जिन खोजा तिन पाइयां

इस ब्लॉग में विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं के उत्तर देने की कोशिश की जाएगी। हिन्दी साहित्य से जुड़े कोर्सेस पर यहाँ टिप्पणियाँ होंगी,चर्चा हो सकेगी।

Saturday, 9 November 2013

नई ज़मीन पर खड़े नए मिथक

नई ज़मीन पर खड़े नए मिथक

"आधुनिकता जहाँ कला आंदोलनों की उर्वरा भूमि रही है, वहाँ उत्तर आधुनिक समय में साहित्य, तमाम ज्ञान के क्षेत्र एवं विषयों से घिरा, प्रमुख रूप से अन्तर्विद्याकीय प्रकृति का रहा है। मिथक आधुनिकता एवं उत्तर-आधुनिकता के बीच इस तरह अवस्थित है कि उसके पाँव आधुनिकता की ज़मीन पर पंजों के बल पर टिके हैं और नज़र भविष्य पर स्थित है। इस उत्तर-आधुनिकता के दौर में मिथक का यही महत्व है कि वह स्त्री मिथकों के नए संदर्भों को उजागर करता है।  साथ ही एक प्रश्न भी खड़ा करता है कि अगर मिथक का संबंध कहीं- न- कहीं हमारी पहचान से जुड़ा है, तो दलित, आदिवासियों के मिथक की खोज इस समय का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा होना चाहिए; क्यों कि मिथक के मूल में जो कुछ भी है- धर्म, अनुष्ठान, अतिकल्पना- वह सब कुछ दलित जीवन में भी होना चाहिए। आदिवासी जीवन की तो भूमि ही प्रकृति है अतः ऋतु-चक्र, ऊषा- रात्रि, जन्म-मरण के अनुष्ठान वहाँ भी मौजूद हैं।
इसे रेखांकित कर के पढ़ा जाए कि राजनीतिक आधार विमर्शों को अस्थायी आधार दे सकते हैं, परन्तु मिथक क्योंकि सामूहिक आकांक्षाओं को रूप देते हैं अतः विमर्शों को एक स्थायी पहचान दे सकते हैं । इसमें कोई संदेह नहीं कि राजनीतिक संदर्भ (अधिकार) अथवा दबाव अथवा समय की माँग से उपजा दलित एवं नारी साहित्य अथवा अन्य प्रकार के हाशिए के साहित्य के अस्तित्व के लिए जितने राजनीतिक आधार कालजयी नहीं साबित होंगे, उतने  मिथकीय आधार दीर्घजीवी साबित होंगे।"
12-13 जनवरी 2013 को म.स. विश्वविद्यालय, बरोडा में आयोजित –महाभारत में मिथक नामक राष्ट्रीय  संगोष्ठी में -मिथक की पुनःसर्जना का मनोविज्ञान विषय पर अपने आलेख में मैंने उपरोक्त विधान किया था। उस समय मैं इस बात से अनभिज्ञ थी कि जे.एन.यू में महिषासुर शहादत दिवस  मनाया जा चुका है। दिनांक 14/10/2013 के इंडियन एक्सप्रेस की विशेष वार्ता पढ़कर मुझे अपने पूर्वोक्त कथन का स्मरण हो आया। अपनी कम-जानकारी को तो सबसे पहले मैं स्वीकार कर ही लेती हूँ परन्तु इंडियन एक्सप्रेस की इस वार्ता ने मुझे कई तरह से सोचने पर विवश कर दिया। यह मुद्दा अत्यन्त संवेदनशील है,  इस अर्थ में कि आज की ज्वलनशील विचारधारात्मक एवं राजनैतिक अनिश्तितता वाली स्थिति में, इस संदर्भ में कुछ भी कहने पर अथवा पक्ष लेने पर, किसी भी प्रकार की ग़लतफहमी देखते ही देखते निर्मित हो सकती है। इस संदर्भ में मुझे एक युवा चिंतक ने चेताया भी है। लेकिन मैं सोचती हूँ कि अगर कहने और न कहने के बीच की कोई भाषा हो ,तो उसके जरिए  मैं अवश्य ही अपनी बात आप तक पहुँचाऊंगी।
महिषासुर के मिथक ने मुझे सोचने पर बाध्य किया । ऋषि मुनियों को तप के पथ से विचलित करने के लिए स्त्रियों को भेजना- इन्द्रपुरी की परंपरा रही है। वहाँ मुद्दा इंद्र की सत्ता का रहा है।  ऐसे में अगर आदिवासी समाज ऐसा मानता है कि छल से दुर्गा को भेजा गया था[1], तो यह असंभव अथवा अतार्किक तो नहीं लगता। सामाजिक स्थलों पर स्त्रियों के अपमान के व्यापक  प्रसंग तो अपने महाकाव्यों में हमें मिल जाते हैं। द्रौपदी का ही मुख्य प्रसंग ले सकते है। उसी तरह अत्यन्त सलीके से अविश्वास करने वाला और यूँ, एक तरह से अपमानित करने का प्रसंग सीता के अग्निप्रवेश का  है। छल –छद्म से पत्नी का त्याग (सीता) अथवा ग्रहण( पाणिग्रहण-गांधारी) भी हमारे महानायकों/ नायकों  के जीवन का एक अंश है । इसके बहुत अलग उदाहरण हमें उस संस्कृति में मिलते हैं जिनमें हम राक्षस अथवा असुर को शामिल करते हैं। अपहरण करने के बावजूद मर्ज़ी के विरुद्ध सीता को रावण ने कामना की दृष्टि अथवा वृत्ति से स्पर्श भी नहीं किया था- (अपहरण के दौरान जो स्पर्श हुआ हो, उसके अलावा) ऐसी परंपरा आदिवासी जीवन में भी नहीं मिलती। अतः इस बात पर भरोसा करने का मन हो आता है कि महिषासुर दुर्गा के धोखे में आ गया होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि राज्यों, राष्ट्रों अथवा साम्राज्यों में वर्चस्व की राजनीति  प्रायः पराजित का चरित्र संदेह के दायरे में रखती  है, अथवा, उसमें  चरित्र नाम के किसी पदार्थ का कोई अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करती। फिर असत्य पर सत्य की विजय  का सूत्र हमारी चेतना में शताब्दियों से इस तरह अंकित हो गया है अपने वीर नायकों तथा उनसे भिड़ने वाले खलनायकों के संदर्भ में,  भाषा के स्तर पर भी महिषासुर और शहादत को पास-पास रखने के विषय में सोच भी नहीं सकते। युद्धभूमि में राम और रावण दोनों समान शक्ति से लड़ रहे हैं, पर कवि के लिए राम पृष्वी पर नवनीत चरण धर रहे हैं और रावण पृथ्वी को टलमल किए दे रहे हैं ; अथवा राम की आँखें रक्त-कमल के समान हैं और रावण की आग से समान.....इसे पढ़ कर हमारे भीतर का राष्ट्रीय मन कितना तो फूल कर कुप्पा हो जाता है। निराला कवि हैं अतः उन्होंने अपनी बात को काव्य के शोभापरक अंगों से इस तरह प्रस्तुत किया है कि वही  हमारे लिए अटूट सत्य हो जाता है। राष्ट्रीय चरित्र का यह रूप,  जन-सामान्य की चेतना, मन और समझ  में इसी तरह निर्मित किए जाते हैं कि हमें वे सत्य का आभास दें।
किन्तु महिषासुर का यह कथानक हमारे परंपरागत नायकत्व के विरुद्ध एक संदेह निर्मित करने का उपक्रम करता है। इस उत्तर-आधुनिक समय में एक तरफ अस्मिता का प्रश्न है तो दूसरी तरफ बहु-संस्कृति का भी प्रश्न है। मल्टी –कल्चरिज़्म की दृष्टि से यह उन अन्याय पूर्ण घटनाओं के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है जहाँ सांस्कृतिक उच्चावचता एक सामन्य बात थी। अर्थात अगर मल्टी-कल्चरिज़्म एक न्याय-पूर्ण एवं लोकतांत्रिक तथा अधिकार प्रदान करने वाली एक संकल्पना है, तो, महिषासुर का प्रसंग उस पर एक प्रश्नार्थ खड़ा करता है। दूसरे, इस प्रकार के  विवेचन ने ट्राइबल आइडेंटिटि के प्रश्न को मिथकीय स्तर पर स्थापित कर दिया है। इसे हम वंशीय उच्चावचता ( रेशियल हाइरार्की) की दृष्टि से भी देख सकते हैं।   श्रीलंका में होती रावण –पूजा, अपने देश में [2],  हमारे लिए चाहे कोई ख़ास अहमियत न हो उसकी;  क्योंकि दोनों देश और उनकी संस्कृति भिन्न है; लेकिन बात जब एक ही देश के, जनजातीय और सवर्ण के बीच संघर्ष की हो जाती है, तब वह ठीक वैसी नहीं रहती। याद रखिए , अभी हमने स तरह पूरे प्रसंग को देखा नहीं है अथवा अगर कहा है,  तो वह इस रूप में नहीं।  
 इसी बात  को  एक अलग ही भूमिका पर रख कर देखा जा सकता है। मल्टी-कल्चरिज़्म की संकल्पना लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में ही संभव हो सकी [3] है। भारत जैसे एक लोकतांत्रिक देश में संवैधानिक रूप से प्राप्त समानाधिकार,  आज़ादी के इतने वर्षों बाद अगर इस प्रकार का परिणाम लाते हैं, ला सकते हैं, तो इसे सही अर्थों में हमारी लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली की विजय मानी जानी चाहिए। निश्चय ही यह माना जा सकता है कि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था से शासित होने वाले देश के भविष्य  अथवा वतर्मान की चिंता करने की आवश्यकता  नहीं है। हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था धीरे-धीरे अपना आकार ग्रहण कर रही है। चूँकि हम एक राष्ट्र के रूप में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली द्वारा शासित होते हैं अतः संविधान के अनुसार चलना ही हमारे समय की राष्ट्रीयता कही जा सकती है।  इसे मिथकीय चिंतन का उत्तर-आधुनिक विकास भी कहा जा सकता है।
एक विशिष्ट चिंतन –दृष्टि के रूप में मिथकीय चेतना एवं चिंतन आधुनिक काल से आरंभ होता है।[4] आधुनिक काल में मिथक की पुनर्व्याख्या को व्यक्तिगत विकास और सत्ता के असहयोग अथवा समझौते के रूप में देखा जा सकता है (एकलव्य, शंबूक, कर्ण ) । अथवा उनके सत्ता के प्रति समर्पण के रूप में भी देखा जा सकता है,  उदाहरण के लिए  शबरी , अहिल्या और संपाति । इस उत्तर-आधुनिक विमर्श में  मिथक का अध्ययन एक ही जातिगत अस्मिता के परिप्रेक्ष्य में मिथकों का  अध्ययन एवं विश्लेषण  केअर्थ में किया जा सकता है । विचारधारा की दृष्टि से मिथक को देखना आधुनिक परिप्रेक्ष्य है,  किन्तु अस्मिता के निदर्शन एवं संकट के रूप में मिथक को देखना उत्तर-आधुनिक विमर्श  हो सकता है ; जो मिथकीय चरित्र आधुनिक काल में भी मुख्यधारा चिंतन  में घुल नहीं सके , वे ही संभवतः उत्तर-आधुनिक विमर्श में अपनी पहचान स्थापित कर सकेंगे। आश्चर्यजनक रूप से मैथिलीशरण गुप्त की शूर्पणखा , जो बाद में नरेन्द्र कोहली में विकसित होती है, इस उत्तर-आधुनिक विमर्श के बीज अपने में लिए हुए है। इसालिए जनजातीय रामायणों एवं महाभारत की कथाओं को पुनः इस दृष्टि से पड़तालने की आवश्यकता है। हमारे अपने समय में संजीव के उपन्यासों का अध्ययन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा। इस संदर्भ में महुआ मांझी के एकाध उपन्यास भी देखा जा सकता है।  
                                                                                                                            रंजना अरगडे 




[1] इस संदर्भ में जो कथा अख़बार में कही गयी थी वह यह है कि – महिषासुर एक अत्यन्त वीर एवं साहसी जनजातीय राजा था। आर्यों ने अपने आक्रमण के दौरान उस पर विजय प्राप्त करने हेतु दुर्गा नामक स्त्री को छल से  भेजा था। महिषासुर चूँकि एक न्यायप्रिय जनजातीय राजा था और क्योंकि वे स्त्रियों और बच्चों पर हाथ नहीं उठाते थे, अतः इस बात का लाभ उठाते हुए आर्यों ने छल से दुर्गा को भेजा था  और उसको मारा था।
[2] हमारे देश में तमिलनाडु , केरल, प.बंगाल में रावण की पूजा होती है- प्रो. कृष्णा, हैद्राबाद
[3] यहाँ पर इस बात को भी समझा जा सकता है कि भारत में अनेक संस्कृतियों की उपस्थिति एक विशिष्ट प्रकार की भारतीयता को जन्म देती है, क्योंकि तब लोकतांत्रिक शासन प्रणाली नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद संविधान के निर्माण के बाद संवैधानिक अधिकार उसी भारतीयता की संकल्पना को सदृढ करते हैं। अतः भारतीय संस्कृति में आने वाले संदर्भ में संस्कृति (कल्चर) और आज जिस बहु-संस्कृति में संस्कृति की बात की जा रही है, वह संस्कृति भिन्न है।
[4] फेबल्स ऑफ आयडेंटिटि, नॉर्थरोप फ्राय

Thursday, 5 September 2013


देह-मन-चेतना में, हिन्दी है आत्मा में,
देश में, विदेश में, हिन्दी हर वेश में

हिन्दी उत्सव - 2013

Saturday, 13 July 2013


(इस पोस्ट में अज्ञेय के छन्द और कविता के परस्पर संबंध के बारे में एक टिप्पणी है। काव्य शास्त्र के कोर्स में आपके लिए यह बहुत उपयोगी रहेगी)

HIN 502  काव्यशास्त्र – सृजन और सौन्दर्य

छन्द : भाषा की ध्वनियों का संगठन या नियमन । छन्द के द्वारा हम साधारण बोल-चाल के गद्य की लय को नियमित करते हैं – यानी स्वर मात्राओं के परस्पर संबंधों को सरलतर बना देते हैं : जो निहित रहता है उसे विहित कर देते है- या कर नहीं देते तो पहचाना जाने लायक कर देते हैं।
       छन्द स्वरों को स्पष्टतर करता है : भाषा की गति को धीमा करता है क्योंकि स्वरों की मात्रा बढ़ाता है : दीर्धतर स्वर अपनी पूरी अनुगूँज के साथ सामने आते हैं। उन की सच्ची रंगत पहचानी जाती है। स्वरों  की रंगत भावना की रंगत है : अतः छन्द के द्वारा स्वर अर्थ की वृद्धि करते है। छन्द मय उक्ति हमें शब्दार्थ भर नहीं देती --------- रंजना - विशिष्ट भावार्थ देती है।
       छन्द शह्दों को मूर्त करता है, मुखर करता है, उनके ध्वन्याकार को आलोकित करता है।
       छन्द- काव्य भाषा की आँख है। भाषा अपने को केवल सुन कर भी काम चलाती रहती है ; काव्य-भाषा अपने को देख भी लेती है।

                                                       ( पृ 37 , भवन्ती, अज्ञेय राजपाल एंड स्स, दिल्ली प्रथम संस्करण , 1972)

Saturday, 25 May 2013

नवागन्तुको,

      आपका एम. ए. हिन्दी  के छमाही  पाठ्यक्रम में स्वागत है। तृतीय वर्ष का परिणाम निकल आया है और आप जब प्रवेश ले चुकें होंगे तब यह पोस्ट देखेंगे। किन्तु अगर आपने पहले इसे देख लिया हो तो आप पहला काम यह करें कि गुजरात युनिवर्सिटी की वेबसाईट पर जाएं। वहाँ डाऊनलोड पर क्लिक करें फिर सिलेबस पर जाएं और एम ए हिन्दी    w e f   from 2012  पर क्लिक करें और पाठ्यक्रम का अभ्यास कर लें। आप यह जान लें कि किस तरह की तैयारी आपको करनी है। आप क्या पढ़ने वाले हैं। पाठ्यक्रम को डाउनलोड  कर के उसे अपने पास उपलब्ध कर लें। 
     
     
    इस वर्ष ब्लॉग  लेखन नियमित हो , ऐसी मेरी कोशिश रहेगी।
 

    आप जितने सक्रीय रहेंगे, उतना ब्लॉग प्रकाशित होगा।

    पहला काम करें अपना ई-मेल अकाऊंट  खोल लें।

     शेष मिलने पर





पुनश्च

कोर्स ४०९ को लेकर आपने में जो सवाल उठाए हैं, उनके संबंध में पहले तो मुझे आपको बधायी देनी चाहिए कि आप अपने पाठ्यक्रम को गंभीरता से लेते हैं। फिर आप अध्ययनशील भी हैं। लेकिन हमें अपना अध्ययन निरंतर पैना बनाना चाहिए। अपने जिन सवालों को उठाया है,उनमें पहला प्रश्न बाणभट्ट के प्रकाशन वर्ष को लेकर था। आप को यह तो पता ही है कि इस उपन्यास को आपको विशेष रूप से नहीं पढ़ना है। जैसे सूरज का सातवाँ घोड़ा इत्यादि। पर हिन्दी उपन्यास में आए विभिन्न मोडों में से एक यह भी है। इस का असर उत्तर आधुनिक समय के उपन्यासों पर देख सकते हैं। बाणभट्ट आत्मकथा नहीं परन्तु आत्मकथनात्मक उपन्यास है, जैसे कि ओम्प्रकाश वाल्मीक के जूठन के विषय में कहा जाता है। फ़र्क यह है कि बाणभट्ट की कथा हजारी प्रसाजी कहते हैं और वाल्मीक की कथा स्वयं कहते हैं वाल्मीक

Friday, 17 May 2013



यह एक प्रस्ताव है और हमारा आपसे निवेदन है कि इसे आप गंभीरता से पढ़ें तथा अपने विचारों से अवगत कराएं ।

अकादमिक जगत में इतने वर्ष काम करते हुए हमें यह बात बड़ी शिद्दत से अनुभव हुई है  कि हिन्दी के शोध कार्यों में शोध प्रविधि के मानकीकरण का नितान्त अभाव है। (यह अनुभव आपका भी होगा) इस मानकीकरण के अभाव के कारण  हमारे शोध कार्यों में स्तरीकरण का अभाव देखा जा सकता है। भारत के सभी विश्वविद्यालयों में वर्षों से पीएच. डी. का तथा एम.फिल का शोध कार्य हो रहा है। कई विश्वविद्यालयों में एम. ए. के स्तर पर भी इस प्रकार का कार्य होता रहा है। हम सभी का यह साझा अनुभव रहा है कि तमाम विश्वविद्यालयों में जो शोध कार्य हो रहे हैं उनमें शोध प्रविधि का या तो अंशतः अभाव होता है अथवा उसका किसी मानकीकृत स्वरूप का प्रयोग नहीं होता है।  मानकीकरण के अभाव की समस्या के संदर्भ में समाज-शास्त्रीय विषयों , शिक्षा,  विज्ञान के विषयों में अथवा अंग्रेज़ी के समक्ष यह चिन्ता नहीं है।
आज जब व्यापक रूप से शोध कार्य करने के कारणों में परिवर्तन आ गया है , परिस्थितियों में बदलाव आ गया है तथा राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हम हिन्दी भाषा तथा उसके साहित्य को स्थापित करने की मंशा रखते हैं, उसके अध्ययन-अध्यापन को लेकर उत्साहित हैं , तब इस मानकीकरण की हमें अधिक आवश्यकता है। हिन्दी साहित्य का अध्यापन  केवल विभिन्न भारतीय प्रांतों में ही नहीं होता अपितु विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में हो रहा है।
आज अंग्रेज़ी पढ़ने वाला चाहे हिन्दुस्तान में रहकर अंग्रेज़ी में शोधकार्य करे, चाहे इंडियन इंग्लिश लिटरेचर पर करे या अमरीकन इंग्लिश लिटरेचर  पर करे अथवा चीन -जापान में रह कर अंग्रेज़ी साहित्य में शोध कार्य करे, परन्तु वह सामान्य रूप से एम. एल.ए. स्टाईलशीट का प्रयोग करेगा। अथवा वह अन्य जिसका भी करेगा उसका उल्लेख अपने शोध कार्य की भूमिका में अवश्य करेगा। एम. एल. ए. स्टाइलशीट के किस संस्करण से क्या लेना  है , इस संबंध में भी एकरूपता देखी जा सकती है। अतः अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ने वाला विश्व का हर शोधार्थी एक प्रकार की शोध प्रविधि का उपयोग करता हुआ दिखता है जिसके कारण शोध में आने वाली अनेक स्तरहीन बातें अपने आप निलंबित हो जाती हैं।
इसके ठीक विपरीत शोध प्रविधि में मानकीकरण के अभाव में हमारे यहाँ किये जाने वाले शोध कार्यों में अनेक क्षतियाँ रह जाती हैं। मानकीकरण के अभाव में किसी को इस संदर्भ  में टोका भी नहीं जा सकता। ऐसे शोधकार्य इसीलिये, अमान्य भी नहीं किये जा सकते।  परिणामस्वरूप शोधार्थी कई बार अख़बार से लेकर विज्ञापन के लिये प्रसिद्ध किए हुए  चौपाने तक से संदर्भ लेने में हिचकिचाते नहीं हैं। संदर्भ कहाँ से नहीं लेने चाहिए उसका कोई मानकीकृत निर्देश न होने के कारण शोध कार्यों की स्थिति  कई बार बड़ी अराजक हो जाती है।
विषय-चुनाव  की दृष्टि से हमारे शोध विषय की मर्यादा भी रेखांकित नहीं हो पायी है। हमारे विषय का अतिक्रमण कई बार धर्मशास्त्र में होता  है अथवा कई बार दर्शनशास्त्र में । इसे अन्तर्विद्याकीय अध्ययन के रूप में करना है तो शोध प्रविधि भी उस प्रकार की होना ज़रूरी है- इस बात को गंभीरता से नहीं लिया जाता। इस संबंध में सबसे अधिक अराजकता तथाकथित 'तुलनात्मक अध्ययनों' में होती है।  
इसी शोध-प्रविधि  के अभाव में आजकल शोध-कार्य स्वीकृत होने के पूर्व ही –  इस उम्मीद में कि, इसे आगे तो छपना ही है, --   समर्पित करने की पहल भी कई विश्वविद्यालयों  के शोध-कार्यों में दृष्टिगोचर होने लगी  है।
यह अत्यन्त चिंता का विषय है कि अकारादि से दी हुई संदर्भ-ग्रंथ सूचि  तथा  शोध कार्य की भाषा में निजवाचक सर्वनाम के प्रयोग के संदर्भ में 80 प्रतिशत शोधकार्य किसी भी प्रकार के नियमों का पालन नहीं करते।
इसमें कोई संदेह नहीं कि वैदुष्य एवं शोध-प्रतिभा का क्रमशः क्षरण हो रहा है साथ ही शोध-कार्य के उद्देश्यों में परिवर्तन आ गया है। ऐसे में यह अत्यन्त आवश्यक हो गया है कि हम किसी मानकीकृत प्रविधि का प्रयोग करें। अब अगर यू. जी. सी. शोध कार्यों को नेट पर रखने वाली  है , तो,  मानकीकृत प्रविधि के अभाव में हमारे शोधकार्यों की विद्वत् समाज के  सम्मुख सामाजिक  स्वीकृति का प्रश्न भी  तो उठेगा ।  
आज जब सभी विश्वविद्यालयों को शोधकार्य हेतु छात्रों को पंजीकृत करने के लिए परीक्षा पद्धति का मानकीकरण हो गया है और सभी इसका पालन करने के लिए बाध्य हैं, तो क्यों न हम हिन्दी भाषा साहित्य में होने वाले शोध कार्यों की प्रविधि के मानकीकरण की दिशा में पहल करें ? शोध कार्यो के अभिलेखिकरण की भी आवश्यकता है तथा उसका भी मानकीकरण करने की भी आवश्यकता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे पास शोध-प्रविधि की अपनी एक भारतीय परंपरा भी रही है। उसे तथा आज की हमारी आधुनिक प्रविधि को जोड़ कर क्या हम अपनी एक मानकीकृत पद्धति को नहीं अपना सकते ? इस संबंध में हमारे पास पुस्तकें भी उपलब्ध हैं जो इस कार्य में हमारी मदद कर सकती हैं। अगर किसी विश्वविद्यालय में इस प्रकार की पहल हुई है तो उसे भी देखा जा सकता है। हमें नये सिरे से कुछ नहीं करना , परन्तु जो अव्यवस्थित है,  उसे संपादित कर के व्यवस्थित करना है।
यह हमारी साझा चिंता का विषय है, अतः हमें साथ मिल कर इस संबंध में काम करना होगा।  इस संबंध में किस तरह कार्य किया जा सकता है,  अपने विचारों से अवगत कराएं ।
·       सबसे पहली बात तो यह है कि क्या हम इस विचार से सहमत हैं! अथवा क्या असहमत होने का हमारे पास कोई विकल्प है?
·       क्या हमें आरंभिक स्तर पर क्लस्टर्स बना कर आस-पास के विश्वविद्यालयों में समानांतर समय पर, कार्यशालाओं के माध्यम से काम करना चाहिये- चाहे राज्य स्तर पर अथवा अन्तर्राज्यीय स्तर पर?
·       इसके बाद हर कार्यशाला के परिणामों को किसी राष्ट्रीय संगोष्ठी के अन्तर्गत चर्चा कर के किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिये?
·       प्रत्येक विश्वविद्यालय को संगोष्ठियों के लिए  अनुदान मिलता है। क्या हम इस हेतु आते एक दो वर्ष बारी बारी अपने अनुदान को इस विषय के लिए खर्च कर सकते हैं ?
·       क्या इसके लिये कोई अलग संस्था बनानी चाहिये अथवा वर्तमान किसी राष्ट्रीय संस्था के मंच से यह काम करना चाहिये?
हम जिन भी शोध परिणामों पर पहुँचेंगे, इसका पालन करने के लिए यू. जी. सी. ने जिस कोर्स वर्क का आग्रह रखा है उसमें इसे समान रूप से लागू किया जा सकता है। इस तरह हमारे सामूहिक परिणामों को समान रूप से लागू भी किया जा सकता है।
आपके प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा है।

रंजना अरगडे,      अध्यक्ष हिन्दी विभाग ,    गुजरात विश्वविद्यालय,  अहमदाबाद               
माधव हाडा,       अध्यक्ष हिन्दी विभाग,     मो. सु. विश्वविद्यालय,   उदयपुर                         
शैलजा भारद्वाज,   अध्यक्ष हिन्दी विभाग,    म.स. विश्वविद्यालय,    बरोड़ा                                    
गीता नायक,        अध्यक्ष हिन्दी विभाग,    विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
                                                                               
                                                                                    
                                                                                                                                                

                                                                  







Tuesday, 21 August 2012



विद्यार्थी मित्रो,
इस बार हम सत्र में बहुत देर से मिले हैं। इसका कारण भी था। एक तो चौथे सेमिस्टर के परिणाम अभी-अभी घोषित हुए हैं, और दूसरा, हमारी सेमिस्टर पद्धति के ढाँचे में परिवर्तन होने की संभावना थी। कल ही नया परिपत्र आया है। अतः मैंने सोचा कि अब हम इस वर्ष की शुरुआत कर सकते हैं।
तो इस सेमिस्टर की पहली चिट्ठी में तीन मुद्दे।
  • सबसे पहले तो हम सेमिस्टर -4 में उत्तीर्ण हुए अपने सभी विद्यार्थी मित्रों को बधायी देते हैं। भाषा भवन के हिन्दी विभाग का परिणाम 100% आया है। विभाग के लिए बहुत ख़ुशी की बात है। नई परीक्षा की पद्धति, नया सिलेबस , सामग्री ढूँढने में कठिनाई और न जाने कितना कुछ। इन तमाम संकटों को पार करते हुए इन छात्रों ने अच्छा प्रदर्शन किया। सबसे बड़ी बात यह है कि इन चारों सेमिस्टर में अध्ययन करते हुए इन सभी छात्रों ने एक उत्साह का वातावरण बनाए रखा। भाषा-भवन के हिन्दी विभाग में सुश्री सुमन पाल को सर्वाधिक अंक मिले हैं। लगभग 69% अंक मिले हैं। सुमन पाल को हम सब की ओर से भी बधायी।
  • दूसरी बात । हमने ब्लॉग पर एक फीडबैक फॉर्म डाला था। मुझे अफसोस है कि किसी ने भी वह फॉर्म भर कर भेजा नहीं है। इसका अर्थ तो यही है कि आप लोगों को कुछ कहना ही नहीं है। आप इस बात को कभी न भूलें कि जो चुप रहते हैं वे खो जाते हैं।
  • तीसरी बात। अब इस वर्ष से हमारी पाठ्यक्रम-व्यवस्था में परिवर्तन आया है। इस विषय में कुछ बात हो जाए। अब तक हमारे हर कोर्स में  पाँच यूनिट हुआ करते थे। अब हमारे कोर्स में चार यूनिट होंगे। नया पाठ्यक्रम जल्दी ही आपको उपलब्ध कर दिया जाएगा। प्रश्न-पत्र की पद्धति में भी परिवर्तन आया है। अब यह पद्धति इस तरह होगी-
  • प्रत्येक यूनिट में से एक प्रश्न 14 अंक का पूछा जाएगा।  यूनिट की प्रकृति के अनुसार उन्हीं चौदह अंकों में से एक लंबा प्रश्न होगा तथा एक लघु प्रश्न। यूं 14*4=56 अंक हुए। पाँचवा प्रश्न वस्तुगत (एम.सी.क्यू) होगा जिसमें चारों यूनिट में से प्रश्न पूछे जाएंगे। ये प्रश्न एक अथवा दो अंकों के हो सकते हैं। इसमें खाली स्थानों को भरा जाना, सही –गलत, जोडे बनाएं, विकल्प चुनिए आदि प्रकार के प्रश्न होंगे। यानी कुल हिसाब लगाएं तो, यूं समझिए चारों यूनिट में से 3-3 तथा एकाध में से अधिक पूछे जा सकते हैं। बात वही है, पर प्रश्न पूछने की पद्धति बदल जाएगी। अब इसमें लंबा प्रश्न का उत्तर आपको वर्तमान शब्द-मर्यादा 200 के स्थान पर, हो सकता है 400-500 शब्दों के बीच लिखना होगा। उसी तरह छोटा प्रश्न 75- 100 शब्दों की मर्यादा में लिखना होगा।
  • कुछ परिवर्तन सेमिस्टर चार में हैं। पर उसकी बात बाद में करेंगे।
मुझे उम्मीद है कि आप इस नई पद्धति के संबंध में अपनी प्रतिक्रिया देंगे।
  

Friday, 6 July 2012

आदर्श अध्यापक-डॉ भोलाभाई पटेल

आज 5 जुलाई से सत्रारंभ हुआ। मई 2012 में डॉ. भोलाभाई पटेल का अवसान हुआ। सत्रारंभ में ही हिन्दी विभाग ने अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए। हिॆंदी विभाग के अध्यापकों के तथा तृतीय  सेमिस्टर के छात्रों के साथ-साथ विभाग के शोध छात्र, भूतपूर्व छात्रों की सभा ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए । अंत में एक शोक-प्रस्ताव पढ़ा गया।


हिन्दी-विभाग
भाषा साहित्य भवन, गुजरात युनिवर्सिटी
शोक प्रस्ताव

भाषा साहित्य भवन के हिन्दी विभाग के अध्यापकों, विद्यार्थियों, पूर्व- विद्यार्थियों की यह सभा आज नए सत्र के आरंभ में स्वर्गीय डॉ. भोलाभाई पटेल, पूर्वाध्यक्ष हिन्दी विभाग, भाषा साहित्य भवन , के निधन पर शोक व्यक्त करने हेतु एकत्रित हुई है।
दिनांक 20 मई 2012 को  प्रातः डॉ. भोलाभाई पटेल का अवसान हुआ। डॉ. भोला भाई पटेल इस विभाग में सन् 1969 में व्याख्याता के रूप में नियुक्त हुए थे तथा सन् 1994 में वे प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के रूप में निवृत्त हुए। इस लंबे कार्य-काल के दौरान प्रो. भोलाभाई पटेल के मार्गदर्शन में अनेक विद्यार्थियों ने अध्ययन किया। डॉ. पटेल वास्तव में एक आदर्श एवं श्रेष्ठ अध्यापक के साक्षात् विग्रह थे। अपने कार्यकाल के दौरान आपने अंग्रेज़ी, संस्कृत, भाषा-विज्ञान, जर्मन, तथा तुलनात्मक साहित्य का अधययन कर उपाधियाँ प्राप्त की तथा यह सिद्ध किया कि अध्यापक होते हुए भी सतत विद्याभ्यास करना किसी भी अध्यापक का आदर्श लक्ष्य हो सकता है। डॉ. पटेल गुजराती भाषा के साहित्यकार तो थे ही परन्तु उनकी ख्याति एक आदर्श शिक्षक के रूप में विशेष रही।
हिन्दी के पाठ्यक्रमों में अनुवाद तथा तुलनात्मक साहित्य को समाविष्ट करना, भारत के अन्य विश्वविद्यालयों की तुलना में गुजरात विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में नए रचनाकारों को पाठ्यक्रमों में शामिल करने का श्रेय डा.पटेल को दिया जा सकता है। नए विषयों पर शोध करवाने का श्रेय भी डॉ. पटेल को दिया जा सकता है।
आदर्श शिक्षक के अलावा हमारा सारस्वत समाज उन्हें एक उत्तम अनुवादक तथा भाषा-विद् के रूप में भी सदैव याद रखेगा। उत्तर गुजरात के एक छोटे से गाँव में जन्मे डॉ. पटेल हिन्दी, अंग्रेज़ी, संस्कृत, मराठी, जर्मन, बंगाली, असामी तथा उड़िया भाषा के भी जानकार थे। उनके इस भाषा ज्ञान तथा अनुवाद कौशल के कारण वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक विशेष पहचान बना पाए थे।
डॉ.भोलाभाई पटेल अपने जीवनकाल में अनेक साहित्यक संस्थाओं से जुड़े रहे। इनमें प्रमुख हैं- गुजरात साहित्य अकादमी, गांधीनगर, गुजराती साहित्य परिषद्, अहमदाबाद, केन्द्रीय साहित्य अकादमी, दिल्ली, आदि। अपने निधन से पूर्व वे गुजराती साहित्य परिषद् के अध्यक्ष पद पर कार्यरत थे।
डॉ. पटेल ने अपने जीवन काल में अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त किए। इनमें से प्रमुख हैं – साहित्य अकादमी दिल्ली का अनुवाद तथा मौलिक लेखन के लिए पुरस्कार, उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान का सम्मान, रणजितराम सुवर्ण चंद्रक तथा भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया जाना। आपको निवृत्ति के बाद बिरला फाउण्डेशन की फैलोशिप भी मिली थी जिसके अन्तर्गत आपने भारतीय उपन्यास पर एक महत्वपूर्ण काम किया। इसके अलावा आप को निवृति के पश्चात् यू.जी.सी. की एमेरिटस फैलोशिप भी मिली थी। सतत अध्ययनशीलता डॉ. पटेल के व्यक्तिव का अविभाज्य अंश था, जो इस विभाग को प्राप्त  एक अमूल्य विरासत कही जा सकती है।
गुजरात युनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग की यह सभा अपने अग्रज को हार्दिक श्रद्धांजलि देते हुए इस बात के प्रति अपने को कटिबद्ध पाती है कि उनके बताए मार्ग पर चलते हुए उसे अधिक विस्तार एवं आयाम दें, साथ ही विभाग उनके परिवारजनों के प्रति इस शोक-वेला में सह-अनुभूति की भावना भी व्यक्त करता है।

हिन्दी विभाग के समस्त सदस्यों की ओर से-     
                                                                                                                               रंजना अरगडे
                                                                   अध्यक्ष- हिन्दी विभाग
 5 जुलाई 2012

Sunday, 13 May 2012

शमशेरजी को हमारे बीच से विदा हुए 12 मई के रोज़ 20 वर्ष हुए। 12 मई 2012 को उनकी सामग्री अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय , वर्धा को सौंपी गयी। कदाचित् यह इस तरह का प्रथम प्रयास है। महत्वपूर्ण बात यह है कि अब शमशेरजी पर शोद करने वालों के लिए एक ऐसी जगह हो गयी है जहाँ देश-विदेश के शोध छात्र आकर काम कर सकेंगे। उनकी सामग्री से जो आय होगी उसे विश्वविद्यालय छात्रों को छात्रवृत्ति देने के तथा मेडल देने के उपयोग उपरान्त शमशेरजी पर विभिन्न आयोजन करने में खर्च करेगा।
शमशेरजी अपने अंतिम समय में अहमदाबाद में रहे थे। यह इस शहर का तथा राज्य का भी सौभाग्य माना जाएगा।


Saturday, 31 March 2012

प्रश्न बैंक 508


HIN508
इस कोर्स का चौथा और पाँचवा यूनिट जिसमें शोध प्रविधि तथा शोध पत्र लेखन का सैद्धांतिक पक्ष है जो कई लोगों के लिए समस्या खड़ी करने वाला है , ऐसा मुझ तक जो बातचीत आई, उससे मैंने अनुमान लगाया। हालाँकि जो पावर पॉइंट मैंने डाले हैं उससे अधिक समस्या होनी तो नहीं चाहिए। परन्तु जो हो, मैंने शोध-प्रविधि वाले यूनिट के संबंध में एक क्वेश्चन बैंक जैसा कुछ इस पोस्ट में  डाला है। इससे आपको यह दिशा निर्देशन मिल सकता है कि इसमें आपको किस तरह की तैयारी करनी होगी। शोध पत्र लेखन वाले यूनिट पर प्रश्नबैंक अगली पोस्ट में डालूंगी। आप अपनी प्रतिक्रिया दें। आपने पिछले पोस्ट संबंधी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
200 शब्दों के प्रश्न
1.      अन्य लेखन की तुलना में शोध लेखन की शैली किस तरह भिन्न होती है, समझाएं।
2.      शोध प्रबंध लेखन में सानुपातिकता होनी चाहिए- इससे आप क्या समझते हैं.?
3.      शोध-प्रक्रिया की दृष्टि से शोध प्रविधि के तत्वों पर प्रकाश डालिए।
4.      शोध व्यवस्था की दृष्टि से शोध प्रविधि के तत्वों पर प्रकाश डालिए।
5.      ज्ञान के विषयों के आधार पर शोध-प्रविधि में क्या अंतर है, समझाएं।
6.      "ज्ञान के विभिन्न विषयों में प्रकृति तथा स्वरूप में ही अंतर नहीं होता अपितु उनकी शोध-प्रविधि में भी अंतर होता है"- इस विधान को समझाएं।
7.      साहित्यक शोध में समाजशास्त्र, विज्ञान तथा मनोविज्ञान की प्रविधि के प्रयोग का क्या तात्पर्य है, उदाहरण दे कर समझाएं।
8.      हिन्दी शोध प्रबंधों की प्रचलित शौलियों पर विचार करें।
9.      "शोध प्रविधि की वैज्ञानिकता साहित्य के प्राणतत्व रस का विरोध तथा उन्मूलन नहीं करती अपितु रक्षा करती है" इस विधान को समझाएं।
50 शब्दों के प्रश्न
1.      शोध प्रबंध का भूमिका लेखन।
2.      शोध प्रबंध का निष्कर्ष  लेखन।
3.      शोध प्रबंध में ग्रंथ सूची का महत्व।
4.      शोध प्रबंध में नामानुक्रमणिका का तात्पर्य।
5.      शोध प्रबंध का मूल भाग।
6.      सामग्री संकलन।
7.      शोध प्रबंध मे विषय निर्वाचन का महत्व।
8.      शोध प्रबंध में परिशिष्ट का महत्व।
9.      शोध प्रबंध लेखन में लिए गए तथ्यों का स्वरूप।
10.  शोध-प्रबंध लेखन में वैयक्तिक तथा निर्वैयक्तिक शैलियों का तात्पर्य समझाएं।
11.  आलोचनात्मक प्रविधि।
1 अथवा 2 वाक्यों के प्रश्न
1.      क्या शोध-व्यवस्था शोघ प्रविधि का पर्याय है?
2.      शोध व्यवस्था में वे कौन से मुद्दे हैं जो शोध-प्रविधि कहे जा सकते हैं?
3.      अज्ञान अथवा विस्मृति के कारण अवशिष्ट शोध-तत्व किसमें समाहित किये जा सकते हैं?
4.      भूमिका लेखन , प्रबंध लेखन तथा निष्कर्ष के बीच किस तरह का संबंध होना चाहिए?
5.      शोध-प्रक्रिया किसे कहते हैं?
6.      शोध प्रक्रिया में किस तरह की दृष्टि उसे शोध-प्रविधि कह सकते हैं?
7.      ग्रंथ-सूची की वैज्ञानिकता का क्या तात्पर्य है?
8.      शोध लेखन का विश्वविद्यालय चयन से क्या संबंध है?
9.      सामग्री का विश्लेषण करते समय शोधक में  तटस्थता की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए?
10.  तथ्य समायोजन करते समय वैज्ञानिकता की क्या आवश्यकता है?
11.  तथ्यों का समायोजन करते हुए उनकी परिशुद्धि कर के सत्यापन करने की आवश्यकता क्या है?
12.  ग्रंथ सूची कब शोध प्रविधि का अंग बनती है?
13.  ज्ञान के विभिन विषयों की प्रकृति तथा स्वरूप के अलावा और किस में अंतर होता है?
14.  साहित्य तथा भाषा शोध में किस प्रविधि का प्रयोग होता है?
15.  शोध-प्रबंध के लिए कौन-सी शैली अनुपयुक्त तथा अवैज्ञानिक मानी जाती है?
16.  शोध प्रबंध की कौन-सी शैली आगमनात्मक तथा कौन-सी निगमनात्मक कहलाती है?
17.  वैज्ञानिक शोध-प्रविधि का क्या अर्थ है?

Tuesday, 20 March 2012

Department of Hindi
Semester based Credit system Course
Semester-4
From June 2011
HIN 507 हिन्दी भाषा प्रशिक्षण एवं कोश विज्ञान   Course Credit -4
यहाँ इस कोर्स से संबंधित कुछ प्रश्न दिए जा रहे हैं। इस बीच यह सवाल सभी के मन में रहा कि आखिर इसमें प्रश्न कैसे पूछे जा सकते हैं। कई केन्द्रों के छात्रों के मन में यह प्रश्न भी था कि इसे ठीक तरह से पढ़ाया नहीं गया है। यह स्वाभाविक है, क्योंकि यह नितांत नया पाठ्यक्रम है और इसे स विश्वविद्यालय में प्रथम बार ही संकल्पित किया गया है और लागू भी किया गया है।  संभवतः इन प्रश्नों के आधार पर समस्या का निराकरण हो सकेगा। इस बात को ध्यान में रखा जाए कि यह कोर्स विद्यार्थी की भाषा संबंधी, भाषा के प्रयोग संबंधी समझ से जुड़ा है। आज आप हिन्दी पढ़ कर कहीं नौकरी करने जाएंगे तो अगर आप की भाषा ठीक नहीं होगी तो आपके लिए कठिनाई बढ़ेगी। आपका पिछला और वर्तमान कोर्स इसी बात की ओर संकेत करता है। भाषा को रचना के स्तर पर जानना और उसका प्रयोग करना, यही इसका उद्देश्य है। यहाँ आपकी सहायता के लिए कुछ प्रश्न दिए जा रहे हैं ताकि आप इस बात का अंदाज़ा लग सकें कि अभी आपको किस दिशा में अधिक आगे बढ़ने की आवश्यकता है। इस बात का ध्यान रखें की यह केवल पाठ्यक्रम की दिशा सूचक जानकारी है। प्रश्न का स्वरूप बिल्कुल ऐसा ही होगा, यह ज़रूरी नहीं है।
इस कोर्स के प्रथम दो यूनिट के प्रश्न भी बाद की पोस्ट में डाले जाएंगे। अभी यूनिट 3,4 तथा 5 संबंधी जानकारी आपके लिए डाली जा रही है।

यूनिट -3 निबंध लेखन
·         निबंध की भाषा

1.      कथात्मक स्वरूपों की अपेक्षा निबंध में भाषा का महत्व क्या है?
2.      निबंध की वस्तु (विषय) भाषा के माध्यम से किस तरह विकसित होती है?
3.      तत्सम प्रधान भाषा किस तरह के निबंधों में प्रयुक्त होती है। उदाहरण के माध्यम से समझाएं?
4.      बालकृष्ण भट्ट अथवा अपनी पसंद के किसी अन्य निबंधकार की भाषागत विशेषताएं लिखिए।
5.      तद्भव भाषा अथवा बोलचाल की सामान्य भाषा में लिखे निबंधों की विशेषताएं बताइए।
6.      नारी अथवा स्त्री निबंध की भाषा में निहित अंतर समझाएं।
7.      अपने पढ़े किसी भी निबंध के आधार पर सामासिक भाषा तथा सरल भाषा के उदाहरण दें।
8.      विज्ञापन युग निबंध की भाषा पर प्रकाश डालें।
9.      हिन्दी का महत्व नामक विषय पर बोलचाल की अथवा तत्सम प्रधान भाषा में निबंध लिखें।
10.  अगर गद्य कविता की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है- इस विधान को समझाएं।
11.  (406 वाले कोर्स के निबंधों को आधार बना कर भी प्रश्न पूछे जा सकते हैं।)


·         निबंध की शैली

1.      निबंध के स्वरूप में शैली का संबंध लेखक के व्यक्तित्व के साथ किस तरह जुड़ा है- उदाहरण दे कर समझाएं।
2.      शैली निबंध का प्राण है- इस कथन पर अपने विचार लिखें।
3.      निबंध की विभिन्न शैलियों पर प्रश्न पूछे जा सकते हैं। जैसे वर्णनात्मक, विवरणात्मक, सामासिक आदि।
4.      निबंध के स्वरूप में शैली का संबंध किन किन तत्वों से जुड़ा है, समझाएं।

Ø  1 अंक के प्रश्न
1.      शैली के लिए प्रयुक्त अन्य समानार्थी शब्दों के नाम लिखें।
2.      (इसमें कुछ उदाहरण दे कर यह पूछा जा सकता है कि शैली कौन सी है अथवा भाषा किस प्रकार की है। ये उदाहरण प्रसिद्ध रचनाओं में से लिए जाएंगे। अथवा 406 में जो आप पढ़ चुके हैं उसमें से पूछा जा सकता है।
·         विभिन्न प्रकार के निबंधों में प्रयुक्त भाषा का पाठ
1.      इसमें कुछ प्रसिद्ध निबंधों के उदाहरण दे कर  उनके भाषा पाठों के संदर्भ में प्रश्न पूछे जा सकते हैं। परीक्षार्थी से अपेक्षित यह है कि उसे भाषा पाठों के बारे में जानकारी होनी चाहिए।

Ø  इसमें आपको बाकायदा निबंधात्मक लेखन करना होगा।(200 शब्दों में)। इसमें आपने अब तक जो पढ़ा है, उसी को आधार बना कर पूछा जा सकता है। इस संदर्भ में ब्लॉग में जानकारी दी है।
1)      
1.      कोश- निर्माण
·         विभिन्न प्रकार के कोशों का परिचय, महत्व एवं उपयोगिता
·         हिन्दी कोशों का परिचय
·         कोश निर्माण के सिद्धांत
·         कोश निर्माण में आने वाली बाधाएं
 इसमें  जिस प्रकार के प्रश्न आ सकते हैं वह स्वतः स्पष्ट हैं अतः अधिक बताने की आवश्यकता नहीं है।