जिन खोजा तिन पाइयां

इस ब्लॉग में विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं के उत्तर देने की कोशिश की जाएगी। हिन्दी साहित्य से जुड़े कोर्सेस पर यहाँ टिप्पणियाँ होंगी,चर्चा हो सकेगी।

Thursday, 15 March 2012


HIN509-अनुवाद में उत्तर आधुनिकता
(1)
"अनुवाद में उत्तर-आधुनिकता" हमारे HIN509 कोर्स का पाँचवा यूनिट है। अनुवाद और उत्तर आधुनिकता की चर्चा कोई नई नहीं है। उत्तर आधुनिकता का प्रभाव जिस तरह साहित्य पर पड़ा उसी तरह अनुवाद पर भी पड़ा। इसकी चर्चा करने के पूर्व हम इसकी एक भूमिका समझ लें।
जेम्स होम्स ने 1972 में 'दू नेम एंड नेचर ऑफ ट्रांस्लेशन स्टडीज' में जैसे अनुवाद अध्ययन की शुरुवात का घोषणा-पत्र जारी कर दिया। अगर इस वर्ष को आधार मानें तो यह कहना पडेगा कि कि अभी अनुवाद अध्ययन को पूरे पचास वर्ष भी नहीं हुए हैं। अभी यह विद्या शाखा अपने बचपन या किशोर अवस्था में ही है। परन्तु तेज गति से दौड़ते इस समय को देखते हुए ज्ञान शाखाएं बहुत जल्दी और तेज़ी से बड़ी हो रही हैं अतः हम कह सकते हैं कि इस विद्या शाखा का यह फुल्ल-यौवन काल है।
अनुवाद संबंधी हमारी समझ को हम तीन हिस्सों में बाँट सकते हैं
1-       

अनुवाद कार्य (यह अनुवाद से जुड़ा सबसे प्राचीन स्वरूप है।
2-       अनुवाद सिद्धांत-( Translatology)
3-       अनुवाद अध्ययन-1972 से (Translation Studies)
अनुवाद अध्ययन का संबंध उसके उत्पादन तथा उसके वर्णन से भी संबंद्ध है। एक ऐसे सिद्धांत की खोज जो अनुवाद उत्पादन के लिए भी भी मार्ग दर्शिका रहे। अतः अनुवाद अध्ययन के दो भाग किए जा सकते हैं-
1-      शुद्ध अनुवाद अध्ययन जिसमें सैद्धांतिक तथा वर्णात्मक अनुवाद अध्ययन तथा
2-प्रायोगिक अनुवाद अध्ययन
Ø  शुद्ध अनुवाद अध्ययन के अन्तर्गत सैद्धांतिक में इन बातों को शामिल किया जा सकता है-
1. सामान्य अनुवाद अध्ययन तथा     2. आंशिक अनुवाद अध्ययन
·         आंशिक अनुवाद के अतर्गत निम्नलिखित  मुद्दों का समावेश संभव है-
a) माध्यम द्वारा मर्यादित
b) क्षेत्र द्वारा मर्यादित
c) रैंक द्वारा मर्यादित
d) पाठ द्वारा मर्यादित
e) समय द्वारा मर्यादित
f) समस्या द्वारा मर्यादित

·         (2) शुद्ध अनुवाद अध्ययन के अन्तर्गत वर्णनात्मक अनुवाद अध्ययन में इन बातों का समावेश  संभव है


a)  उत्पाद आधारित-     जिसमें पहले से ही अनूदित प्राप्त अनुवाद की चर्चा हो


b)  प्रक्रिया आधारित-     जिसमें प्रक्रिया दौरान होने वाले मानसिक प्रक्रियाओं की बात हो।


c)  प्रकार्य आधारित- जिसमें इस बात का अध्ययन हो कि लक्ष्य भाषा की संस्कृति में इन अनुवादों का क्या असर पड़ सकता है या अनुवाद की क्या भूमिका हो सकती।


Ø  अनुवाद के प्रायोगिक पक्ष का संबंध अनुवाद प्रशिक्षण, अनुवाद उपकरण तथा अनुवाद समीक्षा से संबंधित है।


आज अनुवाद के उत्तर आधुनिक संदर्भ के साथ-साथ उसके उत्तर-औपनिवेशिक संदर्भ को भी देखा जा रहा है, अतः एक महत्व का प्रश्न यह भी उठता है कि पश्चिमी जगत ने जो अनुवाद की समझ, संकल्पना तथा सिद्धांत दिए हैं, क्या हम अपने अनुवादों के परिप्रेक्ष्य में उन्हे अपने तरीके से नहीं देख सकते।

इस भूमिका के बाद जब हम अनुवाद के उत्तर आधुनिक स्वरूप की बात करते हैं तो भाषा प्रौद्योगिकी , संगणक, बाज़ार, विज्ञापन आदि की बात तो करते ही हैं पर साथ ही परिधि पर स्थित , अलक्षित को लक्षित करने की भी बात है। चाहे 1972 के पहले की बात करें या फिर उसके की बात हो , अनुवाद हमेशा दोयम दर्ज़े पर रहा है। परन्तु वाल्टर बेंजामिन और उनसे भी अधिक जाक देरिदा के बाद अनुवाद को देखने का नज़रिया बदल जाता है। पहले साहित्य केन्द्र में था अनुवाद हाशिए पर  था। वह मूल का पिछलग्गू था। लेकिन उत्तर-आधुनिकता के आने के बाद अनुवाद का स्थान बदल गया।

अनुवाद का मुख्य उद्देश्य संप्रेषण है- भावों, विचारों तथा भाषा सौन्दर्य का संप्रेषण। भाव तथा विचार की अभिव्यक्ति भाषा के माध्यम से होती है। भाषा में शब्द होते हैं और शब्दों के अर्थ होते हैं। उत्तर-आधुनिकता में प्रवेश करने का एक रास्ता यह भी रहा कि शब्द तथा अर्थ के संदर्भ में समझ बदली। अर्थ स्थिर नहीं होते। अर्थ संदर्भ के अनुसार तय होते हैं। वे अनिश्चित होते हैं, अनंत होते हैं। अतः स्रोत पाठ के किसी भी शब्द का कोई एक निश्चित अर्थ होता नहीं हैं। अतः यह तय कर पाना कि कौन-सा अर्थ लिया जाए यह बहुत मुश्किल होता है।
पहले अनुवाद का संबंध भाषा विज्ञान से ही था। व्याकरण से था। उत्तर आधुनिक समय में आ कर अनुवाद का संबंध राजनीति, समाज-शास्त्र, संस्कृति अध्ययन तथा विचारधारा से जुड़ गया।
जब हम कहते हैं हैं कि अनुवाद में एक पाठ दूसरे पाठ में, एक भाषा से दूसरी भाषा में स्थानांतरित होता है तो केवल एक भाषा व्यवस्था को दूसरी भाषा व्यवस्था में ही नहीं ले जाते बल्कि एक समाज को दसरे समाज में, एक संस्कृति को दूसरी संस्कृति को स्थानांतरित करते हैं, रूपांतरित करते हैं।
अनुवाद अध्ययन के संदर्भ में कुल तीन पोस्ट मैं भेजूंगी। इस संदर्भ में आप अफने सवाल भी भेज सकते हैं।



Monday, 13 February 2012

विद्यार्थी मित्रो,
इस ब्लॉग की बायीं ओर एक नया गेजेट मैंने जोड़ा है। हिन्दी समय। जिस तरह आप समालोचन में जा कर कई सारे नए मुद्दों को देख सकते हैं, उसी तरह इस गेजेट पर जा कर आपको हिन्दी संबंधी नई जानकारियाँ मिलेंगी। यह अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्द्धा की वेब-साईट है। मैं चाहूँगी आप इसे अवश्य देखें। आपको हिन्दी से जुड़ी विपुल जानकारियाँ मिलेंगी। यहाँ तक कि अगर आप एम. ए. के बाद वहाँ जा कर पढ़ना चाहते हैं,  तो आप उस विश्वविद्यालय के अनेक कोर्सेस से परिचित होंगे। इसमें छबियाँ हैं, फिल्में हैं, कई पुस्तकें ई-स्वरूप में भी हैं। इसे देख कर मुझे तो लगा कि भविष्य में हम भी गुजरात युनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग की एक ऐसी वेब-साईट बना सकेंगे।

Tuesday, 7 February 2012

सुरेखा बहन,
आपने लिखा है कि आप बाह्य छात्रा हैं। आप कुछ पूछना चाहती थीं। मैं जो जानती हूँ, आपको अवश्य बताऊंगी, अगर वह मेरे लिए संभव हो तो। आपको इस ब्लॉग से नई दिशा मिली, यह अच्छी बात है। आप हिन्दी कंप्यूटिंग की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, यह उत्साहवर्द्धक  बात है। पर आपका काम केवल ब्लॉग से नहीं होगा। आपको पढ़ना भी पड़ेगा। यह आपसे मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि आप ही की तरह और विद्यार्थी भी होंगे। यह उनके लिए भी है। 
लगता है आपका प्रश्न अधूरा है अभी। आपने कौन-सी पोस्ट पढ़ी है। 
रंजना अरगडे

पिछली पोस्ट से जारी ( HIN507 )
आपने पिछली पोस्ट पढ़ी होगी और आपको यह बात समझ में आ गयी  होगी कि इस प्रकार के सर्जनात्मक लेखन में टार्गेट ऑडियन्स का कितना महत्व है। अब एक काम आप कर सकते हैं। किसी भी परिचित कृति को आधार बना कर निबंधात्मक विवरण लिखने का प्रयत्न करें। सबसे अधिक सरल और परिचित कृति हमारे लिए रामचरितमानस हो सकती है। आप चाहें तो कामायनी, गोदान जैसी आधुनिक कृतियां भी ले सकते हैं। परन्तु आधुनिक कृतियाँ, तुलना में अधिक चुनौति भरी होती हैं।
आप किसी एक कृति को आधार बना कर दो निबंधात्मक विवरण लिख कर देखें। इसके शब्दों की अधिकतम सीमा 200 शब्दों की हो। अगर 200 शब्दों में संभव नहीं है तो आरंभ में 500 शब्द लिखें और बाद में उसे 200 शब्दों में संपादित करें। 200 शब्दों का आग्रह इसलिए कि हमारी परीक्षा में सबसे बड़ा प्रश्न 200 शब्दों का ही होता है। दूसरे, यह कार्य व्यावसायिक क्षेत्र के लिए आप करेंगे। वहाँ किसी के पास विस्तृत लेख पढ़ने का समय नहीं होता। तीन सेमिस्टर में अध्ययन करने के बाद आप अब तक तो 200 शब्द-लेखन कौशल में माहिर हो ही चुके होंगे ! आपका पहला टार्गेट ऑडियन्स है, स्कूल के छात्र ( यानी 7/8-13 वर्ष की आयु के बच्चे) और दूसरा टार्गेट ऑडियन्स है, 25 वर्ष की आयु से अधिक के लोग। आप इसे लिखते समय सबसे पहले भाषा का ध्यान रखेंगे और उसके बाद उसमें प्रकट होते अथवा किए जाने वाले मूल्यों की ओर आपका ध्यान होना चाहिए।
इस दो प्रकार के लेखन को करते समय आप अपनी लेखन प्रक्रिया का भी निरीक्षण अवश्य करें तथा बाद में उसका विश्लेषण करें। पर मन-ही-मन। इस प्रक्रिया-विश्लेषण-निरीक्षण के फलस्वरूप आपका अगला लेखन अधिक सरल एवं बेहतर होगा।
      अब हम यूनिट -4 की बात करेंगेजिस तरह यूनिट 3 में निबंधात्मक लेखन के विषय में हमने जानकारी ली, उसी तरह यूनिट-4 में कथात्मक लेखन की हमें जानकारी होनी चाहिए। इस यूनिट में आपको चार मुद्दे पढ़ने हैं और कहानी भी लिखनी है। कहानी की भाषा, भाषा की सर्जनात्मकता, विभिन्न प्रकार की कहानियों में प्रयुक्त भाषा पाठ, कहानी लेखन । यहाँ आप देख सकते हैं कि ज़ोर फिर एक बार भाषा पर है। आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि जहाँ तक निबंध का प्रश्न है यह तो समझ में आ गया कि कथा होती नहीं है, अतः भाषा और विचारों पर अधिक बल दिया जाता है। पर कहानी में तो कथा तत्व, पात्र, देशकाल, वातावरण सभी कुछ होता है। फिर इन तत्वों को छोड़ कर हम केवल भाषा पर ही क्यों केन्द्रित हैं ? आपने यह भी देखा होगा कि इसमें भाषा पर दो यूनिट हैं। एक केवल भाषा और एक भाषा की सर्जनात्मकता। भाषा की सर्जनात्मकता, कहानी में उसके वर्णन, पात्र तथा कथा-विकास, मनोमंथन देशकाल आदि से संबंद्ध होती है। जैसे आपने प्रसाद की कहानियाँ पढ़ी होंगी। उन कहानियों में देश काल के वर्णन में ही, प्रकृति के वर्णन में ही पात्र की मानसिकता और कहानी का विकास दिखाई पड़ता है। इकाई एक में कहानी की भाषा पर आपको सोचना है। अब कहानी की भाषा निबंध की भाषा की तरह तो नहीं होगी। उसमें न व्याकरण की व्यवस्था की बाध्यता है न ही मानक भाषा के प्रयोग का आग्रह। आप की कहानी का जो परिवेश होगा वैसी ही भाषा होगी। प्रसाद की कहानियों के साथ-साथ आपने प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ीं हैं और निर्मल वर्मा की भी पढ़ी हैं। तीनों की एक-एक कहानी लें और देखें की भाषा का पोत क्या है। पोत शब्द का अर्थ है वस्त्र जिस तरह स्पर्श के बाद हाथ को महसूस होता है। तो भाषा का पोत यानी कहानी पढ़ते हुए उसकी भाषा का कैसा असर आपके मन पर पड़ता है। अगर कोई पाठ कर रहा है तो मन के साथ-साथ कानों पर किस तरह का असर पड़ रहा है। जैसे ही भाषा का यह स्वरूप और भाषा की बारीकियों का आपको अंदाज़ा होता जाएगा आपकी समझ में यह आ जाएगा कि कहानी में किस तरह की भाषा होती है। इसमें भी आप निबंध से उसकी भिन्नता को पहचानें, कविता-(लंबी, कथात्मक कविता से उसकी भिन्नता को जानें और कहानी की भाषा की विशेषताएं जाने। असाध्य वीणा अज्ञेय की लंबी कविता है जिसमें कथात्मकता का अंश है। आप को अगर इसे कहानी में लिखना होगी तो तुरंत आपकी भाषा बदल जाएगी। उसमें केशकंबली का, राजा का प्रजा का चरित्र आएगा। आरंभिक वर्णन देशकाल में चला जाएगा। वहाँ भाषा का अलग स्वरूप होगा। दूर क्यों जाते हो... आपने सेमिस्टर-1 में रवीन्द्रनाथ की कई कथात्मक कविताएं पढ़ी हैं। आपको अगर इन कथात्मक कविताओं की कहानियाँ लिखनी हैं तो ...... कर के देखिए।
      इसमें एक और बात जोड़िए। इन कविताओं के निबंधात्मक विवरण लिखें। यानी कविता की कहानी बनाएं और कविता का निबंधात्मक विवरण। भाषा के स्वरूप की भिन्नता का आपको पता चल जाएगा। आज के लिए इतना ही। बाक़ी चर्चा अगली पोस्ट में। 
  

Monday, 6 February 2012

समस्या और निराकरण (HIN507)



आपके मन में इस बीच अपने कोर्सेस पढ़ते हुए कई तरह के प्रश्न उठे होंगे। आपने इस संदर्भ में मुझसे चर्चा भी की है। सबसे पहले तो आप अब यह सोच रहे होंगे कि इन नए प्रकार के कोर्सेस पढ़ तो रहे हैं, पर अब परीक्षा में प्रश्न किस तरह के आएंगे ? प्रश्न किस तरह के आ सकते हैं, यह सोचने की अपेक्षा आप इस बात को यों समझिए कि इन सर्जनात्मक कोर्सेस में प्रश्न किस तरह के बन सकते हैं। मुझे मालूम है कि इस के बाद आपका प्रश्न होगा कि इसमें जो सामग्री हमें मिली है, वह क्या काफ़ी है ?
अब इन दोनों प्रश्नों पर हम क्रमशः विचार  करेंगे।
आज हम बात कोर्स  507 HIN से आरंभ करेंगे।
इस कोर्स में हम जो यूनिट्स पढ़ रहे हैं, उन्हें हम तीन हिस्सों में बाँट सकते हैं। प्रायोगिक भाषा विज्ञान, सर्जनात्मक लेखन एवं सर्जनात्मक लेखन के आधार उपकरण। सबसे पहले आप यूनिट 3 एवं 4 को ही लें। ये यूनिट निबंध लेखन एवं कहानी लेखन से संबंधित हैं। आप यह भी याद रखें कि इस कोर्स के माध्यम से किसी को भी साहित्यकार बनाया नहीं जा सकता। लेकिन लेखन का कौशल सिखाया जा सकता है। यह लेखन- कौशल आपको आगे चल कर स्क्रिप्ट लेखन एवं अख़बारी लेखन करने में उपयोगी हो सकता है। आपने पहले सेमिस्टर में कोर्स 406 में निबंध पढ़े हैं। इसके अलावा आपने बी.ए में भी निबंध पढ़े होंगे। अब अगर आप ध्यान से देखेंगे तो यूनिट 3 में चार मुद्दे हैं निबंध की भाषा, निबंध की शैली, विभिन्न प्रकार के निबंधों में प्रयुक्त भाषा का पाठ तथा निबंध लेखन।
अब आपको अपने व्यावसायिक काम के लिए निबंध लिखना है। या निबंधात्मक लेखन करना है। निबंधात्मक लेखन से हमारा क्या मतलब है ? तो जब तक आप इसके तत्वों को लेखन के स्तर पर नहीं जानेंगे, तब तक आप इसे(निबंध को) लिख नहीं सकेंगे। इसका मतलब यह है कि इस कोर्स में आपको ये तत्व वास्तविक लेखन के स्तर पर समझने हैं। तो निबंध की भाषा कैसी होनी चाहिए इसकी आपको जानकारी होनी चाहिए। निबंध की भाषा का चुनाव आप अपने विषय के अनुरूप ही करेंगे। उसी के अनुरूप आपकी शैली भी होगी, अतः आप वैसी ही शैली चुनेंगे। आपने जो भी निबंध पढ़े हैं, फिर सेमिस्टर एक में आठ निबंध तो आप पढ़ चुके हैं, उन्हीं को ध्यान में रखते हुए इस बात को आप समझ सकते हैं। किस तरह काका कालेलकर की भाषा गुणाकर मुळे की भाषा से अलग है, उसके क्या  कारण हैं, इस बात को आप समझ ही सकते हैं- विषय भी भिन्न है और लेखक का व्यक्तित्व भी अलग है आदि। या फिर व्यंग्य-शैली होते हुए भी किस तरह प्रतापनारायण मिश्र की शैली और बालकृष्ण भट्ट की शैली अलग है। अथवा तो नारी और स्त्री नामक निबंध लिखने वाले एक ही रचनाकार होने के बावजूद शैली तथा भाषा में क्या अंतर है। आप इन मुद्दों पर सोचेंगे तो अपने आप आपको अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे। कौन से प्रश्न ? किस तरह के प्रश्न पूछे जाएंगे इत्यादि। सेमिस्टर एक में पढ़े सभी निबंधों में भाषा के अलग-अलग पाठ आपको दिखाई देंगे। अंत में आपको स्वयं निबंध लिखना है।
तो पाँचवां यूनिट तो आपके सुनियोजित रचनाकर्म से संबंधित है। लेकिन इस यूनिट के करने के लिए पहले चार यूनिट आपको आने होंगे। निबंध की भाषा नामक पहले यूनिट में आपको इन बातों को ध्यान में रखना है। इसमें आप निबंध की भाषा किस तरह कथात्मक गद्य साहित्य (कहानी, उपन्यास) से अलग है, निबंध में, भाषा का क्या स्थान होता है। निबंध लेखक को भाषा पर अधिकार क्यों होना चाहिए, अगर गद्य कवियों की कसोटी है तो निबंध क्यों गद्यकारों की कसौटी है- इस प्रश्न पर आपको सोचना होगा। तत्सम प्रधान भाषा कैसी होती है, बोलचाल की भाषा क्या निबंध में होती है ? निबंध अगर मुख्यतः विचारों को वहन करता है तो क्या बोलचाल की भाषा का उसमें प्रयोग हो सकता है ? तो किस तरह के शब्दों का उसमें अधिक प्रयोग होगा। तत्सम, तद्भव या फिर देशज? आप निबंधों को पढ़िए और देखिए। किस तरह की शैली को साथ किस तरह के शब्दों का प्रयोग होगा। अगर आपकी शैली सामासिक होती तो शब्द किस प्रकार के होंगे? क्या आप तब तद्भव शब्दों का प्रयोग कर सकेंगे? निश्चित रूप से नहीं। आप द्विवेदीजी (हजारीप्रसाद) के निबंध पढ़िए, आपकी समझ में आ जाएगा। तो यही सारे प्रश्न हैं..... समझ गए आप।
उसी तरह निबंध में वर्णनात्मक, विवरणात्मक, सामासिक, व्यास आदि शैलियों का प्रयोग किया जाता है। अब आपको एक निबंध लिखना है, यात्रा के विषय में, तो ज़ाहिर है आप वर्णनात्मक शैली का ही प्रयोग करेंगे। पर आपको एक घटना के विषय में लिखना है तो आप विवरणात्मक शैली का ही प्रयोग करेंगे। लेकिन इसमें भी कई पेंच हैं। आपका स्वभाव, आपका विषय आपकी भाषा और शैली को तय करेंगे। लेकिन अगर कोई विषय दे दिया गया हो तो क्या करेंगे आप ? अगर आप व्यावसायिक कामों के लिए लिख रहे हैं तो आपका टार्गेट ऑडियंस, यानी कि आप किसके लिए लिख रहे हैं, यह भी तय करेगा कि आपकी भाषा कैसी हो। यही हमें सीखना भी है। जैसे अगर आपको  कंब रामायण का परिचय देता हुआ एक निबंधात्मक विवरण देना चाहते हों, तो आपका टार्गेट ऑडियंस जो होगा उसके अनुसार आपको अपनी भाषा को स्वरूप देना होगा। अगर आपका टार्गेट ऑडियंस रिसर्च स्कॉलर अथवा स्नातकोत्तर विद्यार्थी है तो आपकी भाषा और शैली अलग होगी और अगर वह स्कूल का छात्र हो अथवा आम जनता हो तो आपकी भाषा शैली अलग हो जाएगी।
इस कोर्स में हमें असल में इन्हीं मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अध्ययन करना है। अतः इसमें जिन प्रश्नों के उत्तर आपको देने होंगे उसमें विषय को लेकर आपकी समझ ज़्यादा काम करेगी।
आपको इस बात को समझ लेना होगा कि इस स्पर्द्धा के युग में अब कहने भर को डिग्रीधारी बनने से काम नहीं चलेगा, उसमें भी हिन्दी के छात्रों को। इस बात की गांठ  बांध लीजिए कि अगर हम साहित्य के विद्यार्थी सही भाषा में अपने विचारों को व्यक्त नहीं कर सकेंगे तो हमें कोई काम नहीं मिलेगा। इन कार्सेस से हम इसी बात को समझ रहे हैं और अपने को तैयार कर रहे हैं। हमें केवल अन्य भाषा तथा साहित्य के विद्यार्थियों से ही स्पर्द्धा नहीं करनी अपितु अन्य विषयों के विद्यार्थियों के बीच अपनी साख़ बनानी है। हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ने वाला विद्यार्थी किसी भी अन्य विषय पढ़ने वाले विद्यार्थी से कमतर नहीं है- यह तभी आप साबित कर सकेंगे जब आप अपने ढंग से सोच सकेंगे और सोचे हुए को अभिव्यक्त कर सकेंगे। हमारा यह नया पाठ्यक्रम इसी के प्रति आपको अभिमुख करने के लिए और तैयार होने के उपकरण आपको दे रहा है।
यूनिट चार के बारे में कल बात करेंगे। आज के यूनिट के  संदर्भ में आपको कुछ पूछना है तो आपके प्रश्नों का स्वागत है।
  

Thursday, 19 January 2012

आपने देखा होगा कि पिछली तीन पोस्टों में शोध-प्रविधि में कुल 46 पावर पॉइन्ट की स्लाईड्स पोस्ट की है। हरेक में नीचे स्लाईड का नंबर दिया गया है। आप जब इनको डाउनलोड करें और इनका प्रिंट-आउट लें और क्रमबद्ध  कर लें। नेट की मुश्किल हो गई थी अतः इसे उस तरह क्रमबद्ध नहीं किया जा सका जिस तरह पहले का पावर पॉइन्ट रखा था। इन स्लाईड्स को अगर आप देखें तो आपकी समझ में आ जाएगा कि इसमें प्रश्न किस तरह पूछे जा सकते हैं। आप अपनी प्रतिक्रिया भी इस पर दें।







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Wednesday, 18 January 2012

कल आपने शोध-प्रविधि पर, जो वर्ग में पढ़ा, उससे संबंधित पावर पॉइंट की  स्लाईड्स मैंने ब्लॉग पर रखीं हैं। आज बाकी की रख रही हूँ। आज हमने वर्ग में इन स्लाईड्स पर बात की थी। आप इन सभी स्लाईड्स को देखें और जिन मुद्दों को लेकर अभी भी आपके मन में संदेह है,  आप उनकी चर्चा क्लास में कर सकते हैं। 

Tuesday, 17 January 2012

अहमदाबाद मिरर को धन्यवाद कि हमारे इस प्रयास को अपने अख़बार में स्थान दिया। इसके पहले राजस्थान पत्रिका ने भी इस विषय में एक समाचार दिया था। आपकी जानकारी के लिए मिरर के समाचार प्रस्तुत हैं

Prof sets up blog for PG Hindi students

To make it easier for students unable to attend classes, Dr Ranjana Argade has created a blog where all the course material on the subject and reference material is made available
Yogesh Avasthi
Posted On Wednesday, January 18, 2012 at 02:42:04 AM

Dr Ranjana Argade (right) has set up drranjanaargade.blogspot.com which is interactive and all queries will be answered by her

A professor of Hindi has made it possible for external and other students who are unable to attend regular classes to avail of all material related to post-graduate studies on the subject.

With limited number of seats at the School of Languages, Gujarat University, students of rural areas who are unable to get into the school need not despair now. Dr Ranjana Argade, head of Department of Hindi, at the university has found a way to help these students out.

To make it easier for the students to grasp the subject better, get access to coursework and study material, Dr Argade has set up the blog. With the semester system bringing in a lot more project work and assignments, students find it difficult to cope with the syllabus. To help them out, the professor has set up drranjanaargade.blogspot.com which is interactive and anybody posting any queries regarding the subject will be answered by the professor.

Students have to look up a lot of reference material during projects, so that they get good credits. The blog is linked to sites that have reference material, which the students can easily access. External students from Santrampur, Dahod and other areas who are not well-versed with the language visit the university during seminars and conferences. They have a lot of queries on the subject. Their questions and more have been answered by the professor on the blog.

Dr Argade said, “Students get authentic study material and one that will provide the students with the right answers. The purpose is to create a two-way communication with the students who are stuck at some point and are seeking answers, which they can easily avail of online.”

This is very useful during examination time when students are preparing under pressure. Students also have a lot of confusion over the semester system. This blog is to clear their doubts, she said. “How to write in an exam and get maximum marks and get answers to their problems is the purpose.”

In the fourth semester, adverts have to be created for project work. How to create one is taught. Some examples have also been put on the blog, besides links to poetry recitation by litterateurs on Youtube. “We are also planning recording of our lectures and posting it on the blog,” the professor said.




जिन खोजा तिन पाइयां शीघ्र ही एक नई पहल करने जा रहा है। आप सभी इस पहल में शामिल होने के लिए निमंत्रित हैं। जैसे मैंने समझा-इस शीर्षक के अन्तर्गत लिखने के लिए  आपको निमंत्रण है। कोई नई किताब जो आपने पढ़ी हो और आप उसे किन कारणों से पसंद करते हैं तथा औरों को पढ़ने के लिए ज़रूरी समझते हैं- यह आपको उसमें लिखना है। नई किताबें हों अथवा कोई चर्चित, अचर्चित पुरानी किताब भी हो तो आप उसके विषय में लिख सकते हैं। यह सच है कि कई बार किताबें हमसे बहुत देर से बोलती हैं। किताबें आपसे कब बोलने लगें ,इसका कोई तय नहीं होता। पर जब आप सुनने के लिए तैयार होते हैं तब किताबें आपसे बोलती हैं। जब वे बोलें और आप सुनें तो हमें भी इसकी जानकारी दीजिए। 
                                   तो इस नए अभियान में आपकी सहभागिता हमें प्रीतिकर लगेगी। 
इसके पहले की पोस्ट में आपने कुछ सुंदर चित्र देखे होंगे। 
ये चित्र डॉ.कृष्णा गोस्वामी के हैं जो हमारे विभाग में थीं। 
अब वे निवृत्त हो गयी हैं। 
विश्वविद्यालय ने जब सभी अध्यापकों को  संगणक दिए 
तो डॉ कृष्णा गोस्वामी ने अपनी चित्रकला  को
 एक नए माध्यम के द्वारा प्रस्तुत किया 
और 
विभाग को ये चित्र भेंट किए। 
उनका धन्यवाद।

Saturday, 14 January 2012

डॉ.अम्बाशंकर नागरजी नहीं रहे। यह हम सभी जानते हैं कि आएं हैं तो जाएंगे.. राजा रंक फकीर....। परन्तु फिर भी जिनके साथ हमारा अथवा जिनका व्यापक मानव जीवन के साथ संबंध रहा है उनके जाने पर हमें अवश्य दुःख होता है। वह अगर हमारा आत्मीय अथवा स्वजन हो, तो, दुःख संभले नहीं संभलता।


       आज यह समाचार मिला तो मैं नागरजी को याद करते हुए सोच रही थी कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन के अंतिम समय तक  सक्रीयता को बनाए रखा उसके बारे में मुझे, एक विद्यार्थिनी अथवा हिन्दी से जुड़े एक सामान्य व्यक्ति के लिए, नागरजी के जाने का क्या अर्थ हो सकता है। नागरजी ने हमें एम.ए में पढ़ाया था, इस नाते मैं उनकी विद्यार्थिनी तो थी ही। फिर बाद में, मैं इस पढ़ने-पढ़ाने के व्यवसाय में आई तो उनके साथ मेरा एक अकादमिक संबंध भी बना। अतः उनके जाने को मुझे बहुत भावनात्मक रूप से नहीं लेने की अपेक्षा एक तटस्थ एवं वस्तुगत दृष्टि से स्वीकार करना चाहिए।


       बहुत ही तटस्थ और व्यापक रूप से देखूं तो नागरजी का जाना एक ऐसे व्यक्ति का जाना कहा जाएगा जिसका संबंध लोक एवं अकादमिक व्यवहार के उस सलीके से है, जो अब नदारद-सा ही, कहा जा सकता है। हमारा पूरा दौर बे-तमीज़ वागाडंबर का दौर है। नागरजी से मिलने वाला कोई भी व्यक्ति यह नहीं कहेगा कि उन्होंने  कभी भी किसी के साथ अनौचित्यपूर्ण वाणी में बात की हो। सामने वाले की असहमति तथा बे-तमीज़ी का जवाब भी उन्होंने बड़ी सौहार्द्रता तथा तमीज़ से दिया है, ऐसा दावा अगर मैं करती हूँ तो यह निश्चय ही अतिश्योक्ति या अतिरंजित नहीं कहा जाएगा। लेकिन यह भी सही है कि वे वही करते रहे जिसे कहते थे, मानते थे और जिसे अपनी दृष्टि से वे योग्य और ज़रूरी समझते रहे थे। अपने मत में दृढ थे।
       मूलतः राजस्थान के निवासी डॉ नागर जी का कर्म-स्थान तो गुजरात ही रहा।


      डॉ. नागरजी का हिन्दी साहित्य को सबसे बड़ा योगदान यही रहा कि उन्होंने गुजरात में लिखे जाने वाले हिन्दी साहित्य, ख़ास कर मध्यकालीन साहित्य विषयक खोज की, इस तरह की क्षेत्रीय शोध को बढ़ावा दिया, इससे संबंधित कृतियों का  संपादन किया तथा यहाँ रहते हुए वर्तमान समय में लिखने वाले रचनाकारों को लोकतांत्रिक सुविधा मुहैया कराने में भी एक भूमिका निभाई।  गुजरात में लिखे जाने वाले हिन्दी साहित्य को नागरजी की यह बहुत बड़ी देन है।आज यू.जी..सी प्रांतीय हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम बनाने को महत्व देती है। गुजरात में यह सरलता से संभव इसलिए हो सका कि नागरजी तथा उनके साथियों एवं समकालीनों ने इस विषय में नींव का काम किया,  इसमें कोई संदेह नहीं है। उन्हें गुजरात में हिन्दी प्रसार एवं प्रचार तथा रचनात्मक कार्यों के लिए  के लिए अनेक पुरस्कार तथा सम्मान मिले, जिसके वे हक़दार थे।


      पर इन सम्मानों से परे नागरजी का एक और व्यक्तित्व है , जो एक प्रभावशाली  शिक्षक का माना जा सकता है। उनकी छबि, युनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर की एक बड़े प्रभावशाली और प्रीतिकर चित्र के रूप में याद की जाएगी। उनका डील-डौल, उनका व्यक्तित्व तो प्रभावशाली था ही, साथ ही वे उस पीढ़ी के शिक्षक थे जो अपने व्यवसाय को ले कर बहुत गंभीर थे। अपने समय की व्यावसायिक राजनीति से वे अछूते नहीं थे, वे उसका एक हिस्सा थे , परन्तु उस राजनीति को बड़ी कुशलता से वहन करने के सलीके को वे जानते थे, शायद तभी वे एक सफल अध्यापक भी थे।


     मध्यकाल के विशेषज्ञ, नागरजी संगीत और कला के भी मर्मज्ञ थे। गुजरात का हिन्दी जगत उनके इस योगदान को सदैव याद रखेगा।


     भाषा साहित्य भवन के हिन्दी विभाग के वे प्रथम अध्यापक एवं अध्यक्ष थे। अपने कार्यकाल के दौरान विभाग में अनेक-विध कार्यक्रमों के द्वारा एक विद्याकीय वातावरण आपने निर्मित किया, यह विभाग के लिए स्मरणीय बात रहेगी।


      विभाग उनक प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।


Friday, 6 January 2012

Thursday, 29 December 2011

HN508शोध-प्रविधि




A-Objectives

1- To teach how to systemize knowledge.

B-Outcome of the Course

1- Develop scientific attitude

UNITS

1) शोध की परिभाषा एवं महत्व

2) शोध के प्रकार

3) शोध के उपकरण

a) पुस्तकालय,  b)अन्तर्जाल

4) शोध-प्रविधि

5) शोध-पत्र लेखन - प्रक्रिया एवं प्रविधि


संदर्भ पुस्तकें

1- नवीन शोध-विज्ञान, डॉ तिलक सिंह, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली

2- साहित्यिक अनुसंधान के आयाम, डॉ. रवीन्द्रकुमार जैन, नेश्नल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली

3- शोध स्वरूप एवं मानक व्यावहारिक कार्यविधि, बैजनाथ सिंहल, मैकमिलन कंपनी, दिल्ली

4- अनुसंधान- स्वरूप एवं प्रविधि, डॉ. रामगोपाल शर्मा दिनेश, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर







HN508शोध-प्रविधि




A-Objectives

1- To teach how to systemize knowledge.

B-Outcome of the Course

1- Develop scientific attitude

UNITS

1) शोध की परिभाषा एवं महत्व

2) शोध के प्रकार

3) शोध के उपकरण

a) पुस्तकालय,  b)अन्तर्जाल

4) शोध-प्रविधि

5) शोध-पत्र लेखन - प्रक्रिया एवं प्रविधि


संदर्भ पुस्तकें

1- नवीन शोध-विज्ञान, डॉ तिलक सिंह, प्रकाशन संस्थान, दिल्ली

2- साहित्यिक अनुसंधान के आयाम, डॉ. रवीन्द्रकुमार जैन, नेश्नल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली

3- शोध स्वरूप एवं मानक व्यावहारिक कार्यविधि, बैजनाथ सिंहल, मैकमिलन कंपनी, दिल्ली

4- अनुसंधान- स्वरूप एवं प्रविधि, डॉ. रामगोपाल शर्मा दिनेश, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर