जाती है। लेकिन अगर आप सोचेंगे तो इस दोहे के अब तक हुए अर्थ हमारी ज्ञान-संपदा का हिस्सा तो बन ही चुके हैं। इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। वह तो यथावत् है ही। इसमें कोई परिवर्तन तो नहीं होगा। जितनी सूक्ष्मता से हमारे इन कवियों का विश्लेषण हुआ है वह तो हमारे पास सुरक्षित है ही। उसे कोई बदल तो नहीं सकता। पुराने साहित्य को हम नए विमर्शों की दृष्टि से भी देखते-परखते हैं। उससे पुराने विश्लेषण पर कोई खतरा तो नहीं आ जाता। सवाल यह है कि यह हमारी एक पूँजी है जिसे हम अपने लिए नई दृष्टि से उपयोग मे ला सकते हैं। वेदादि तथा पुराणों को हमने भक्ति विमर्श में इस्तेमाल किया फिर उसी को हमने श्रृंगार-चित्रण तथा सत्ता की तरफ़दारी में प्रयुक्त किया। सामग्री वही है पर उसका उपयोग युगानुरूप अलग-अलग ढंग से करते रहे हैं।
इसी तरह एक और प्रसिद्ध दोहा लीजिए- कहत, नटत, रीझत खीजत...... इस दोहे को याद कर के हम सभी का दिल बाग़-बाग़ हो जाता है। इस के मूल विचार तक इसे जब हम रिड्यूस करते हैं , तो हमारी समझ में आ जाता है कि –Privacy in public place. भीड़ के स्थानों पर हमें अपने प्रियजन से संवाद करना है। इसका विस्तार करें तो भीड़ में खोए हुए लोगों को एक दूसरे को खोजना है। आपको यह बताना है कि अब कुंभ के मेले में कोई भाई अपने भाई से जुदा नहीं होगा। यानी कि कहत नटत .... एक मोबाईल का विज्ञापन बन सकता है। आप इसमें समाज के कई अन्य चित्र और संदर्भ जोडते चले जाएं। एक पूरी सीरीज़ बन सकती है विज्ञापन की।

हम सब कहीं-न-कहीं इस बात को समझते हैं कि अब हमारे पाठ्यक्रमों में मध्यकाल को पढ़ने-पढ़ाने वालों की संख्या भी कम होती जा रही है। उसकी उपयोगिता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। अतः हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या पर उसका असर पड़ता जा रहा है। ज़रूरी यह है कि अपने पाठ्यक्रमों के इन यूनिट्स को आज की आवश्यकता के अनुसार ढाल लेना चाहिए। हम यह भी सोचते हैं कि इसका मतलब तो यह हुआ हमें बाज़ार की आवश्यकताओं के सामने क्या घुटने टेक देने चाहिए। लेकिन बात को इस सिरे से नहीं पकड़ना चाहिए। हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि कृति के केन्द्र में तो विचार अथवा भाव ही है। उस विचार के बीज को अगर आप पकड़ सकते हैं, तो आप उसका विनियोग विज्ञापन में कर सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्य पक्ष तथा उसके सामाजिक पक्ष की जानकारी जितनी गहरी होगी उतने बेहतर विज्ञापन आप बना सकते हैं। हैवेल्स का विज्ञापन प्रेमचंद की ईदगाह कहानी ही तो है। वहाँ हामिद और दादी है यहाँ एक बच्चा और उसकी माँ है। हैवेल्स के इस विज्ञापन की संवेदनशीलता के मूल में प्रेमचंद की उस कहानी की संवेदनशीलता ही तो है, जो उस तरह के मेले और उस तरह के बच्चे समाप्त हो जाने पर भी समय के साथ बदल जाती है, किन्तु प्रभावित तो करती ही है।
आपने देखा होगा कि श्रृंगार रस का यह(बिहारी) दोहा सामाजिक जागृति का काम करता है। (अगर इस तरह आप देखेंगे तो) आपको यह भी ध्यान आएगा कि उस समय के कवि समाज के प्रति विमुख तो नहीं थे। क्योंकि कोई भी रचना अपना कंटेंट समाज से ही लेती है। उस समय राजा से प्रजा तक यह बात विद्यमान होगी। लेकिन जिस के सिर पर राष्ट्र की, शासन की, राज्य की ज़िम्मेदारी है वह तो विमुख नहीं ही हो सकता है। लेकिन अगर वही कंटेंट आज भी है , और अगर लोकतंत्र भी है, तो इसका इस्तेमाल हम सामाजिक जागृति के विषयों में कर सकते हैं। साहित्य में देखा जाए तो सामाजिक संदर्भों के ऐसे कूट समाए होते हैं जो हो सकता है कि हमें तत्काल समझ में न आएं, पर परिस्थितियाँ, भूतकाल में रचे साहित्य के वर्तमान अर्थों को खोलने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एक ही कंटेंट को अभिव्यक्ति के भिन्न माध्यमों द्वारा भिन्न अर्थ-स्तरों तक पहुँचते हुए हम देख सकते हैं। रीतिकाल में जो श्रृंगार रस की रचना थी आज विज्ञापन के माध्यम से आप उसके द्वारा सामाजिक जागृति के अर्थ तक पहुँच सकते हैं।
आज बाज़ार में सर्वाधिक अगर कुछ बिकता है तो सौन्दर्य प्रसाधन। रीतिकाल में नायक-नायिकाओं के सौन्दर्य निरूपण एवं अंग-निरूपण के इतने उदाहरण हैं कि सौन्दर्य प्रसाधनों से पटे पड़े बाज़ार में इससे बेहतर और कौन-सा कंटेंट हो सकता है।
2
विज्ञापन की दुनिया हमारी वास्तविक दुनिया के इतने क़रीब एक ऐसा मायाजाल रचती है कि हम उसे एक ठोस वास्तविकता के रूप में ही स्वीकारने लगते हैं। विज्ञापन की दुनिया हमारी वास्तविक दुनिया से ही पदार्थ लेती है, वह हमारी इच्छा, स्वप्न तथा आकांक्षाओं पर पलती-बढ़ती है, निर्मित होती है। अतः वह एक तरह से हमारी वास्तविक दुनिया ही है ऐसा कहा जा सकता है। परन्तु यह मायाजाल इसलिए है कि यह दुनिया हमें ऐसे काल्पनिक और कई बार असंभव दुनिया में ले जाने का स्वप्न दिखाती है, जो अक्सर सही नहीं साबित होते , अतः यह मायाजाल है। जैसे कोई भी शैंपू आपके बालों को इतना सशक्त नहीं बनाता कि आप अपने बालों से ट्रैक्टर खींच सकें। या कोई भी साबुन आपको सुंदर नहीं बना सकता अगर आप सुंदर नहीं हैं तो ! या आप अचानक स्वस्थ नहीं बन सकते, चाहे जो खाएं। अतः यह एक प्रकार का मायजाल ही है। पर फिर भी विज्ञापन के बिना आज की दुनिया की कल्पना करना कठिन ही है। ये विज्ञापन हमारे संबंधों, भावनाओं के साथ जुड़ गए-से लगते हैं। समय के साथ हम यह भी देख सकते हैं कि जिन्सों के अलावा अब हमारे तीज-त्यौहार, हमारी पूजा अर्चना, हमारे पारिवारिक व्यवहार तथा संवेदना के मूल्य भी विज्ञापनों के द्वारा ही हमारी स्मृति का द्वार खटखटाते दिखाई पड़ते हैं। अपने काम-काज में व्यस्त बाहरी दुनिया में काम करती पीढ़ी(स्त्री-पुरुष- दोनों ही) को इन विज्ञापनों से ही पता चलता है कि कब करवा चौथ है, कब रक्षा-बंधन और कब गणेश-चतुर्थी। उसे जो कुछ भी करना-कराना है, विज्ञापन ही बताएंगे मसलन उसे तोहफ़े में क्या ले जाना है और कौन-सी मिठाई खानी है।
विज्ञापन हमें प्रभावित करते हैं। चाहे जितना हम उनसे बचना चाहें, पर रेडियो द्वारा, टी.वी द्वारा. सड़क पर लगे होर्डिंग्स द्वारा, अख़बारों, पत्रिकाओं, पैम्फ्लेट, दीवारें.... कितनी ही जगहों के बारे में और तरीकों के बारे में आप सोचें – विज्ञापन तो आपको दिख ही जाएंगे। उत्पाद बेचते विज्ञापन, सरकारी योजनाओं को प्रचारित करते विज्ञापन, विकास की सरकारी नीतियों की ओर ले जाते विज्ञापन .... अर्थात् हमारा पूरा जीवन, हमारी सोच, हमारी भविष्य संबंधी चिंताएं.... सभी को इस दौर में अभिव्यक्त करने का काम विज्ञापन करते हैं।
विज्ञापन अभिव्यक्ति (कॉम्युनिकेशन) का एक अलहदा माध्यम है। और जैसा कि ऊपर कहा गया है वह हम तक उत्पाद, विकास तथा विचार का संप्रेषण करते हैं। उत्पाद तथा विकास ठोस हैं। दृश्यमान है। विचार ठोस तो हो सकते हैं पर दृश्यमान नहीं होते। उत्पाद पदार्थ है, विकास क्रिया है, कार्य है। पर दोनों ठोस हैं, दिखाई पड़ते हैं। विचा,र पदार्थ तथा विकास की तरह नहीं होते। अर्थात् न ही वह पदार्थ की तरह

स्थिर है, न विकास की तरह क्रियाशील ही ।( यही बात साहित्य के बारे में भी कही जा सकती है। लेकिन इनके अंतर के विषय में आगे बात होगी।) परन्तु विज्ञापन के माध्यम से, विचार, ठोस तथा क्रियाशील दोनों ही बन सकता है। विचार उत्पाद में वैचारिकता तथा विकास में ठोसत्व लाने का काम करता है। वह उसमें एक प्रकार का आकर्षण भी उत्पन्न करता है।
साहित्य भी एक प्रकार का संप्रेषण ही है।( एक दृष्टि से वह(साहित्य) स्वयं उत्पाद है।) पर वह न तो पदार्थ का संप्रेषण करता है न ही विकास की क्रियाशील प्रस्तुति करता है। आपके मन में तुरंत यह बात आ सकती है कि रस की चर्चा करते समय रस का उल्लेख पदार्थ की तरह किया गया है। लेकिन रस का पदार्थत्व उत्पाद के पदार्थत्व से भिन्न है। एक का भौतिक तथा दूसरे का अ-भौतिक। अतः साहित्य अ-भौतिक पदार्थों(भाव रसादि एवं छन्द-अलंकारादि) का संप्रेषण करता है। इन सब अ-भौतिक तत्वों से मिल कर वह एक अ-भौतिक पदार्थ बनता है। प्राचीन काल में पांडुलिपियाँ तथा वर्तमान काल में पृष्ठों(कागज़) में निबद्ध उसका उत्पादन असल में उसकी पैकेजिंग है। जो प्रकाशन संस्था जितनी समृद्ध है वह उतना ही बढिया पैकेजिंग करती है।
साहित्य का संबंध मनुष्य की उन वृत्तियों से है जो बाजार में बिकाऊ नहीं हैं। पर इन अ-भौतिक पदार्थों को (भाव-सौन्दर्यादि) समाज में संप्रेषणीय बनाने के लिए साहित्यकार कुछ बिम्ब कुछ चित्र कुछ ऐसे सामाजिक प्रतीकों को चुनता है, जो भौतिक पदार्थों का आकार ग्रहण करते हैं। नायिका की सुन्दरता को चाँद, गुलाब, कमल मछली आदि बताना या लोगों के बीच को संबंधों तथा आशा-निराशाओं वफादारियाँ-धोखेबाज़ियाँ, उत्साह-ईर्ष्या को बताने के लिए पदार्थ-प्रतीकों,प्रसंगों, घटनाओं, मिथकों का उपयोग किया ही जाता है। यही वह स्थान है जब साहित्य की रचनाएं हमारे काम आ सकती हैं। साहित्य में भी भाव-सौन्दर्य का जो ठोस स्वरूप है जिसे बिम्बों,अलंकारों आदि के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है, वह विज्ञापन की संकल्पना निर्माण में बहुत उपयोगी हो सकता है।
विज्ञापन में विचार की संकल्पना के बीज साहित्य की कृतियों में बिखरे पड़े हैं। लेकिन इन बीजों को पकड़ने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम इन बातों को समझ लें-
1-विज्ञापन-निर्माण के बिन्दु
2-विज्ञापन का टार्गेट-ग्रुप

3-विज्ञपित वस्तु, पदार्थ का प्रकार( कैटेगरी)
4-विज्ञापन का माध्यम (पत्र-पत्रिकाएं, दृश्य-श्राव्य आदि)
5- साहित्य कृति में से विचार, संकल्पना को आकारित करने की क्षमता का विकास करना।
6- कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करने की क्षमता को विकसित करना।
7- संकल्पना को ठीक-ठीक भाषा में अभिव्यक्त करने के लिए भाषा की बारीकियों को समझना तथा भाषा का दोष-हीन प्रयोग करने के लिए भाषा-ज्ञान की पूरी जानकारी।
8-साहित्य के सौंदर्य-पक्ष तथा साहित्य के समाज-शास्त्रीय पक्ष की पहचान करना।
हम लोग तो साहित्य के विद्यार्थी हैं, अतः हमें विज्ञापन कैसे बनता है, इसकी तकनीकी जानकारी नहीं होती, यह स्वाभाविक ही है। पर जैसे नाट्यकार के लिए रंगमंच का ज्ञान होना ज़रूरी है, इतना भर कि वह नाटक लिखते समय यह देख सके कि रंगमंच पर लिखा हुआ दृश्य संभव है या नहीं। यानी उसे अपने माध्यम की जानकारी होनी चाहिए ठीक उस स्क्रिप्ट लेखक की तरह जिसे कुछ-कुछ फिल्म टेकनीक का पता होना चाहिए जैसे कि एक अंपायर, चाहे न बल्लेबाजी करता हो न गेंदबाजी, पर उसे क्रिकेट की जानकारी तो होनी ही चाहिए। हम विज्ञापन की कॉपीराइटिंग करने का काम कर सकते हैं। पर कॉपीराइटर के रूप में हमें यह पता होना चाहिए कि इस विज्ञापन का टार्गेट ऑडियंस कौन-सा है। हमारा कंटेंट, हमारी भाषा , हमारा अंदाज़- सभी उस टार्गेट ऑडियन्स पर आधारित होना चाहिए। फिर हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि जिस विज्ञापन के लिए हमें कॉपीराइटिंग करना है, उसकी श्रेणी कौन-सी है। वह व्यावसायिक विज्ञापन है अथवा सामाजिक, राजनैतिक जागृति से संबंधित है अथवा विकास से जुड़ा है। सभी श्रेणियों के विज्ञापन का स्वरूप तथा गौण संरचना अलग होगी। प्राथमिक संरचना तो एक जैसी ही होती है। प्राथमिक संरचना का अर्थ है- प्रत्येक विज्ञापन प्रचार के लिए होता है और संप्रेषणीयता उसकी पहली शर्त है। वह बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि वह प्रभावशाली होना चाहिए। गौण संरचना का अर्थ यह है कि श्रेणियों के अनुरूप भाषा तथा दृश्यों का प्रयोग। वैसे, दृश्य भी विज्ञापनों में भाषा का काम देते हैं। पर दृश्य कैसा होना चाहिए, यह भी विज्ञापन की कॉपीराइटिंग का कच्चा हिस्सा होते हैं।(कच्चा इसलिए कि बाद में उस पर काम होता है।) फिर व्यावसायिक विज्ञापन कई बार श्रेणी बद्ध रूप से तैयार

किए जाते हैं। एक ही विचार या संकल्पना को विभिन्न परिस्थितियों में विकसित किया जाता है। जैसे कोई कवि एक ही बात को विभिन्न बिम्बों के माध्यम से प्रकट करता है। इस बात को हमने कहत नटत वाले उदाहरण से भी देखा ।
विज्ञापन मीडिया के किस माध्यम के द्वारा प्रसारित होना है, उसके आधार पर कॉपीराइटर को अपना काम करना होता है। वह पत्र-पत्रिकाओं में अथवा अख़बार में छपने वाला है अथवा रेडियो से प्रसारित होगा या फिर दृश्य माध्यमों द्वारा पहुँचाया जाने वाला। दृश्य माध्यमों में कम लेखन, श्रव्य माध्यमों में ध्वनि का आधिक्य (संगीत आदि) एवं लेखन तथा प्रकाशित माध्यमों में ज़बरदस्त प्रभावशाली भाषा-प्रयोग- बहुत आवश्यक है। आप अगर हिन्दी में कंप्यूटिंग सीख लेंगे तो आप इन तीनों माध्यमों द्वारा बेहतर विज्ञापन के कॉपीराइटर बन सकेंगे। लेकिन इतना सब करने के लिए भाषा का दोषहीन प्रयोग अथवा भाषा की पूरी जानकारी या सही जानकारी ही आपको अच्छा कॉपीराइटर बना सकेगा। निराला ने छन्द तोड़ने की बात इसलिए की, क्योंकि उन्हें छन्द का ज्ञान था। ठंडा यानी कोका कोला सुनने पर सरल लगता है, पर इस सरलता तक तभी पहुँच सकेंगे जब आप भाषा पर अधिकार रखते हों। कोका कोला तभी कोकाकोला होता है जब वह ठंड़ा होता है। उसका मूल कंसेप्ट साहित्य के विद्यार्थी बेहतर निकाल सकते हैं क्योंकि हमने अपने विभिन्न कोर्सेस में उसे पढ़ रखा है। आप देखिए आपको विज्ञापन के लिए कॉपीराइटर बनाने में साहित्य की बेहतर समझ ही काम आएगी। आप साहित्य के समाजशास्त्रीय पक्ष को तथा सौन्दर्य पक्ष को जितनी गहराई से समझेंगे उतना ही विज्ञापन लेखन में सफल होंगे।
देश की सुरक्षा बिना सैनिकों के संभव नहीं है। सालभर में सैनिकों को हम अलग अलग अवसरों पर याद करते हैं। हमारे कवियों ने ढेरों रचनाएं इन पर लिखी हैं। आप को अगर इस से संबंधित कोई कॉपीराइटिंग करनी हो, तो आप कौन-सी कविता चुनेंगे ? आप जब देखना शुरु करेंगे और कॉपीराइटिंग की दृष्टि से उस पर सोचना आरंभ करेंगे कि संदेश पहुँचे भी, मार्मिक भी हो, दृश्य की दृष्टि से सटीक भी और आपका पढ़ा साहित्य आपके काम भी आए..... तो आप किस कविता को चुनेंगे। आप सोच कर देखिए। क्या पुष्प की अभिलाषा कविता प्रभावशाली होगी... तो बना कर देखिए कोई विज्ञापन। उसका टार्गेट ऑडिएंस कौन-सा होगा, उसकी भाषा कौन-सी होगी, वह किस श्रेणी में आता हे......इत्यादि, इत्यादि।
अब आप देखिए उसने कहा था कहानी है... वह किस प्रकार के विज्ञापन में आपकी मदद कर सकती है। कहानी तो प्रेम की है, उसका बैकड्रॉप युद्ध है.....। आप सोच कर देखिए। इसकी एक प्रोसेस है। प्रेम

आपको क्या देता है- आश्वासन एवं शीतलता। वह आजीवन साथ का आश्वासन देता है। उससे आपका जीवन निश्चिंत हो जाता है। अब इस थीम के आस पास आप एक व्यावसायिक एवं जीवन सुरक्षा का कोई विज्ञापन बना सकते हैं। जीवन सुरक्षा में क्या आता है, यह अब आप सोचिए। बीमा पॉलिसी ? व्यावसायिकता में किस उत्पाद की बात हो सकती है। लेखक ने तो कहानी में लिखा ही है। लहनासिंह क्या खरीदने बाज़ार गया था। अब यह एक कहानी आपको दो श्रेणियों के विज्ञापनों की कॉपीराइटिंग करने में मदद कर सकती है।
' देखा मुझे उस दृष्टि से जो मार खा रोई नहीं...' यह पंक्ति ग्रास रूट के स्तर तक हुए स्त्री –सशक्तिकरण तथा स्त्री जागृति को बताने के लिए कितना प्रभावशाली विज्ञापन बनाने में मददरूप हो सकती है।
पूरा शहर अँधेरे में डूबा है,
शर्माजी के घर उजाला !?! कैसे।
जी हाँ...--------- लैंप का कमाल!
अब बताइए, इस विज्ञापन के मूल में कौन-सी रचना है। (आप भी खरीदिए और एक चाँद अपने घर ले आइए।)
आपको किसी नए वाद्य या किसी म्यूज़िक कंपनी के लिए विज्ञापन बनाना हो तो आप को किस कविता से मदद मिल सकती है ? क्या आप को कुछ याद आता है ? आपको यह बताना है कि यह नया वाद्य सर्वथा नया है, औरों से अलग... तो आप किस कविता के उपयोग के बारे में सोच सकते हैं- इस पर सोचिए। क्या- नव गति नव लय ताल छन्द नव- से आप कुछ बना सकते हैं ?!?
आपने अब तक अंदाज़ा लगा लिया होगा कि अगर हम अपने विषय ( हिन्दी साहित्य) को ठीक से हृदयंगम करेंगे और भाषा पर प्रभुत्व प्राप्त कर सकेंगे तो इस क्षेत्र में हम से अच्छा कॉपीराइटर कहाँ मिलेगा। आप इतिहास पढ़ते हैं, तो सामग्री को एकत्रित करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। आप गद्य-पद्य पढ़ते हैं तो सौन्दर्य तथा समाजशास्त्रीय पक्ष को जानने लगते हैं, आप काव्य-शास्त्र पढ़ते हैं तो संकल्पनाओं का आकलन करना आपको आ जाता है, आप अनुवाद, प्रयोजन मूलक आदि पढ़ते हैं तो सही स्थान पर सही एवं

9498औचित्यपूर्ण शब्द रखने का बोध आपको हो जाता है, मध्यकालीन साहित्य आपको एक सांस्कृतिक आधार देता है, नाटक आपको सिखता है कि समय को सही रूप में कैसे पकड़ें.... यह सभी गुण एक कॉपीराइटर में होना ज़रूरी है।

Monday, 6 June 2011

नए सत्र में स्वागत!

आप लोग जून 2011 से एम.ए पाठ्यक्रम के तीसरे सेमिस्टर मे प्रवेश करेंगे। मैं जानती हूँ अभी आप में से कई लोग सोचेंगे कि अभी पहले सेमिस्टर का तो परिणाम आया नहीं, दूसरे का तो आते-आते आएगा, और आप तीसरे सेमिस्टर में स्वागत कर रही हैं। देखिए, स्वागत तो मुझे करना ही है आप सबका क्योंकि चाहे परिणाम अभी आया नहीं है, पर जब आएगा अच्छा ही आएगा। इस नए सेमिस्टर का पाठ्यक्रम भी क्रमशः मैं आपके लिए ब्लॉग पर रखूंगी ही, परन्तु मुझे लगा कि इस सत्र के पाठ्यक्रम के विषय में कुछ प्रारंभिक बातें हो जाएं।
पिछले दोनों सेमिस्टर में अपके पाठ्यक्रम की पहचान 4 से होती थी। अब अगले दोनों सेमिस्टर में अपके पाठ्यक्रम 5 से पहचाने जाएंगे। अर्थात् सेमिस्टर तीन में आप 501 से 506 तक के पाठ्यक्रम पढेंगे। इस पाठ्यक्रम में आप इतिहास, काव्यशास्त्र तो पढेंगे ही, पर साथ ही प्रयोजनमूलक हिन्दी, दलित/महिला लेखन, तुलनात्मक/विश्व/ प्रादेशिक/प्रवासी/ आदि के चुनाव से रू-ब-रू होंगे। इस बार सेमीनार के कोर्स में हमने जो यूनिट्स डाले हैं उसमें आपके पास विशेष अवसर रहेगा। आपने अब तक जो पढ़ा है अथवा आपके भीतर जो कल्पनाशीलता है उसे अवर मिलेगा कि वह अभिव्यक्त हो। आप को शायद आपके अध्यापकों ने बताय होगा कि अब सेमीनार के कोर्स में अंकों का आबंटन अन्य कोर्स की तरह 70/30 का रहेगा। अर्थात् 70 का बाह्य परीक्षण एवं आंतरिक का 30 अंकों का परीक्षण। प्रस्तुति के लिए शब्द संख्या यथावत रहेगी।
इस वर्ष ऐसे अनेक कोर्स दाखिल किए हैं कि जिन्हें अगर आप ध्यान से सीखेंगे तो यह आपके लिए आजीविका की बेहतर क्षमता प्राप्त करने का अवसर होगा। समय के साथ चलते हुए हमारे विश्वविद्यालय ने हिन्दी का अद्यतन एवं व्यापक पाठ्यक्रम दाखिल किया है। हमारी यह ब्लॉग शिक्षा पद्धति भी उसी नवीनीकरण का एक हिस्सा है। मैं जानती हूँ कि आप लोग लाभान्वित तो हुए हैं। परन्तु आप लोगों की तरफ से जितनी भागीदारी अपेक्षित है, उतनी मिल नहीं रही। मुझे विश्वास है कि इस वर्ष आप अवश्य इसमें अपनी भागीदारी करेंगे।
इस वर्ष का काव्य शास्त्र का पाठ्यक्रम एक तरह से अपनी प्रकृति में तुलनात्मक है। काव्यालोचन के जितने प्रमुख घटक हैं उन पर हम एक साथ भारतीय तथा पाश्चात्य चिंतकों को पढेंगे। जैसे रस-निष्पत्ति तो अपने आप में विलक्षण है। उसके बराबर पाश्चात्य साहित्य में कुछ नहीं मिलेगा। अतः उसे एक अलग यूनिट दिया है। इसके बाद काव्य की समझ के लिए सौन्दर्य, भाषा और छन्द ज़रूरी है, साथ ही सृजन प्रक्रिया । अतः भारतीय तथा पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में कौन से समान बिन्दु हो सकते हैं उसके कुछ अंश को हमने लिया है। सारा लेना तो कठिन ही है। इस समझ के साथ आप यह कोर्स पढेंगे , तो आपके लिए इस पाठ्यक्रम को पढ़ना सरल होगा।
इस बार इतना ही , शेष बाद में।

Thursday, 17 March 2011

कामायनी पुनर्पाठ

(कामायनी को हम विभिन्न दृष्टियों से पढ़ सकते हैं। उसकी कई व्याख्याएं मौजूद हैं। हमारे अपने समय की दृष्टि से यह भी उसकी एक व्याख्या है। नारीवाद में आती सिस्टरहुड की संकल्पना और विस्थापन के विमर्श को भी कामायनी प्रस्तुत करती है। अप इस पर सोचें और अपनी टिप्पणी अवश्य दें)


कोई भी रचना बड़ी इसलिए होती है कि वह हर युग में एक नया अर्थ देती है। इस बात की प्रतीति कामायनी पढ़ कर होती है। अगर मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण कामायनी के कथानक को युगीन संदर्भ से जोड़ते हैं या जिस तरह मुक्तिबोध ने उसकी व्याख्या की है, वह भी उसे अपने समय की मार्क्सवादी चेतना के साथ जोड़ देती है, तो हमारे अपने समय के संदर्भ भी उसमें जुड़े हुए दिखते हैं। इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि इडा के मन में जो अपराध भाव है वह मनु के साथ किए गए उसके अपने अथवा प्रजा के व्यवहार को ले कर नहीं है बल्कि एक अन्य स्त्री उसके कारण दुखी हुई है, यह देख कर होता है। यह इडा और श्रद्धा का एक तरह का बहनापे का भाव है। तभी अपनी संतान को इडा के भरोसे छोड़ कर वह (श्रद्धा) मनु की खोज में चल देती है। वह उसे चिर चढी कहती अवश्य है पर इडा के प्रति किसी विश्वास के कारण ही अपने पुत्र को उसके हवाले भी कर पाती है। यहाँ इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि अंत में जब इडा उस स्थान पर जाती है जहां श्रद्धा और मनु है , तब भी मनु के प्रति किए गए व्यवहार के लिए वह शर्मिन्दा नहीं है पर जहाँ मानव श्रद्धा के अंक में समाता है वहीं इडा श्रद्धा के चरणों में यह कहकर गिरती है कि उससे मिल कर वह कितनी कृतार्थ हुई है। श्रद्धा के प्रति कृतीरथता का बोध और अपने बचपने के प्रति सजगता तथा उसका श्रेय श्रद्धा को देना – एक अद्भुत बहनापे का बोध प्रकट करता है।
कामायनी को पढ़ते हुए मुझे इस बात की भी प्रतीति हुई कि इसमें विस्थापन का विमर्श भी है। मनु हमारा पहला विस्थापित है। देव-संस्कृति का अंतिम प्रतिनिधि और मानव संस्कृति का आरंभकर्ता मनु अपनी इच्छा से विस्थपित नहीं हुआ था। पर विस्थापन के जो अनेक कारण हैं, जिनमें प्राकृतिक आपदा भी एक कारण माना जाता है, मनु उसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हो कर हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठा हुआ अपनी बीती जिन्दगी को याद कर रहा है। वह अपने जीवन को ठीक वैसे ही आरंभ करता है, जैसे वह पहले जी रहा था। वहाँ उसके अलावा कोई था नहीं। अतः इस उम्मीद में कि शायद कोई और हो जीवित उसी की तरह वह अन्न-भाग रखता है। उसके पास कोई नया विकल्प नहीं था , जीवन के किसी नए प्रारूप पर सोचने के लिए कोई कारण या प्रेरणा भी नहीं थी। फिर उसकी भेंट श्रद्धा से होती है। श्रद्धा गंधर्व देश की रहने वाली है , इस उत्सुकता से वहाँ आ पहुँचती है कि – सीख लूं ललित कलाओं का ज्ञान- वह अपने पिता की प्यारी संतान है- अर्थात् अपने घर से किसी मजबूरी में या संकट में या दुखी हो कर नहीं चली थी पर अपने विकास के लिए चल पड़ी थी। विस्थापन का एक कारण यह भी है। इस तरह विस्थापित हो कर जो कहीं और जा कर रहते हैं वे ही प्रवासी भी कहलाते हैं।
श्रद्धा आयी तो थी ललित कलाओं का ज्ञान सीखने पर उसका जीवन किसी और दिशा में मुड़ जाता है। जैसा कि हम आगे चलकर देखते हैं कि मनु बहुत जल्दी ही श्रद्धा से विरत हो कर चला जाता है। वह अपनी इच्छा से , असंतुष्टि के कारण हिमप्रदेश छोड़ कर सारस्वत प्रदेश में आ पहुँचता है। वहाँ वह नव-निर्माण करता है, वर्ण जातियों का निर्माण करता है और फिर अपनी ही वृत्तियों के कारण अपना अंत भी देखता है। फिर एक बार वह वहाँ से चल देता है, परन्तु इस बार पलायन करता है और जैसा कि हम जानते हैं आनंद-लोक को प्राप्त होता है। अपनी अंतिम परिणति को प्राप्त करने तक मनु तीन बार विस्थापित होता है। श्रद्धा भी तीन बार विस्थापित होती है। परन्तु दोनों के कारण अलग-अलग हैं। दोनों के कारणों को अगर देखा जाए तो प्राकृतिक आपदा, नूतन ज्ञान की खोज, व्यक्तिगत अहं, स्वजन की चिंता, लज्जा और एक हद तक लोक भय- इन कारणों से विस्थापन हुआ देखा जा सकता है। अंत में मनु-श्रद्धा जहाँ होते हैं, जिसे अब उज्जवलतम और पावनतम तीर्थ कहा जाने लगा था,वहाँ इडा का सबको ले कर जाना एक तरह का सामूहिक एक्ज़ोडस(स्थानांतरण) ही कहा जा सकता है। इतिहास में प्रजाओं का ऐसा एक्ज़ोडस हुआ भी है। इडा सारस्वत प्रदेश के यात्रियों के साथ इसलिए जाती है कि-

सारस्वत नगर निवासी हम आए यात्रा करने
यह व्यर्थ रक्त – जीवनपट जीवन – पीयूष से भरने।
इस वृषभ-धर्मप्रतिनिधि को उत्सर्ग करेंगे जाकर
चिर-मुक्त रहे यह निर्भय स्वच्छन्द सदा सुख पाकर

इडा भूल से उस प्रदेश में आयी है जहाँ समरसता को प्राप्त श्रद्धा और मनु का निवास है। वह कृतार्थ है। मनु का यह कथन-

देखो कि यहाँ पर कोई भी नहीं पराया
हम अन्य न और कुटुंबी हम केवल एक हमीं हैं
तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ नहीं कमी है।
शापित न यहाँ कोई है तापित पापी न यहाँ हैं
जीवन-वसुधा समतल है समरस है जो कि जहाँ है।

विस्थापित हो कर कहीं जा कर बसने वाले इसी बात के लिए लालायित रहते हैं कि उनका स्वीकार हो। इतने सारे विस्थापनों को भोग कर मनु इस भूमिका पर आते हैं।
इस तरह से इस रचना का यह एक और नया आयाम खुलता है। कामायनी आज अपनी भाषा के कारण नई पीढ़ी को हिन्दी की कम संस्कृत की रचना अधिक लगती है। अपने युगीन, अतः जटिल सौन्दर्यबोध के कारण क्लिष्ट भी लगती है, अतः उसकी टेक्स्ट को पढ़ना बहुत दूभर भी लग सकता है। परन्तु इस बात को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि कामायनी आधुनिक काल की ऐसी महत्वपूर्ण कृति के रूप में उभरती है जिसमें आने वाले युगों में भी नए संदर्भों के होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

कामायनी पुनर्पाठ

(कामायनी को हम विभिन्न दृष्टियों से पढ़ सकते हैं।




कोई भी रचना बड़ी इसलिए होती है कि वह हर युग में एक नया अर्थ देती है। इस बात की प्रतीति कामायनी पढ़ कर होती है। अगर मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण कामायनी के कथानक को युगीन संदर्भ से जोड़ते हैं या जिस तरह मुक्तिबोध ने उसकी व्याख्या की है, वह भी उसे अपने समय की मार्क्सवादी चेतना के साथ जोड़ देती है, तो हमारे अपने समय के संदर्भ भी उसमें जुड़े हुए दिखते हैं। इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि इडा के मन में जो अपराध भाव है वह मनु के साथ किए गए उसके अपने अथवा प्रजा के व्यवहार को ले कर नहीं है बल्कि एक अन्य स्त्री उसके कारण दुखी हुई है, यह देख कर होता है। यह इडा और श्रद्धा का एक तरह का बहनापे का भाव है। तभी अपनी संतान को इडा के भरोसे छोड़ कर वह (श्रद्धा) मनु की खोज में चल देती है। वह उसे चिर चढी कहती अवश्य है पर इडा के प्रति किसी विश्वास के कारण ही अपने पुत्र को उसके हवाले भी कर पाती है। यहाँ इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि अंत में जब इडा उस स्थान पर जाती है जहां श्रद्धा और मनु है , तब भी मनु के प्रति किए गए व्यवहार के लिए वह शर्मिन्दा नहीं है पर जहाँ मानव श्रद्धा के अंक में समाता है वहीं इडा श्रद्धा के चरणों में यह कहकर गिरती है कि उससे मिल कर वह कितनी कृतार्थ हुई है। श्रद्धा के प्रति कृतीरथता का बोध और अपने बचपने के प्रति सजगता तथा उसका श्रेय श्रद्धा को देना – एक अद्भुत बहनापे का बोध प्रकट करता है।
कामायनी को पढ़ते हुए मुझे इस बात की भी प्रतीति हुई कि इसमें विस्थापन का विमर्श भी है। मनु हमारा पहला विस्थापित है। देव-संस्कृति का अंतिम प्रतिनिधि और मानव संस्कृति का आरंभकर्ता मनु अपनी इच्छा से विस्थपित नहीं हुआ था। पर विस्थापन के जो अनेक कारण हैं, जिनमें प्राकृतिक आपदा भी एक कारण माना जाता है, मनु उसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हो कर हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठा हुआ अपनी बीती जिन्दगी को याद कर रहा है। वह अपने जीवन को ठीक वैसे ही आरंभ करता है, जैसे वह पहले जी रहा था। वहाँ उसके अलावा कोई था नहीं। अतः इस उम्मीद में कि शायद कोई और हो जीवित उसी की तरह वह अन्न-भाग रखता है। उसके पास कोई नया विकल्प नहीं था , जीवन के किसी नए प्रारूप पर सोचने के लिए कोई कारण या प्रेरणा भी नहीं थी। फिर उसकी भेंट श्रद्धा से होती है। श्रद्धा गंधर्व देश की रहने वाली है , इस उत्सुकता से वहाँ आ पहुँचती है कि – सीख लूं ललित कलाओं का ज्ञान- वह अपने पिता की प्यारी संतान है- अर्थात् अपने घर से किसी मजबूरी में या संकट में या दुखी हो कर नहीं चली थी पर अपने विकास के लिए चल पड़ी थी। विस्थापन का एक कारण यह भी है। इस तरह विस्थापित हो कर जो कहीं और जा कर रहते हैं वे ही प्रवासी भी कहलाते हैं।
श्रद्धा आयी तो थी ललित कलाओं का ज्ञान सीखने पर उसका जीवन किसी और दिशा में मुड़ जाता है। जैसा कि हम आगे चलकर देखते हैं कि मनु बहुत जल्दी ही श्रद्धा से विरत हो कर चला जाता है। वह अपनी इच्छा से , असंतुष्टि के कारण हिमप्रदेश छोड़ कर सारस्वत प्रदेश में आ पहुँचता है। वहाँ वह नव-निर्माण करता है, वर्ण जातियों का निर्माण करता है और फिर अपनी ही वृत्तियों के कारण अपना अंत भी देखता है। फिर एक बार वह वहाँ से चल देता है, परन्तु इस बार पलायन करता है और जैसा कि हम जानते हैं आनंद-लोक को प्राप्त होता है। अपनी अंतिम परिणति को प्राप्त करने तक मनु तीन बार विस्थापित होता है। श्रद्धा भी तीन बार विस्थापित होती है। परन्तु दोनों के कारण अलग-अलग हैं। दोनों के कारणों को अगर देखा जाए तो प्राकृतिक आपदा, नूतन ज्ञान की खोज, व्यक्तिगत अहं, स्वजन की चिंता, लज्जा और एक हद तक लोक भय- इन कारणों से विस्थापन हुआ देखा जा सकता है। अंत में मनु-श्रद्धा जहाँ होते हैं, जिसे अब उज्जवलतम और पावनतम तीर्थ कहा जाने लगा था,वहाँ इडा का सबको ले कर जाना एक तरह का सामूहिक एक्ज़ोडस(स्थानांतरण) ही कहा जा सकता है। इतिहास में प्रजाओं का ऐसा एक्ज़ोडस हुआ भी है। इडा सारस्वत प्रदेश के यात्रियों के साथ इसलिए जाती है कि-


सारस्वत नगर निवासी हम आए यात्रा करने
यह व्यर्थ रक्त – जीवनपट जीवन – पीयूष से भरने।
इस वृषभ-धर्मप्रतिनिधि को उत्सर्ग करेंगे जाकर
चिर-मुक्त रहे यह निर्भय स्वच्छन्द सदा सुख पाकर


इडा भूल से उस प्रदेश में आयी है जहाँ समरसता को प्राप्त श्रद्धा और मनु का निवास है। वह कृतार्थ है। मनु का यह कथन-


देखो कि यहाँ पर कोई भी नहीं पराया
हम अन्य न और कुटुंबी हम केवल एक हमीं हैं
तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ नहीं कमी है।
शापित न यहाँ कोई है तापित पापी न यहाँ हैं
जीवन-वसुधा समतल है समरस है जो कि जहाँ है।


विस्थापित हो कर कहीं जा कर बसने वाले इसी बात के लिए लालायित रहते हैं कि उनका स्वीकार हो। इतने सारे विस्थापनों को भोग कर मनु इस भूमिका पर आते हैं।
इस तरह से इस रचना का यह एक और नया आयाम खुलता है। कामायनी आज अपनी भाषा के कारण नई पीढ़ी को हिन्दी की कम संस्कृत की रचना अधिक लगती है। अपने युगीन, अतः जटिल सौन्दर्यबोध के कारण क्लिष्ट भी लगती है, अतः उसकी टेक्स्ट को पढ़ना बहुत दूभर भी लग सकता है। परन्तु इस बात को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि कामायनी आधुनिक काल की ऐसी महत्वपूर्ण कृति के रूप में उभरती है जिसमें आने वाले युगों में भी नए संदर्भों के होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

Monday, 14 March 2011

कामायनी पर एक टिप्पणी

कई बार लंबे समय के बाद मिलने पर जिस तरह पुराने परिचित आपको बिल्कुल नए और भिन्न लगते हैं और उन्हें वैसा पा कर आपको लगता है कि यह किसी नए व्यक्ति से मिलना हुआ है कुछ इस तरह वर्षों बाद पिछले दिनों कामायनी पढ़ने पर लगा। 1978 में एम.ए द्वितीय वर्ष में अध्ययन करते हुए कामायनी कोर्स में थी। हम लोग बहुत भाग्यवान थे कि डॉ. भोलाभाई पटेल कामायनी पढ़ाते थे। कामायनी का अर्थ कितना समझ में आया था नहीं कह सकती , परन्तु कामायनी का सौन्दर्य अभी भी उनकी अध्यापन मुद्राओं के साथ मन में सजीव है। अच्छे अध्यापक के मार्गदर्शन में अगर कविता पढ़ने को मिल जाए, तो विद्यार्थी जीवन सार्थक हो जाता है।
परन्तु अर्थ की गहराई और विस्तार को उतना ही समझ पाई थी जितना उस समय संभव था। बाद में उसे पढ़ने का कोई अवसर या कारण नहीं था, सो पुरानी सुखद स्मृतियों के साथ कामायनी मेरे भीतर हमेशा जीवित रही। एकाध बार कामायनी के अंग्रेज़ी अनुवाद को पढ़ते हुए उसका कुछ अंश पढ़ा था। तब गुजरात में भूकंप आया था, शहर अव्यवस्थित हो गया था इसलिए सारस्वत प्रदेश का वर्णन मुझे एकदम प्रासंगिक – सा लगा था। तब ऐसे ही उसे पढ़ लिया था।
अभी पिछले दिनों मैंने फिर जब कामायनी पढ़ा तो उसकी कुछ, बल्कि अनेक बातें मुझे बड़ी विलक्षण लगीं। रामचंद्र शुक्ल का चिंतामणी भाग-1 तथा कामायनी का रचना-समय तो एक ही है। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ आलोचक जो आज भी अपने पद से डिगा नहीं है, मनोभावों का विश्लेषण गद्य में कर रहा था और अपने समय का इतना बड़ा कवि उन्हीं मनोभावों को काव्य के सौन्दर्य में वेष्टित कर रहा था। कामायनी और चिंतामणी में कोई समानता है ऐसा मैं नहीं कह रही , परन्तु यह एक विलक्षण बात है कि दोनों ही, एक प्रकार की बात कर रहे थे। एक ही विषय पर चिंतन कर रहे थे। एक में मनोभावों का सामाजिक स्वरूप और भूमिका दृष्टिगोचर होती है और दूसरे में मनोभावों का वैयक्तिक स्वरूप , जो आख़िरकार तो सामाजिक समरसता की बात करता है। कामायनी महाकाव्य में प्रसाद की विशेषता यह है कि उन्होंने इन मनोभावों को छायावादी सौन्दर्य के स्तर पर प्रस्तुत किया है। शुक्लजी के यहाँ मनोभावों का यह चित्रण जितना गुरु-गंभीर और वज़नदार लगता है , प्रसादजी के यहाँ उतना ही सुंदर, शोभामय और प्रीतिकर लगता है। एक ही कंटेंट मानों विभिन्न रूप धारण करता दिखाई पड़ता है। क्या यह अंतर इस बात की ओर इशारा नहीं करता कि मनोभावों का इस तरह विश्लेषण उस युग की अपनी विशेषता बन जाती है। आगे चलकर मनोवैज्ञानिक उपन्यासों का आरंभ भी, जैनेन्द्र, इलाचंद्र जोशी आदि के साथ हो ही जाता है। शुक्लजी पर तो रिचर्ड्स का प्रभाव माना जाता है परन्तु प्रसाद पर किसी का प्रभाव था, यह नहीं कहा जा सकता , यह शोध का विषय है।
गोदान तक आते-आते यह कहा जाने लगा कि उपन्यास महाकाव्य का स्थानापन्न है। क्या ऐसा नहीं लगता कि भाषा-विन्यास को अगर एक क्षण के लिए विस्मृत कर दें तो कामायनी का स्ट्रक्चर औपन्यासिक है। इसमें नाट्यात्मकता भी है, एक औत्सुक्य भी है। कामायनी की कथा जिस तरह गूँथी गई गयी है, एक के बाद एक प्रसंग का आयोजन हुआ है, ऐसा लगता है कि कविता में लिखा एक उपन्यास है। परन्तु ज़ाहिर है कि है तो यह एक महाकाव्य ही , क्योंकि कृति के अंत में जीवन के महान् सत्य को महाकाव्य का नायक(उत्तम कुलोत्पन्न) फल के रूप में प्राप्त करता है। यह महाकाव्य ही है क्योंकि इसका नायक महाकाव्यात्मक श्रेणी का है। इसमें मध्यवर्ग की कोई गाथा नहीं है, बल्कि मनुष्य मात्र की भूलों – उसके अहं, अधिकार भवना का वर्णन, उसके परिणाम और उनसे मुक्ति के उपाय कवि ने दिए हैं। परन्तु फिर भी कामायनी की बुनावट और प्रसंग- आयोजन औपन्यासिक हैं।
महाकाव्य के आरंभ में बाढ़( प्रलय) के उतर जाने के बाद बचे हुए एक मनुष्य का का चित्रण है। देव संस्कृति का शेष बचा हुआ प्रतिनिधि यह पुरुष जिसका नाम मनु है अपने बीते कल की समृद्धि को याद करते हुए चिंता करता है। इस सौरचक्र में आवर्त्तन होता रहता है.... कामायनी के आरंभ में ऐसा ही एक आवर्त्तन हुआ और मनु बच गया है- अकेला। निर्जनता में कही गयी उसकी विषाद-वार्ता को केवल पवन पी रहा है। एकान्त क्रंदन करता हुआ मनु चिंता से भरा हुआ हमारे समक्ष उपस्थित है। अकेलेपन की चिंता और देव-सृष्टि के विलास की स्मृतियां मनु की बेचैनी का मुख्य कारण है। लेकिन फिर प्रलय-निशा का प्रात होता है। कामायनी में मनु की चिंता भरी स्थिति के बाद जिस तरह श्रद्धा की उससे भेंट होती है, श्रद्धा के प्रति उसका आकर्षण , श्रद्धा के मन में मनु के प्रति सहज आकर्षण फिर अकेलापन दूर होने के बाद मनु का और बातों में रुचि लेना, किरात-अकुलि के साथ मिल कर उसी नष्ट हुई देव संस्कृति को फिर जीवित करने का उपक्रम, आरंभिक आकर्षण का क्रमशः कम होते जाना, देव-दंभ तथा अहं और सत्ता-भाव का फिर उदय होना, मानव के जन्म की संभावनाओं के फलस्वरूप श्रद्धा का उसकी तैयारी में लग जाना , मनु का श्रद्धा को उसी के हाल पर (गर्भवती श्रद्धा को)छोड़ कर कहीं दूर चले जाना , इडा के सारस्वत प्रदेश में जा कर नव निर्माण करना, अधिकार भाव को पुष्ट और पुष्टतर करते जाना, प्रजा पर अत्याचार, इडा पर अधिकार जमाना, जन-विद्रोह का सामना करना, श्रद्धा का वहाँ आना, मनु को इस हाल में देखना, मनु का वहाँ से चुपचाप चल देना , श्रद्धा द्वारा इडा के पास मानव को छोड़ कर, मनु की खोज में जाना और तीन लोकों की यात्रा कराते हुए फिर जीवन को जीने की गति में लाना, मानव तथा सारस्वत प्रदेश के लोगों के साथ इडा का मनु और श्रद्धा से मिलना और सामरस्य के संदेश के साथ कृति का अंत होना।
प्रसाद ने सामाजिक समस्याओं को केन्द्र में रखते हुए कंकाल और तितली उपन्यास लिखे। 1936 तक मनोवैज्ञानिक उपन्यास लिखने का आरंभ तो हो चुका था । प्रसाद की मृत्यु बहुत जल्दी हो गई थी। परन्तु कामायनी में क्या एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास का बीज नहीं हैं? हो सकता है कि प्रसाद अगला कोई उपन्यास मनोबैज्ञानिक ही लिखते। हालाँकि यह एक हायपोथिटीकल विधान है, पर ऐसा सोचा तो जा ही सकता है। अहं और अधिकार भाव मनु का निर्माण करते हैं- जिससे उसका विकास और पतन दोनों ही होता है। सारस्वत देश का निर्माण और' सब कुछ मेरा है और मेरे लिए बना है'- का उद्दाम भाव उसके पतन का कारण बनता है। इसमें स्वप्न की टेकनीक का प्रयोग किया गया है। वरना श्रद्धा को उस स्थल तक पहुँचाना कठिन था, जहाँ मनु था। इसमें अपराध भाव है, इडा और मनु दोनों में इसे देखा जा सकता है। श्रद्धा की उपस्थिति से इडा को अपने किए के प्रति अपराध इसलिए होता है कि एक अन्य स्त्री की पीड़ा और दुख में उसकी भूमिका निश्चित ही थी। यह पॉज़िटिव अपराध भाव है जिसके कारण वह मानव की देखभाल करने का तथा पुनः नगर निर्माण की दिशा में बढ़ती है। पर मनु में स्यूडो- अपराध भाव है, जिसके कारण वह पलायन कर जाता है। और फिर यह तीनों लोकों की यात्रा क्या है ? यह श्रद्धा द्वारा मनु का मनोवैज्ञानिक इलाज ही तो है। मनु यथार्थ का सामना नहीं करना चाहता। वह इतना साहसी नहीं है , पर श्रद्धा उसे ढूँढ़ती है और वह सब दिखाती है जो उसने किया और ग़लत था। उसे अपने स्मृति पथ की यात्रा करवाती है। जैसे हिप्नोटीज़ कर के कोई डॉक्टर मरीज़ को उसके अवचेतन के अनेक स्तरों की यात्रा करवाता है , कुछ इस तरह प्रसाद यहाँ करते हैं। पर प्रसाद जब इसे लिख रहे थे तब हिन्दी में मनोविज्ञान अथवा मनोविश्लेषण की थियोरी अभी आयी नहीं थी। फ़ेथ इज़ दी बेस्ट हीलर--- श्रद्धा ही वह काम करवा सकती थी। कामायनी में यह पूरा प्रसंग इसलिए रहस्यमय और दार्शनिक लगता है कि कवि ने उसे वैसा रूप दिया । इसी बात को प्रसाद प्रत्यभिज्ञा के माध्यम से बताते हैं। परम तत्व को देखने के लिए किसी मीडीएटर(मध्यस्थ) की आवश्यकता होती है। प्रत्यभिज्ञा की दृष्टि से श्रद्धा वह मीडिएटर है।
कामायनी अपने आरंभ से ले कर अंत तक प्रत्यभिज्ञा दर्शन से इस तरह आवेष्टित है कि जयशंकर प्रसाद के काव्यत्व के प्रति आदर भाव जागता है। इसमें बड़ी बात यह भी है कि प्रत्यभिज्ञा दर्शन के पूर्ण ज्ञान के अभाव में भी इस काव्य का आनंद उठाया जा सकता है। यहाँ हमें भक्तिकाल की उन रचनाओं का स्मरण आ जाता है जिनके दार्शनिक आधारों को जाने बिना भी काव्य का आनंद उठाया जा सकता है। उदाहरण के लिए सूरदास की रचनाओं को बिना पुष्टिमार्ग के सैद्धांतिक पक्ष के ज्ञान के भी उतनी ही प्रिय लगती है।
प्रत्यभिज्ञा दर्शन या समरसता दर्शन का परिचय कामायनी के प्रथम छन्द से ही हो जाता है। इस संदर्भ में इस उद्धरण को देखा जा सकता है-
कश्मीर के शैवाद्वैत दर्शन के अनुसार चिति या चैतन्य संज्ञक एक आत्मा ही नाना रूपों में (विश्वात्मक रूप में) सर्वत्र विद्यमान है, उस चिति या आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी कहीं भी नहीं है। अस्तित्व है तो केवल आत्म-रूप का हैं। इस कारण जड और चेतन दोनों ही चैतन्य रूप हैं। दोनों प्रकृति में, स्व-भाव में एक-दूसरे से पृथक नहीं है। उनमें अन्तर (भेद) केवल प्रकाश या चैतन्य की मात्रा का है। जैसे नदी संज्ञक परिमित जलराशि सागर संज्ञक अपरिमित जलराशि को पाकर उसमें लय हो जाती है अर्थात् समरसत्व को प्राप्त होती है वैसे ही जड संज्ञक परिच्छिन्न प्रकाश या परिमित चैतन्य चेतन संज्ञक अपरिमित चैतन्य में (साधना, गुरु कृपा, शक्तिपात आदि के द्वारा) लय हो जाता है, समरसीभूत होता है। इस प्रकार जड और चेतन के सामरस्य से सर्वत्र एक ही तत्त्व की स्थिति हो जाती है। सारांश यह है कि कामायनी की आरम्भिक पंक्तियों में महाकवि प्रसाद द्वारा प्रयुक्त जड और चेतन शब्द कश्मीर के शैवागम शास्त्र के पारिभाषिक शब्द हैं तथा वहाँ जो दृश्य है अर्थात् जो जड है वह और जो चेतन द्रष्टा मनु है, दोनों के समरसीभाव से कवि-कथन एक तत्त्व की ही प्रधानता की सत्यता स्पष्ट हो जाती है। (जोशी)
महाकाव्य के आरंभ में ही मनु हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर शिला की शीतल छांह में बैठे प्रलय का प्रवाह देख रहे हैं। ऊपर और नीचे दोनों ही दिशाएँ जल-मग्न हैं- एक तरल है एक सघन उसे चाहे जड़ कहो या चेतन एक ही तत्व प्रधान है- ऐसा कवि कहते हैं। सामान्य व्यक्ति जल के तरल एवं जड रूप के अर्थ में इसका आनंद उठाते हैं। अर्थ-घटन करते हैं। कोई दिक्कत नहीं आती । पर जल चाहे जिस रूप में हो, जड ही है। चेतन तो मनु है । मनु जो दृष्टा है, वह चेतन है। अतः जल एवं मनु दोनों ही एक हैं। लेकिन अभी इसमें श्रद्धा का प्रवेश नहीं हुआ है अतः वह समरसी भाव को प्राप्त नहीं हुआ है।
कवि कहता है - हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह, एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय-प्रवाह। नीचे जल था, ऊपर हिम था एक तरल था, एक सघन, एक तत्त्व की ही प्रधानता कहो उसे जड या चेतन। वे शंका करने वाले कहते हैं कि नीचे जल और ऊपर हिम ये दोनों तो तत्त्वतः एक ही तत्त्व हैं क्योंकि जल और हिम दोनों में जल तत्त्व हैं। हिम के पिघल कर जल बन जाने पर और फिर उस हिम-जल का प्रलय-सागर की विस्तृत, अपरिमित जलराशि में लय हो जाने पर एक तत्त्व की स्थिति सिद्ध हो जाती है, किन्तु हिम और जल का उक्त प्रकार से द्वैत समाप्त हो जाने पर भी उस दृश्य (हिम और जल) का द्रष्टा मनु तो उस दृश्य से पृथक बचा रहता है तब वहाँ कवि-कथित एक तत्त्व की प्रधानता कैसे हुई? दूसरे, वह दृश्य (हिम और जल) तो जड है, किन्तु उस दृश्य का द्रष्टा जो मनु है वह तो चेतन है। इस तरह जड और चेतन का द्वैत विद्यमान रहने पर पर भी ही से जोर देकर कवि के द्वारा एक तत्त्व की प्रधानता बताना पहेली जैसा लगता है। यह शंका एक प्रकार से स्वाभाविक भी है, क्योंकि कामायनी काव्य पर अब तक जितनी टीकाएँ, भाष्य या व्याख्याएँ लिखी गई हैं और जितने शोध-ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं उनमें से किसी में भी उक्त उलझन को सुलझाने का प्रयत्न दृष्टिगत नहीं होता। इसका कारण यह नहीं समझा जाए कि कवि का उपर्युक्त विरोधाभासी कथन महत्त्वपूर्ण नहीं है, इसलिए किसी विद्वान् ने इस पर ध्यान नहीं दिया। ऐसा समझना निश्चय ही भारी भूल होगी, क्योंकि कामायनी का बीज-स्थानीय कवि का कथन वस्तुतः बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसलिए उस पर विचार करना भी आवश्यक है। पहेली जैसा बताये जाने वाले कवि-कथन की स्पष्टता के लिए कामायनी के अन्तिम छन्द में व्यक्त कवि का वह निष्कर्ष सहायक हो सकेगा जिसमें जड और चेतन के समरस होने पर सर्वत्र एक चेतनता को विलसित बताया गया है - समरस थे जड या चेतन सुन्दर साकार बना था चेतनता एक विलसती (जोशी) यहाँ तक आते आते श्रद्धा मनु के भीतर के द्वैत को अद्वैत में बदलने में अपनी भूमिका निभाती है।
कामायनी का कथा विन्यास भी समरसता दर्शन पर आधारित है। प्रथम सर्ग में मनु चिंता से ग्रस्त है। सब कुछ नष्ट हो जाने के बाद मनु पुनः जीवन आरंभ करता है। कथा तो हम सब जानते हैं। परन्तु अंत में इडा सारस्वत नगर के वासियों के साथ मनु और श्रद्धा के पास जाते हैं । मनु सभी को वह दिखाते हैं जिसका दर्शन वे कर चुके थे। यहाँ आनंद का भाव विलसता हुआ दिखाई पड़ता है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन में सामुहिक मुक्ति की बात है। अतः कथा के आरंभ से अंत तक कवि, प्रत्यभिज्ञा दर्शन को अपनी कृति का आधार बनाते हैं।
कई बार यह सवाल भी उठता है कि छायावाद के पंत और प्रसाद दोनों ने दार्शनिक महाकाव्य के रचयिता हैं , पर 'कामायनी' आज भी उतना ही प्रभावित करती है और 'लोकायतन' कितने लोगों ने पढ़ा है , यह एक प्रश्न तब भी था और आज भी है। दर्शन को कथा के साथ काव्य सौन्दर्य के साथ कामायनी में इस तरह घुला दिया गया है कि पढ़ते ही बनता है। फिर मनु के चरित्र का जो आलेखन किया है उससे आप चाहे नारी विमर्श कर लें या मानव विमर्श कह लें – सभी अर्थ प्रकट होते हैं। कामायनी पर कई तरह से विवेचना हुई है। गजानन माधव मुक्तिबोध जब 'कामायनी एक पुनर्विचार' लिखते हैं तब वे सामन्ती शोषण के पक्ष को भी उजागर करते हैं। रमेश कुंतल मेघ- 'कामायनी-एक युटोपिया' अथवा 'अथातो सौन्दर्य जिज्ञासा' अथवा मिथक की दृष्टि से उस पर विचार करते हैं तो कामायनी का एक नया पहलू हमारे सामने आता है। यह एक ऐसी रचना है, जो अपने विचार और सौन्दर्य के कारण हमेशा ही महत्वपूर्ण रहेगी।
रंजना अरगडे


Friday, 4 March 2011

सोचिए, शामिल होइए और लिखिए

कोर्स 409 की कुछ समस्याएं आपको अब भी परेशान करती हैं। उदाहरण के लिए आपके मन में एक प्रश्न यह हो सकता है कि ओम्प्रकाश वाल्मिक की रचना जूठन तो आत्म कथा है, तो इसे उपन्यास के अन्तर्गत क्यों शामिल किया गया है? इसे उपन्यास की श्रेणी में क्यों गिने? कैसे गिना जा सकता है? क्या ऐसा करना योग्य होगा? कहीं यह गलत सूचना तो नहीं, कहीं यह भूल तो नहीं, जैसे काशीनाथ सिंह लिख दिया है दूधनाथ सिंह के स्थान पर? आपके साथ -साथ यह प्रश्न हमारे अध्यापक साथियों को भी हो सकता है। क्योंकि आज तक हम साहित्य के इतिहास का अध्ययन करते हुए ऐतिहासिक कृतियों तथा स्वरूपों को उनके सही और तय वर्गीकरण में देखने और समझने का आदी हैं। सब कुछ तय और निश्चित माना जाता रहा है, आधुनिक काल में। उपन्यास उपन्यास है, कहानी, कहानी। पर उत्तर आधुनिक काल में स्थिति बदल जाती है। आपने पाठ्यक्रम में इसका उल्लेख उत्तर आधुनिक वाले खंड में पाया होगा।
आपको मैंने वागर्थ ( फरवरी 2011) का वह अंक दिया था जिसमें शंभूनाथजी का लेख है। इस समय इतिहास स्वयं अपने उस प्रारूप से अलग हो रहा है जैसा रामचंद्र शुक्ल से चल कर बच्चन सिंह तक हम पढ़ते आए हैं। उत्तर आधुनिक काल में साहित्यिक स्वरूपों का गड्ड-मड्ड होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। विशेष रूप से इतिहास को नैरेटिव के रूप में पढ़ना,( सुमन राजे का आधा इतिहास इसका उदाहरण है) आत्मकथा को उपन्यास के रूप में तथा उपन्यास को आत्मकथा के रूप में पढ़ना..... और इसी तरह अन्य स्वरूपो को भी शामिल कर सकते हैं, उत्तर आधुनिकता का एक लक्षण है। जब यहाँ मैं लक्षण शब्द का प्रयोग कर कर रही हूँ, तो इसे काव्य-शास्त्रीय ढंग से न समझें। लक्षण से मेरा अर्थ पहचान है । अतः अगर आप इस तथ्य को इस तरह समझें कि आज उत्तर आधुनिक समय में आत्मकथाएं औपन्यासिक हो गई हैं- इस अर्थ में यह उपन्यास है। गांधीजी की आत्मकथा पढ़ते समय हमारा ध्यान सबसे पहले तथ्यों पर जाता है। उसका रचाव तथा रचनात्मक सौन्दर्य हमारा ध्यान नहीं खींचता।
साथियो तथा विद्यार्थियो, मैं चाहती हूँ कि मेरी बातों के अलावा आप इसमें कुछ जोड़ कर अपनी बात कहना चाहते हैं, तो अवश्य कह सकते हैं। ऐसे मानना चाहिए अथवा नहीं – यह अगर पका प्रश्न है , तो आप इस मुद्दे पर चर्चा करें। यह चर्चा बहुत महत्वपूर्ण होगी। इससे कोई न कोई हल निकलेगा। मैं तो चाहती हूँ कि आप तथा हमारे साथी अध्यापक जो केन्द्रों में बैठें हैं वे भी इस में शामिल हो कर अपना मत रखें। पर इसके पूर्व मैं आपसे निवेदन करूंगी कि शंभूनाथजी का लेख अवश्य पढें। आशा है इस संदर्भ में आपकी टिप्पणी अवश्य मिलेगी। इस संदर्भ में हिन्दी साहित्य के इतिहास तथा कहानी एवं उपन्यास में विशेषज्ञता रखने वाले हमारे युनिवर्सिटी भाषा भवन तथा केन्द्रों में अध्यापन करने वाले साथियों से भी चर्चा विचारणा कर सकते हैं- जैसे डॉ आलोक गुप्त, डॉ रेखा शर्मा, डॉ. श्रीराम त्रिपाठी एवं डॉ. बिन्दु भट्ट।
मेरा विश्वास है कि इस तरह ही हम अपने विषय में अधिक बेहतर हो सकेंगे।

Friday, 18 February 2011

411-EA

वह बुड्ढासुमित्रानंदन पंत की कविताओं की एक विशेषता यह है कि उनमें कल्पना शक्ति के साथ-साथ निरीक्षण शक्ति भी अद्भुत रूप से दिखाई पड़ती है। प्रथम रश्मी अथवा नौका विहार या फिर पावस ऋतु में पर्वत प्रदेश जैसी कविताओं में इसका आपको परिचय मिल गया होगा। छायावादी काव्य-कौशल से युक्त उनकी कवित्त –शक्ति जब कुछ भिन्न प्रकार की कविताएं रचती है तब भी पूर्व प्राप्त किया हुआ काव्य-कौशल वहाँ झलकता तो है। इस संदर्भ में वह बुड्ढा कविता बरबस हमारा ध्यान खींचती है। जैसे जैसे इस कविता को हम पढ़ते हैं, हम भी, जैसा कवि ने कहा है बरबस उठ जाने का मन – यानी कि न पढ़ने का मन बना लेते हैं। परन्तु साथ ही साथ हमारे भीतर एक कौतुक भी जगता है कि आखिर पंत जी ने इस बुड्ढे का इतना सही चित्रण कैसे किया है ? जैसे कोई रेखाचित्र कवि बना रहा है। इस कविता को पढ़कर कोई चित्रांकन करे तो सहसा ऐसा लगेगा कि किसी वास्तविक मॉडल (बूढ़े) को देख कर ही यह चित्र बनाया गया है।
कविता के आरंभ में ही कवि हमारे सामने उस बुड्ढे का चित्र खींचते हैं। कवि उसका वर्णन करते हुए, उसे जीवन का बूढ़ा पंजर कहते हैं। आगे का वर्णन कितना सूक्ष्म है चिमटी उसकी सिकुड़ी चमड़ी। बुढ़ापे में चमड़ी झुर्रीदार हो जाती है, फिर ढ़ीली भी हो जाती है, उसमें कसाव नहीं होता , अतः ऐसी हो गई यह चमड़ी उसकी हड्डी के ढाँचे पर हिल रही है। एक तो शब्द चयन ही ऐसा है इनमें इकारान्त शब्दों का आवर्तन .... बूढ़े पंजर पर चिपकी हुई सिकुडन वाली चमड़ी बूढ़े का चित्र इस तरह खडा करता है कि हमें लगने लगता है कि इससे अधिक यथार्थ कुछ नहीं हो सकता। यथार्थ के ऐसे चित्र कविता में आगे भी आते हैं। कविता में बूढ़े पंजर, हड्डी का ढाँचा, ठठरी- कितने ही विशेषण बूढे कि लिए होती हैं। फिर ठूंठे तने से इसकी तुलना करते हुए कहते हैं कि नसें उसकी हड़ी पर ऐसी लगती है जैसे ठूंठ पर लिपटी अमरबेल।
इस बात को हमने कई बार कहा और सुना होगा कि खंडहर बता रहै हैं इमारत बुलंद थी। इसी को पंतजी ने इस कविता में स तरह कहा है, देखिए
उसका लंबा डील-डौल है/ हट्टी-कट्टी लंबी काठी/ इस खंडहर में बिजली-सी /उन्मत्त जवानी दौड़ी होगी । ऐसे इस डील डौल वाले शरीर के इस बूढे की अब छाती बैठ गई है, रीढ़ की हड़ी झुक गई है, कंधे झुक गए हैं, देह नंगी है , बालों से भरी है, झुक कर मानों पिछले पाँवों पर चलता है, जैसे कोई बनमानुस हो, ऐसा लगता है।
कविता का मर्म अंतिम पंक्तियों में है। कवि कहता है कि वह बूढ़ा, जानवर की तरह हो गया है और उसका कारण है दुख परिणाम यह हुआ कि उसमें मनुष्यता मर गई है। उसकी ऐसा दशा को देख कर कवि को लगता है कि उस धरती से वे पाँव उठा लें- अर्थात् चले जाएं।
इस कविता को पढ़ कर हमारे मन में कई प्रश्न उठते हैं। कवि ने एक विपन्न बूढ़े पर कविता लिखी है, परन्तु कवि के मन में इसके प्रति कोई सहानुभूति नहीं है, बल्कि कवि ने दो स्शानों पर उसके प्रति उठता घृणा का भाव प्रकट किया है। क्या इसे हम कवि का भाव कहें या फिर ऐसे लोगों को देख कर सामान्यतया जो भाव लोगों के मन में उठते हैं उसका बयान कवि करते हैं। हमें यह भी लगता है कि कवि इस बात की ओर इशारा करना चाहता है कि भूख का दुख ही व्यक्ति को मनुष्य में से जानवर बनाती है। समाज की इस सच्चाई को कवि हमारे सामने लाना चाहते हैं।
हमारे मन में एक प्रश्न उठता है कि आखिर कवि पंत- जिन्होंने छायावादी दौर में एक-से-एक सौन्दर्य से भरे चित्र खींचे हैं, उन्होंने एक ऐसा चित्र क्योंकर खींचा। कवि अब एक नए दौर में प्रवेश भी कर रहे हैं। अतः छायावादी काव्य के उपकरणों से वे नए दौर में प्रवेश करते हैं। जहाँ उन्हें अपनी निरीक्षण क्षमता और सूक्ष्म चित्रण की कला काम आती है, वहीं छन्द ङी उन्हें मदद करता हुआ दिखता है। अभी छन्द छोड़ कर कविता लिखने का युग आया नहीं था। अतः इसमें वितृष्णा से भरा यथार्थ सौन्दर्य मंडित हो कर आता है। कवि बूढ़े का जो चित्र लेकिन हमारे सामने खींचते हैं, वह अगर हमें आकर्षित करता है, तो एक कला रूप में- इसका पहला कारण इसे कवि ने एक नियमित लय में बाँधा है। खड़ा द्वार पर लाठी टेके......कविता का आरंभ एक निश्चित लय-गति के साथ हमें बँधता है- 16 मात्राओं का यह मात्रिक छन्द लगभग अपनी मात्रा संयोजन की नियमितता तोड़ता नहीं है। कहीं-कहीं 15 मात्राएं भी हैं। देखिए, कविता का तो ऐसा ही है- ख़ासकर छायावादी युग में कवि प्रायः मात्रिक छन्दों में ही लिखते रहे। कोर्स 412 में महादेवी का कविता नीर भरी दुख की बदरी में भी 16/15 का नियमित आवर्तन है, प्रसाद की बीती विभावरी में 15 का आवर्तन है--- परन्तु सभी की लयात्मकता में अंतर है। यह अंतर इसलिए है कि लघु-गुरु का आयोजन और कविता में भाव की भिन्नता उसके पाठ की लय में भेद का कारण बनती है।
खड़ा द्वार पर लाठी टेके 16
वह जीवन का बूढ़ा पंजर 16
चिमटी उसकी सिकुड़ी चमड़ी 16
हिलते हड्डी के ढाँचे पर 16
मैं नीर भरी दुख की बदरी(महादेवी) 16
साड़ी सी सिकुडन-सी जिस पर (नौका विहार) 16
आपने देखा कि ऐसे अनेक उदाहरण अगर आप ढूंढे, तो आपको मिल जाएंगे। कविता पढ़ने का अपना एक आनंद होता है। कविता पढ़ने की अपनी एक रीति भी होती है। कभी अगली बार इस पर भी हम चर्चा करेंगे।

Monday, 27 December 2010

नए सेमिस्टर में प्रवेश

आप सभी ने प्रथम सेमिस्टर की परीक्षा अच्छी तरह से दे दी होगी। पहली बार नए ढंग से परीक्षा देने के सुख और दुख को आपने अनुभव किया होगा। पर पहले सेमिस्टर का अनुभव अब आपको काम आएगा। दूसरे सेमिस्टर में आप जैसा कि जानते हैं गद्य और पद्य को भी पढ़ेंगे। इस सेमिस्टर का पाठ्यक्रम आपके पास होगा ही। पर इसमें रहे यूनिट्स का विस्तार जानना ज़रूरी है। इस की चर्चा हम कोर्स HIN412 से आरंभ करेंगे।
पिछले सेमिस्टर में 406 में हमने हिन्दी के निबंध-स्वरूप के माध्यम से हिन्दी निबंधों का अध्ययन किस तरह करना चाहिए यह समझा था। इस सेमिस्टर में हम यही प्रक्रिया कविताओं के साथ करेंगे। कविताओं का आस्वाद कैसे किया जाता है और कविताओं का विश्लेषण कैसे करना चाहिए इस बात को समझना रोचक होगा। एक मध्यकालीन कविता को समझना और उसका विश्लेषण आज की कविता से किस तरह भिन्न है इसे हम इस सेमिस्टर में सीखेंगे। आप इन कविताओं को किसी भी स्रोत से प्राप्त कर सकते हैं। आपके अध्यापक भी इसमें आपकी मदद कर सकते हैं। कविता का पाठ , कविता में भाषा और सौन्दर्य-धर्मी प्रयोग किस तरह उसके भाव को प्रकट करते हैं, इसका इस कोर्स में हमें पता चलेगा। आपकी जानकारी के लिए इस कोर्स विवरण इस तरह है-
चुनी हुई कविताओं का वर्ष दौरान अध्यापक द्वारा काव्यास्वाद एवं काव्य विश्लेषण कराया जाए तथा विद्यार्थियों को लिखने का अभ्यास भी कराया जाए। वर्षान्त में कम-से कम 3000 शब्दों में आलेख जमा करवाया जाए आलेख में काव्यास्वाद की प्रक्रिया, काव्यस्वाद के आधार, पाठ्यक्रम में दी हुई कविताओं का आस्वाद आदि पर बात हो सकती है। काव्यास्वाद एवं काव्य-विश्लेषण की प्रक्रिया में अध्यापक एवं विद्यार्थी दोनों की सहभागिता अपेक्षित है। विद्यार्थी चाहे तो स्वतंत्र रूप से भी काव्यस्वाद कर सकता है। वर्ष दौरान किये गए अभ्यास एवं वर्षान्त में किए हुए प्रस्तुतिकरण के आधार पर आंतरिक मूल्यांकन (50 अंक का ) होगा।
मौखिकी के लिए विद्यार्थी द्वारा तैयार प्रस्तुति एवं कोर्स में दी गई कविताओं में आए भाव एवं सौन्दर्यबोध की पहचान हो सके इस तरह विद्यार्थी को तैयारी करनी होगी।
क्रम कविता का शीर्षक कवि
1. आली री म्हारे णेणा बाण पड़ी मीराँबाई
2. मेरो मन अनत कहाँ सुख पायो सूरदास
3. तब तौं छवि पीवत जीवत हौं घनानंद
4. बीती विभावरी जाग री जयशंकर प्रसाद
5. मैं नीर भरी दुख की बदरी महादेवी
6. ऊषा शमशेर बहादुर सिंह
7. कुदाली केदारनाथ सिंह
8. विदूषक की प्रार्थना मोहन डहेरिया
मूल्यांकन के आधार( लिखित एवं मौखिक तथा आंतरिक एवं बाह्य दोनों के लिए)
1- कथ्य
2- प्रस्तुति
3- भाषा
4- स्वतंत्र चिंतन