जिन खोजा तिन पाइयां

इस ब्लॉग में विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं के उत्तर देने की कोशिश की जाएगी। हिन्दी साहित्य से जुड़े कोर्सेस पर यहाँ टिप्पणियाँ होंगी,चर्चा हो सकेगी।

Thursday, 22 September 2011

हिन्दी सप्ताह में भवन में इस वर्ष दो कार्यक्रम हुए। 14 को डॉ. किशोर वासवानीजी ने हिन्दी उद्योग और दृश्य-श्रव्य की भाषा पर बड़ा मननीय व्याख्यान दिया। विद्यार्थी उनके इस व्याख्यान से लाभान्वित हुए। 19-9 को भवन के विद्यार्थियों ने हिन्दी से जुडा एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। यह सप्ताह भवन के विद्यार्थियों के लिए बड़ा उत्साहवर्द्धक रहा। आज आदिपुर कॉलेज के प्राचार्य डॉ सुशील धर्माणी ने दृश्य-श्राव्य माध्यम तथा मल्टी मीडिया पर बहुत ही सारगर्भित प्रस्तुति दी। विद्यार्थी उनके व्याख्यान से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्हें इस विषय की समझ बहुत विस्तार तथा गहराई से मिली। कल सुबह 11 बजे एक्सेल की साहित्यिक शोध में उपयोगिता पर भाषा भवन के निदेश डॉ वसंतकुमार भट्टजी की व्याख्यान- प्रस्तुति होगी। दोपहर 2.30 बजे से ब्लॉग निर्माण पर श्री शिवांग भावसार की व्याख्यान प्रस्तुति रहेगी।

इस नए प्रकार के पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों को बहुत लाभ हो रहा है। यह विभाग के लिए प्रसन्नता की बात है।

Sunday, 28 August 2011

हिन्दी विभाग की नई पहल


हमारे लिए यह एक प्रसन्नता तथा ज़िम्मेदारी का काम है कि युनिवर्सिटी ने हमारे सेमीनार के प्रस्ताव को स्वीकार किया। हमारा विभाग २३-२४ दिसंबर २०११ को एक राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन कर रहा है। इसमें हिस्सा लेने के लिए तथा उसके विषय में में आपको जानकारी मिले इस हेतु हमने एक पोस्ट डाली है। इस ब्लॉग पर आप जहाँ सेमीनार फॉर्म लिखा हुआ देखेंगे वहाँ क्लिक करेंगे तो सेमीनार की जानकारी तथा फॉर्म आप डाउनलोड कर सकते हैं। मुझो विश्वास है कि आप इसे देखेंगे और अपनी हिस्सेदारी दर्ज़ करवाएंगे।

राष्ट्रीय संगोष्ठी

राष्ट्रीय संगोष्ठी फॉर्म

राष्ट्रीय संगोष्ठी

https://docs.google.com/viewer?a=v&pid=explorer&chrome=true&srcid=0B2o4qH5sVXmHNDMwMmE1NWUtMzE4NC00ODc0LWI0NjctMjczZDk0OWMzOTQ3&hl=en

Friday, 19 August 2011

अपरिचित मगर उपयोगी

कोर्स ५०३ में आप लोगों को काफी दिक्कतें आ रही होंगी। जैसा कि अरुणा माली ने अपनी दिक्कतें बताईं। परन्तु हिन्दी कंप्यूटिंग वाले यूनिट को छोड़ दें तो इस पर बहुत सामग्री मिलती है। आपके अध्यापक भी यह सामग्री आपको मुहैया करा सकते हैं। जहाँ तक ब्लॉग वाला कंपोनंट तथा एक्सेल वाला कंपोनंट है जब हम अपने यहाँ इस पर कोई विशेष व्याख्यान रखेंगे तब आपको ब्लॉग पर सूचना मिल जाएगी। इस के अलावा आप अपने अध्यापकों से कह सककते हैं कि वे कॉलेज में इसके लिए विशेष व्याख्यान का आयोजन करें। इस विषय के विशेषज्ञ यहीं अहमदाबाद में हैं। यह कोर्स अपरिचित अवश्य है पर आज के समय को देखते हुए बहुत ही उपयोगी है।

Sunday, 14 August 2011



मेरे लिए यह बहुत ख़ुशी की बात है कि आपने विज्ञापन बनाने में रुचि ली। भाषा भवन के हिन्दी विभाग की छात्रा हिना कापडिया ने जूठन पर एक विज्ञापन बनाया। यह सामाजिक जागृति से जुड़ा विज्ञापन है। जूठन दलितों के प्रति अत्याचार और उनके संघर्ष को उद्घटित करती आत्मकथा है। इसमें निहित चुनौति का स्वर विज्ञापन में आया है। सवर्णों के दलितों के प्रति व्यवहार को हिना ने एक चित्र के द्वारा स्पष्ट किया है।


बधायी हिना कि तुम अब इस फॉर्मेट में काम कर रही हो।


इस निज्ञापन का विस्तृत आकार ब्लॉग में नीचे की ओर दिया है। आप स्क्रॉल करेंगे तो उस विज्ञापन को देख पाएँगे।


पुनः बधायी

Thursday, 4 August 2011

Course HIN 506S


उपरोक्त कोर्स में यूनिट क्रमांक-5 में आपको बिम्ब अथवा अलंकार प्रधान रचना की समीक्षा करनी है। आपने अब तक कोई न कोई कविता तो ढूँढ ही ली होगी। आपको सबसे पहले कविता के उन अंशों को रेखांकित करना है जो चित्रात्मक रूप में सौन्दर्य प्रधान हों। यानी आप जब इस प्रक्रिया में उतरेंगे तो बिम्बों, अलंकारों एवं प्रतीकों से साक्षात्कार करेंगे। अब आपको यह पता करना है कि आपने जो ढूँढा वह बिम्ब है , प्रतीक है अथवा अलंकार। अगर वह सौन्दर्यप्रद चित्र उपमान एवं उपमेय को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से भी प्रकट करता है तब तो वह अलंकार है। जैसे नील परिधान बीच सुकुमार खिल रहा मृदुल अधखुला अंग/ खिला हो ज्यों बिजली का फूल मेघवन बीच गुलाबी रंग। एक तो ज्यों के कारण और दूसरे नील परिधान पहने श्रद्धा की वर्णन है- तो मेधों का वन=नील परिधान, गुलाबी रंग का बिजली का फूल=श्रद्धा की दिपदिपाती खिली खिली गुलाबी त्वचा । श्रद्धा उपमेय है तो वह जैसी लगती है वह वर्णन उपमान है। अब इसके सौन्दर्य को आप और बारीकी से विश्लेषित कर सकते हैं। उसी तरह एक पीली शाम कविता में आप देखिए तुम्हारा मुख-कमल कृश म्लान हारा –सा ( कि मैं हूँ वह मौन दर्पण में तुम्हारे कहीं) मुख-कमल में तो स्पष्ट रूपक अलंकार है ही। पर कि मैं हूँ वह मौन दर्पण में तुम्हारे कहीं... में अपन्हुति अलंकार भी है। अथवा विजन-वन वल्लरी पर सोती थी सुहाग भरी / स्नेह स्वप्न मग्न ... पढ़ते ही हमें मानवीकरण अलंकार की प्रतीति होती है क्योंकि उस पूरी कविता में जूही की कली को एक युवती के रूप में बताया गया है। श्रद्धा के वर्णन में प्रयुक्त अलंकार तथा जूही की कली के मानवीकरण को पढ़ते हुए उनका चित्र तो हमारे सामने आता ही है परन्तु सौन्दर्य का बोध हमें अलंकारों के माध्यम से होता है। हमारा ध्यान उपमानों तथा उपमेयों की तरफ़ जाता है। जबकि दिवस का अवसान समीप था गगन था कुछ लोहित हो चला/ तरु शिखा पर थी अब राजति/ कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा – में शाम का सुंदर चित्र अंकित है। इसमें उपमान-उपमेय का कोई मुद्दा नहीं है। इसी तरह की और भी कई कविताएं हैं जहाँ विशुद्ध प्रकृति वर्णन है। ऐसे अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं।
परन्तु जब आप ऊषा जैसी कविताओं से साक्षात्कार करते हैं, तो सौन्दर्य बोध का अनुभव अलग होता है। यह कविता आपने पिछले सेमिस्टर में पढ़ी है। प्रता नभ था। पहला वाक्य एक स्टेटमैंट हैं। फिर बहुत नीला शंख जैसे भोर का नभ। यह बात ऊषा के वर्णन के अन्तर्गत है। भोर का नभ नीले शंख के समान है। आप कहेंगे कि यह भी तो उपमान और उपमेय ही है। नीला शंख उपमान और भोर का नभ उपमेय है। बिल्कुल सही । उसके बाद राख से लीपा हुआ चौका(अभी गीला पड़ा है) / बहुत काली सिल ज़रा-से लाल केसर से कि जैसे धुल गयी हो/ स्लेट पर या लाल खडिया चाक मल दी हो किसी ने/ नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो.....तक आते-आते तो हम भूल जाते हैं कि यह भोर के नभ की बात है। एक के बाद एक आते चित्र हमारी इंद्रियों से सौन्दर्य की अनुभूति करते हुए हमें प्रभावित करते हुए, हम पर जादू डालते हैं। आप कहेंगे कि यह तो कवि का मायाजाल है ( हमारी रोज़-बरोज़ की भाषा में इसे हम चीटिंग भी कहेंगे) पर फिर कवि स्वयं इस ऊषा का जादू तोड़ते हुए कहते हैं कि सूर्योदय हो रहा है। इस कविता में सौन्दर्यबोध के लिए उपमान उपमेय से अधिक इंद्रीयगत संवेदना प्रमुख हो जाती है। जब कभी सौन्दर्य की अनुभूति उपमान-उपमेय का संबल छोड़ कर अपने आप बिम्बित होते हुए इन्द्रियानुभूत होती है, तब वह बिम्ब का स्वरूप धारण करता है। कई बार कविता बिना किसी उपमान उपमेय से अथवा वर्णन से इस तरह शुरु होती है
एक नीला दरिया बरस रहा है और बहुत चौड़ी हवाएं हैं.....इस पंक्ति को पढ़ते ही हमारी समझ में आता है कि अब न तो अलंकार , न प्रतीक न चित्र.. कुछ भी तो सौन्दर्य की प्रतीति नहीं करा रहे। दिवस का अवसान समीप था / गगन था कुछ लोहित हो चला में शुद्ध चित्रात्मकता है। दिवसावसान का समय/मेघमय आसमान से उतर रही वह संध्या सुंदरी परी-सी में मानवीकरण है पर यहाँ नीले दरिये के बरसने और हवाओं के चौड़े होने को आपको अपनी इंद्रियों से महसूस करना पड़ता है। आप एक सुंदर-सी काव्यात्मक अनुभूति से जकड़ लिए जाते हैं जो आगे की पंक्तियों में आपको और अधिक आकर्षक उलझाव में डालती हैं जब कवि कहता है- मक़ानात हैं मैदान/ किस तरह उबड़-खाबड. । हवा तो त्वचा पर महसूस होती है जिसे कवि आँखों से दिखाना चाहता है जैसे अपनी ही एक और कविता में कवि कहता है- हवा –सी पतली ...कि आर-पार देख लो...। कवि इंद्रिय व्यत्यय द्वारा चित्र खड़ा करता है। मैदान आँखों से दिखते हैं जिसे कवि त्वचा से – स्पर्श से महसूस करवा रहे हैं ........ ऊबड़-खाबड़।
बिम्ब इसी तरह अलंकारों वर्णनों तथा प्रतीकों से अलग होते हैं।
आप भी कुछ कविताओं के माध्यम से देखें कि आपको यह कितना समझ में आ सका।

Wednesday, 3 August 2011

दलित लेखन- चर्चा

504EA
ओम्प्रकाश वाल्मिकी की रचना जूठन हमारे पाठ्यक्रम में है। सेमिस्टर दो में उसे हमने उसके बारे में इतिहास वाले कोर्स के अन्तर्गत पढ़ा था। तब एक विवाद भी जगा था कि जूठन तो आत्मकथा है फिर उसे उपन्यास क्यों कहा गया। उसके संबंध में एक पोस्ट मैंने लिखी थी। उसमें मैंने विचारों को आमंत्रित किया था परन्तु किसी ने अपने विचारों को विनिमय के लिए प्रस्तुत नहीं किया था। ज़ाहिर है कि इस वर्ष जिन केन्द्रों मंव दलित लेखन विकल्प के रूप में चुना गया है वहाँ यह बात फिर उठेगी ही। अर्थात् एक वर्ष किसी कृति को हम उपन्यास की केटेगरी में पढें और दूसरे वर्ष उसे हम एक आत्मकथा के रूप में पढें। अतः इस संबंध में कुछ कहना मुझे ज़रूरी लगता है।
इस दौर में सहित्यिक विधाओं का परस्पर गड्ड मड्ड हो जाना साहित्यिक परिदृश्य का एक लक्षण भी है। जब हम किसी कृति को उपन्यास के रूप में पहचानते हैं तब हमारी दृष्टि तथा जब उसे अन्य स्वरूप में पहचानते हैं तो हमारी दृष्टि भिन्न प्रकार की होती है। कृति को उसके लक्षणों से ही पहचाना जाता है। लेकिन जब लक्षणों में उतनी चुस्ती नही रह गयी है तब इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं।
अगर हम सीध-सीधे मुख्य मुद्दे पर आएं तो –
1- जूठन को उपन्यास कहने से लेखक के द्वारा वर्णित पीड़ाएं वास्तविक होते हुए भी सृजित की कैटेगरी में आ सकती हैं। अतः लेखक द्वारा सवर्ण समाज के अत्याचारों तथा उसके परिणामस्वरूप दलित समाज द्वारा भोगी गयी यातनाएं वह चुभन या मार नहीं देती जो दलित साहित्य द्वारा अपेक्षित है। सवर्ण पाठक उसे पढ़ कर अपने आप को दोषी मानने की ज़लालत से बचा सकता है। उसके मन में करुणा आदि भाव उठेंगे , सहानुभूति भी जगेगी, वैसी ही जैसी अ-दलित रचनाकारों की दलित चरित्रों संबंधी रचनाओं के द्वारा जागती है। पाठक अपने को उस व्यवस्था का अंग तथा अंश न मानने के लिए स्वतंत्र हो जाता है जो दलितों के अत्याचार के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है। तब आत्मकथा का लेखक कृति का नायक बन जाता है। और नायक तो जगदीशचंद्र के उपन्यास धरती धन न अपना का भी था, जिसे हमने पूरी संवेदना के साथ पढ़ा था किन्तु हमने कहीं भी अपने आप को अत्याचारियों का वंशज नहीं माना था।
2- जूठन को आत्मकथा कह देने पर बात बदल जाती है। एक अदृश्य उँगली हमारी ओर भी उठी रहती है जो हमें चैन से जीने नहीं देती। हम व्यक्ति के रूप में चाहे ज़िम्मेदार न हों परन्तु अत्याचारी(?)समाज के एक भाग के रूप में हम अपने को भी दोषी समझने लगते हैं। दलित साहित्य का यही आशय भी है। अगर वह एक ओर दलित समाज में संघर्ष का माद्दा तथा अपने प्रति सदियों से हुए अत्याचारों के प्रति जागृति पैदा करना चाहता है तो दूसरी ओर सवर्ण समाज को भी कहीं न कहीं यह महसूस कराना चाहते हैं कि उनकी बदहाली के लिए वे भी ज़िम्मेदार हैं। भारतीय समाज का जो ढाँचा है उसे चाहे किसी क. ख. ग. ने नहीं बनाया, परन्तु जो भी कोई उस वर्ग से संबंधित है, वह इसीलिए ज़िम्मेदार है क्योंकि वह उस वर्ग का है। हमारी उस कहानी की तरह कि 'तूने नहीं तो तेरे पुरखों ने इस पानी को जूठा किया होगा'। दलित विमर्श में कहानी का शेर दलित है जबकि जीवन की मुख्यधारा में वह अपने को मेमना पाता है। सारा संघर्ष इस बात का ही है कि जीवन की मुख्यधारा में ही शेर बनना है।
इस पोस्ट में इतना ही। आगे भी हम दलित विमर्श तथा जूठन से जुडी बातों की चर्चा करेंगे। मुख्यतः इसके सौन्दर्यशास्त्र से संबंधित।

Friday, 29 July 2011

विज्ञापन क्र-1

नो मुटापा नो कॉलॉस्ट्रॉल नो टेंशन
अब आ गयी है
आपकी जेब की रेंज में
सुर्लेप बरतनों की पूरी रेंज
समय की बचत स्वास्थ्य
का लाभ

विज्ञापन क्र-2


भाभी मेरी जादूगरनी


पहला सीन

भाभी के साथ मज़ाक़ करने के मूड़ में देवर। बरतन में घी कम


है।


दूसरा सीन
देवर - भाभी मालपुए बनाओ न!

तीसरा सीन
भाभी घी ढूँढ़ती है। घी बहुत थोड़ा है ।


चौथा सीन
देवर का इरादा भाभी की समझ में आ जाता है

पाँचवाँ सीन
देवर भाभी की खिंचाई के लिए तत्पर होता है

छठा सीन
भाभी मालपुए बना कर ले कर आती है

सातवाँ सीन
देवर भौंचक्का, भाभी मुस्काराती है
सुर्लेप तवे का राज़ खोलती है

आठवाँ सीन
देवर कान पकड़ लेता है- भाभी मेरी जादूगरनी


नौवाँ सीन
पति मूछों पर ताव दे कर गर्व से मुस्कुराता है

(फैमिली फोटो- देवर, भाभी, पति, ससुर)
(ये दोनों विज्ञापन बड़े घर की बेटी कहानी के आधार पर निर्मित हैं)

Thursday, 28 July 2011

HIN 506
आपने अब तक विज्ञापन वाला लेख पढ़ लिया होगा। आज जिस तरह हमने वर्ग में विज्ञापन निर्माण की बात की उससे आपको यह समझ में आ गया होगा कि यह पूरी प्रक्रिया कितनी रोचक है। इस पूरी प्रक्रिया को अगर हम दुबारा याद करें तो-
सबसे पहले हमने एक कहानी पुस्तकालय में जा कर ढूँढी। निशी ने कुछ कहानियाँ ढूँढ़ी और उन कहानियों में से उसे प्रेमचंद की बड़े घर की बेटी अच्छी लगी। हमने इस कहानी में निहित संकल्पना को कैसे ढूँढ़ा जाए इसे जानने की कोशिश की। इस प्रक्रिया में निशी ने कहानी की मूल बातें बताई।
 आनंदी कहानी की नायिका
 बड़े घर की पुत्री, छोटे घर में ब्याही
 पति बाहर कहीं नौकरी करता है
 घर में ससुर तथा देवर
 देवर ने माँस खाने की इच्छा
 आनंदी ने माँस पकाया
 जितना था सभी घी का उपयोग
 खाने के समय देवर ने दाल में घी माँगा
 घी न होने की बात सुन कर भाभी को लाठी दिखाई
 ससुर से शिकायत की तो देवर का पक्ष लिया
 आनंदी ने बवाल मचाया
 पति के लौटने पर शिकायत
 पति ने घर छोड़ कर कहीं और जाने का निर्णय सुनाया
 आनंदी ने स्थिति को संभालते हुए कहा कि साथ रहने का संस्कार मिला है।
 बड़े घर की बेटी वही होती है जो परिवार को एक रखे।
अब इस कहानी में से आपको संकल्पना ढूँढ़नी है। संकल्पना ढूँढ़ने की प्रक्रिया यह है कि आप देखेंगे कि क्या वस्तु बदल देने से कोई फ़र्क पड़ता है?
 कहानी की नायिका आनंदी आनंदी के स्थान पर सुशीला भी हो सकती है।
 बड़े घर की पुत्री, छोटे घर में ब्याही एक ही स्तर के, अथवा छोटे घर की बड़े घर में
 पति बाहर कहीं नौकरी करता है स्त्री भी नौकरी कर सकती है
 घर में ससुर तथा देवर ससुर तथा देवर बेटे के साथ रह सकते हैं
 देवर ने माँस खाने की इच्छा किसी भीमहँगी चीज़ को खरीदने की बात
 आनंदी ने माँस पकाया हैसियत से अधिक खर्च करना

 जितना था सभी घी का उपयोग महिने की अर्थ-व्यवस्था डगमगा सकती है
 खाने के समय देवर ने दाल में घी माँगा देवर ने पैसे माँगे
 घी न होने की बात सुन कर भाभी को लाठी दिखाई न देने पर भला बुरा कहा
 ससुर से शिकायत की तो देवर का पक्ष लिया ससुर ने बेटे का पक्ष लिया
 आनंदी ने बवाल मचाया आनंदी को आपत्ति हुई
 पति के लौटने पर शिकायत पति से शिकायत
 पति ने घर छोड़ कर कहीं और रहने जाने का निर्णय पिता तथा भाई को घर से निकालने का निर्णय
आनंदी ने स्थिति को संभालते हुए कहा कि साथ रहने का संस्कार मिला है।
बड़े घर की बेटी वही होती है जो परिवार को एक रखे।
अब इस कहानी से जो संकल्पना निकल कर आती है वह यह कि
1- पारिवारिक एकता को टिकाए रखने के लिए छोटी बातों की अपेक्षा महद् मूल्यों की अधिक आवश्यकता है।
2-इस कहानी की मुख्य घटना माँस पकाने में घी के इस्तेमाल की है। अतः घी को ध्यान में रखते हुए आज के संदर्भ में कौन-सा विज्ञापन बन सकता है?
पहली बात को ध्यान में रखें तो इस पर से एक राष्ट्रीय एकता संबंधी विज्ञापन बन सकता है। आपसी भेद भाव मिटा कर एक बने रहना। जाति, धर्म भाषा के भेद भुला कर राष्ट्र को एक बनाए रखना। आपको इस संबंध में कॉपी राइटिंग करनी है। अब आप अपना टार्गेट ऑडियंस देखें। फिर प्रचारात्मक विज्ञापन है तो भाषा का एक अंदाज़ होगा। इस विज्ञापन में कुछ बेचना नहीं है परन्तु मूल्यों की स्थापना करनी है।
दूसरे मुद्दे में - कलह का कारण घी है। आज यूँ भी घी के प्रति लोगों के मन में आशंका है। अतः इस पर से आप किस उत्पाद का विज्ञापन बना सकते हैं ? तो नॉन-स्टिक बर्तन बनाने की कंपनी का। अगर आपको मुद्रित विज्ञापन बनाना है तो कैसे बनाएंगे और दृश्य-श्राव्य माध्यम में बनाना हो तो कैसे बन सकता है।
इसके दो तरीक़े हैं- एक में आप कहानी को भूल जाएं और संकल्पना पर काम करें। दूसरा तरीक़ा यह है कि कहानी को मॉडिफ़ाय करते हुए विज्ञापन बनाएं।
तो अब आप बना कर देखिए। अगली बार हम इसके संभवित कॉपी राईटिंग पर विचार करेंगे।





इस पोस्ट में सेमिस्टर १ तथा सेमिस्टर-३ के छात्रों के लिए एक आवश्यक सूचना है। सेमिस्टर ३ के विद्यार्थियों तथा अध्यापकों के अनुभव से हमने कोर्स ४०१ को थोड़ा व्यवस्थित किया है। इस कोर्स के विषय में तथा कोर्स ५०५ के संदर्भ में कुछ परिवर्तन किया गया है जो यहाँ दिया जा रहा है।
HIN – 401 स्वांतत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य का इतिहास
UNIT ONE - हिन्दी साहित्य में इतिहास लेखन
1-1 हिन्दी साहित्य का इतिहास: पुनर्लेखन की समस्याएँ
 आवश्यकता
 साहित्य चेतना का विकास
 नवीन शोध – परिणाम
 हिन्दी का स्वरूप – विस्तार*
 साहित्य की सीमा
1-2 आधार–स्रोत
1-3 इतिहास के क्षेत्र में मौलिकता
 इतिहास, अर्थ एवं स्वरूप*
1-4 - इतिहास दर्शन की रूपरेखा एवं साहित्य का इतिहास दर्शन
 भारतीय दृष्टि कोण
 पाश्चात्य दृष्टि कोण
1.5- हिन्दी साहित्येतिहास की परम्परा और उसके आधार
 काल विभाजन और नामकरण
 नामकरण की समस्याएँ
(सूचना – उपरोक्त पाठ्यक्रम को समझने के लिए 1- हिन्दी का स्वरूप – विस्तार तथा इतिहास अर्थ एंव स्वरूप मुद्दों की मात्र चर्चा करनी हैं प्रश्न नहीं पूछने हैं) इस यूनिट के लिए 'हिन्दी साहित्य का इतिहास – डॉ.नगेन्द्र' की पुस्तक को संदर्भ ग्रंथ के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। )
UNIT TWO – स्वांतत्र्योत्तर हिन्दी कविता
2-1 – प्रयोगवाद
 ऐतिहासिक परिवृत्त
 तार सप्तक (पूर्ण)
 प्रयोगवादी काव्य का घोषणा- पत्र
 नकेन – एक अतिवादी प्रयोग
 प्रयोगवादी काव्य की उपलब्धियाँ
2-2 नई कविता
 काव्यांदलोन की प्रवृति
 ऐतिहासिक आधार
 नई कविता का प्रयोग और प्रतिमान
 सामयिक परिवेश और नयी कविता
 नयी कविता की उपलब्धि और सीमाएँ
UNIT THREE – साठोत्तरी हिन्दी कविता
 कुछ प्रमुख काव्य आंदोलन और साठोत्तरी कविता
 अंतराष्ट्रीय स्थितियाँ और साठोत्तरी कविता
 अनियत कालीन पत्रिकाएँ और साठोत्तरी कविता
 साठोत्तरी कविता की उपलब्धियाँ
 हिप्पी संस्कृति और साठोत्तरी कविता
UNIT FOUR – स्वांतत्र्योत्तर हिन्दी नाटक
4–1 स्वांतत्र्योत्तर हिन्दी नाटककार
 मोहन राकेश
 लक्ष्मीनारयण लाल
 स्वांतत्र्योत्तर हिन्दी नाटक
 अंजो दीदी (उप्रेन्द्रनाथ)
 बिना दीवारों का घर (मन्नुभंङारी)
4-2 प्रयोगशील नाटक और नाटककार
 द्रौपदी (सुरेन्द्र वर्मा )
 खोए हुए आदमी की खोज (विपिनकुमार)
 जगदीशचन्द्र माथुर
 हबीब तनवीर
4 -3 काव्य नाटक
 धर्मवीर भारती का काव्य – नाटक –अंधायुग ।
 दुष्यंत कुमार का काव्य -नाटक – एक कंठ विषपायी
UNIT FIVE - नुक्कड नाटक एवं एकांकी
5- नुक्कड नाटक
 नुक्कङ नाटककार गुरूशरण सिंह
 नुक्कङ नाटककार असगर वजाहत
5.1 –एंकाकी का विकास
 एंकाकीकार रामकुमार वर्मा
 एंकाकीकार उदयशंकर भट्ट
5.2- एकांकी
 सीमा रेखा (विष्णु प्रभाकर)
 यहाँ रोना मना है। (ममता कालिया )
HIN505EC
सेमेस्टर-3 में कोर्स संख्या- 505EC में तुलनात्मक अध्ययन में कंब रामायण तथा रामचरितमानस में से परीक्षा के लिए केवल दो कांड रहेंगे। अर्थात् कंब रामयाण से दो कांड एवं रामचरितमानस से दो कांड। ये दो कांड होंगे- बाल कांड एवं अयोध्या कांड। अर्थात् जिन युनिट्स में तुलना संबंधी अध्ययन करना है तथा टेक्स्ट का अध्ययन करना है उसमें इन्हीं दो कांडों में से प्रश्न पूछे जाएंगे। आप को इन्हीं कांडों की वस्तु तथा महत्व आदि की तुलना करनी है। 7, 4, तथा 3 प्रश्नों के उत्तर इन्हीं कांडों में से पूछे जाएंगे। जहां सैद्धांतिक मुद्दों का अध्ययन करना है तो प्रश्न पाठ्यक्रम में दिए मुद्दों के आधार पर पूछे जाएंगे। इन दोनों ग्रंथो के विषय में विस्तार से जानकारी अपेक्षित है परन्तु परीक्षा के लिए इतना ही हिस्सा तय किया गया है। अध्यापक अपनी तरफ से यह जानकारी दें अथवा विद्यार्थी स्वयं इसे प्राप्त कर सकते हैं।









Sunday, 24 July 2011

कल्पना की अवधारणा

सर्जन प्रक्रिया
सेमिस्टर-3 में आपको कोर्स नं 502 में फिर एक बार काव्यशास्त्र पढ़ना है। इस कोर्स के अन्तर्गत आज हम यूनिट-2 की बात करेंगे। इस यूनिट में जिस सामग्री का हमें अध्ययन करना है उसे 'सर्जन-प्रक्रिया' शीर्षक के अन्तर्गत रखा गया है। इसमें शामिल मुद्दे इस प्रकार हैं- कल्पना की अवधारणा, कांट, सहृदय, प्रतिभा- विवेचन, साधारणीकरण, विरेचन, लोक-मंगल। आपने सेमिस्टर-1 में कोर्स 403 के यूनिट 5 में कॉलरिज तो पढ़ा ही होगा अतः आप सबको कल्पना संबंधी उनकी परिभाषा का तो पता ही होगा। आप यह सोच रहे होंगे कि एक बार तो पढ़ लिया, अब इसमें अधिक क्या करना है। इस सेमिस्टर में अब आपको यह समझना होगा कि उपरोक्त मुद्दे (कल्पना आदि) जिनको आपने परिभाषा में जाना था वह काव्य की सर्जनात्मकता में कैसे काम करते हैं।
कॉलरिज के लिए कल्पना शक्ति आकारदायिनी और रूपांतरकारी है। जो कल्पना हमें सौन्दर्यानुभूति की अवस्था तक ले जाती है , वह निर्माणात्मक होती है। उनके अनुसार कल्पना शक्ति संश्लेषणात्मक शक्ति है। असल में कल्पना शक्ति का संबंध मानवीय बोध(understanding) से जुड़ा है। मनुष्य में अगर समझ है तो इसका कारण यही है कि उसमें कल्पना शक्ति है। यह शक्ति तो सब मनुष्यों में होती है। कुछ-कुछ हमारी भावयित्री प्रतिभा के निकट ही समझिए इसे।
जैसा कि आप जानते हैं कि कॉलरिज ने गौण कल्पना को सर्जनात्मकता के लिए अनिवार्य माना है। अर्थात् यह गौण कल्पना शक्ति ही है जिसके कारण कविता रची जाती है। अब सवाल यह है कि 'कविता रची जाती है' से हमारा क्या मतलब होता है। कविता में बाहरी पदार्थ जगत और भीतरी भावों का सम्मिलन, संयोजन अथवा ग्रंथन होता है। My Love is like a red red rose में लाल गुलाब [( बाहरी पदार्थ (वस्तुजगत)] का ग्रंथन भीतरी तत्व, भाव- प्रेम से होता है। अर्थात् कविता बाहर-भीतर का समन्वय है। संग्रथन है। कविता की रचना-प्रकिया में कवि के बाहर का वस्तुजगत उसके भीतर के भाव-जगत के साथ जुड़ता है। यह जुड़ना भी कैसा – जैसे एक दूसरे में इस तरह समाहित हो जाना कि परिचित वस्तु-जगत अपरिचित (नया-सा) बन जाता है और गोपन एवं अजाने भाव-बोध पहचाने-से दृष्टिगोचर होने लगते हैं। अर्थात् अगर कल्पना शक्ति है, तभी यह मिलन, समन्वय संग्रथन आदि होता है। इनके-यानी वस्तु-जगत एवं भाव-जगत के समन्वय, सम्मिलन आदि का क्षण ही सर्जनात्मकता का क्षण है। कॉलरिज अपनी परिभाषा में यह स्पष्ट करते हैं कि किन का सम्मिलन आदि कल्पना-शक्ति द्वारा संभव होता है। विचार का बिम्ब के साथ, सामान्य का विशेष के साथ, मानव-निर्मित का प्रकृति-प्रदत्त के साथ सम्मिलन संग्रथन आदि। यह सूची आपको साहित्य सिद्धांतों के इतिहास संबंधी पुस्तक में मिल जाएगी।
इस बात को हम एक कविता के द्वारा समझ सकते हैः कविता का शीर्षक है- 'एक पीली शाम'

एक पीली शाम
पतझर का ज़रा अटका हुआ पत्ता
शान्त ।
मेरी भावनाओं में तुम्हारा मुखकमल
कृश-म्लान हारा-सा
(कि मैं हूँ वह मौन दर्पण में
तुम्हारे कहीं ....)
वासना डूबी
शिथिल पल में
स्नेह काजल में
लिए अद्भुत् रूप कोमलता
अब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आँसू सान्ध्य तारक-सा
अतल में.......

कॉलरिज जिस कल्पना शक्ति की बात करते हैं उसे इस कविता के माध्यम से जब समझने का उपक्रम करते हैं तो पाते हैं कि कविता के आरंभ में पतझर की पीली शाम में किसी पेड़ पर अटके हुए किसी पत्ते का चित्र कवि हमारे सामने रखते हैं। यहाँ शाम वस्तु-जगत है। पर यह कोई भी या हर कोई शाम नहीं है। यह एक पीली शाम है। सामान्य शाम को विशेष शाम में बदलने का काम कल्पना करती है। इस शाम रूपी वस्तु-जगत को कविता में आगे जा कर एक विशेष व्यक्तिगत संदर्भ में रूपांतरित करना है अतः यह कोई एक विशेष शाम है। यहाँ ज़रा शब्द पर भी ध्यान दें क्योंकि यह अब गिरा अब गिरा जितना ही अटका हुआ है। अब यह पीली पतझर की शाम जो वस्तुजगत , पदार्थ है उसे कवि अपने हृदय में स्थित किसी व्यक्ति के स्मरण से जोड़ता हैः मेरी भावनाओं में तुम्हारा मुखकमल। कवि को शाम देख कर याद नहीं आई है , परन्तु कृश-म्लान मुखकमल कवि के भाव-जगत का स्थायी सदस्य/भाव ही है, गोया। वह मुख जो किसी समय कमल की तरह था अब कृश-म्लान-हारा-सा है। कल्पना शक्ति के बल पर ही यह संभव होता है कि अभी तक शाम वस्तु-जगत थी, अब कृश-म्लान चेहरा वस्तु-जगत बन जाता है और नायिका के मौन-दर्पण में रहा कवि का प्रतिबिंब भाव-जगत बन जाता है। कवि को लगता है कि उनके हृदय के भाव-जगत में नायिका का जो चेहरा है, उस नायिका के हृदय में स्वयं उन्हीं का प्रतिबिंब है। अर्थात् प्रेमिका के हृदय के मौन-दर्पण में स्वंय कवि या नायक की छवि। इससे इस कविता की सर्जनात्मकता के लिए आवश्यक कल्पना शक्ति द्विगुणित हो जाती है। हृदय में रहे नायिका के भाव-चित्र को शाम के साथ जोड़ना और नायिका के हृदय में अपनी छवि को पिघलाना , यूँ शाम को देख कर कृश-म्लान नायिका के प्रति रहे उदासी के भाव को कवि इसलिए इतने कम स्पेस में अत्यन्त सुगठित तरीके से रख पाया है क्योंकि उनमें सृजन के लिए अत्यन्त अनिवार्य ऐसी कल्पना शक्ति बहुत गहरी है।
पीली शाम में ज़रा अटका हुआ पत्ता के चित्र को कृश-म्लान यानी बीमार और इसीलिए पीले नायिका के चेहरे पर अटके हुए आँसूं को जोड़ने का काम भी कल्पना-शक्ति के द्वारा होता है। अगर पीली शाम है तो आसमान में तारा भी है। इस तारे को आँसूं से और इन दोनों को पीले पत्ते से कवि जोड़ता है। अब आपके सामने यह चित्र उपस्थित होगा- प्रेम से भरे कवि के हृदय में स्थित नायिका का उदास-पीला चेहरा जिस पर एक अटका हुआ आँसू जो ज़रा से अटके हुए पत्ते की तरह है जो अतल में गिरते तारे के समान है । नायिका भी शीघ्र ही अतल में गिरने ही वाली है- यह संकेत भी मिलता है। अब गिरा अब गिरा की स्थिति में आँसू-पत्ता-तारा । बाहर उदास शाम और भीतर उदास पीला चेहरा। आँसू भीतर और तारा-पत्ता बाहर। भावनाओं के सैलाब में वासना का स्नेह काजल में डूबना यानी भावनाओं की बेतरतीबी को व्यवस्था एवं तरतीबी देना। अभिव्यक्ति की व्यवस्था और भावावेगों को संतुलित करने का काम भी कल्पना शक्ति ही करती है। जिस कविता में यह संतुलन जितना अधिक होगा, उतनी ही कल्पना-शक्ति दृढ़ एवं समृद्ध है, ऐसे माना जा सकता है। कल्पना शक्ति के अभाव में भावावेग प्रलाप बन जाते हैं और कल्पना शक्ति के कारण वे कविता बनते हैं।
इस तरह आप देख सकते हैं कि कल्पना शक्ति सृजन प्रक्रिया में किस तरह काम करती है।



Friday, 22 July 2011

कुछ ज़रूरी बातें




मुझे उम्मीद है कि आपने अब तक विज्ञापन वाला लेख पढ़ लिया होगा। विज्ञापन के संदर्भ में आप नेट पर ITpedia में तथा 'भारतीय पक्ष' नामक साईट पर जाएं तथा और सामग्री प्राप्त करें। अगर इसके अलावा आपको कुछ मिले तो आप अपनी सूचना को अन्यों के साथ इस ब्लॉग पर बाँट सकते हैं। सेमिस्टर-3 के संदर्भ में कुछ प्रश्न आपके मन में और होंगे। मसलन HIN505EC के कोर्स के संदर्भ में । आगर आपके केन्द्र में तुलनात्मक साहित्य का विकल्प है तो आपको इसमें केवल दो कांड ही पढ़ने हैं। बालकांड तथा अयोध्या कांड। यानी कि रामचरित मानस के दो कांड एवं कम्ब रामायण के दो कांड। तुलनात्मक साहित्य के सैद्धांतिक प्रश्नों के अलावा आपको टैक्स्ट के जो सवाल करने होंगे उसमें ये दोनों कांड ही रहेंगे। यूं तो पूरा कंब रामायण बहुत रोचक है, पर हम छः महिने के सेमिस्टर में बहुत अधिक तो नहीं पढ़ सकते। फिर आप अपनी इच्छा से पूरा पढ़ सकते हैं। किंतु परीक्षा में तो केवल दो कांड ही आएंगे। मुझे विश्वास है आप सबने राहत की साँस ली होगी।
एक बात और मैं आपको बताना चाहती हूँ। अब तक आपने दो सेमिस्टर का अध्ययन कर लिया है। यूं तो अब इस नयी पद्धति से आप वाकिफ़ हो गए होंगे। पर मैं आपको याद दिलाना चाहूँगी और इस याद दिलाने के बहाने हमारे नए विद्यार्थियों को भी बताना चाहती हूँ कि आप इस बात को गाँठ में बाँध लें कि हम जब परीक्षा में लिखते हैं तो अगर यह पूछा जाए कि प्रश्न का उत्तर 200 शब्दों में देना है तो इसका मतलब 200 शब्द ही। अधिक से अधिक 250 तक की आपको छूट है। आप कितना भी सही और अच्छा लिखें पर अगर 400,600 शब्दों में लिखते चले जाएंगे तो आपको अच्छे अंक नहीं मिलेंगे। अब वह समय गया जब जितने ज्यादा पन्ने उतने ज्यादा अंक मिलते थे। आप सूचना का पालन करते हुए अगर लिखेंगे तो यह आदत आपको नेट, स्लेट की परीक्षा तथा अन्य स्पर्धात्मक परीक्षाओं में काम आएगी। वहाँ तो उत्तर लिखने के लिए एक निश्चित स्थान दिया जाता है, जिसमें आपको लिखना होता है। हमारे यहाँ चूँकि स्थान की बाध्यता नहीं है, अतः हम अपने उत्तर को फैलाने की छूट ले लेते हैं।
HIN501 के कोर्स में यूनिट चार तथा पाँच दोनों में उपन्यास छप गया है। परन्तु एक में उपन्यास है तो दूसरे में कहानी है, यह सुधार आप कर लें।
बस, आज के लिए इतना ही।

Monday, 4 July 2011

प्रयोजनमूलक हिन्दी

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आप कल्पना कीजिए एक ऐसे समूह की, जिसमें कई तरह के लोग बैठे हैं। विभिन्न धर्म, जाति वर्ग के इस समूह में एक रोबो भी है - दिखता तो वह मनुष्य की तरह ही है, पर है तो वह मानवेतर -इतर-मानव। अगर हम जाति प्रथा में मानते हैं या पुरुष वर्चस्व वाली मानसिकता हमारी है, तो स्त्रियों एवं वर्णेतर समूह के प्रति हम कुछ संकोचशील एवं खिंचे-खिंचे रहेंगे। पर उस रोबो के प्रति हमारी वैसी मानसिकता नही होगी। केवल एक कुतुहल – सा , पर, फिर 'वह है तो मनुष्य-इतर', यह सोचकर हमारे लिए वह कोई खास महत्व का कभी नहीं होगा। परिधि पर का साहित्य( विशेष रूप से -दलित, नारी) अब भी कई लोगों के लिए वैसा ही है (अछूत-सा),पर प्रयोजन-मूलक तो उस रोबो की तरह है जो कुतूहल तो पैदा करता है परन्तु उपेक्षा जितना भी महत्वपूर्ण हमें कभी नहीं लगता। जहाँ तक कार्यालय से जुड़े प्रयोजनमूलक का संबंध है , तो हमें वह कभी भी अवरोध-रूप नहीं लगता । अर्थात् हमें उससे कोई ख़ास लेना-देना नहीं होता। पत्रकारिता ठीक है , कई बार हमें काम आती है और विज्ञापन से तो हमारा कोई लेना- देना ही नहीं होता। वही रिश्ता,अर्थात् कौतूहल अथवा मतलब का, किसी भी ग्राहक का एक उत्पाद से होता है। लेकिन हमारे कान तब खड़े हो जाते हैं जब हम साहित्यिक कृतियों के विज्ञापन में रूपांतरण करने की बात करते हैं। हमें अचानक लगने लगता है कि यह तो ज्यादती है। और लगना भी चाहिए। जो सुन्दर छवियां हमारे मन में कविताओं आदि की छप चुकी हैं उन्हें बाज़ार में लाते हुए हमारी सौन्दर्य-धर्मी ( जिसे ज़रूरत पड़ने पर हम मूल्य-धर्मी भी कहते हैं) रूह काँप जाती है।
साहित्य क्या है- इस परम्परागत प्रश्न का उत्तर देते हुए हम अपनी बात को शुरु करते हैं। उसके अनेकविध जवाब ढेरों पन्नों में छप चुके हैं, जिन्हें आप फुर्सत से पढ़ सकते हैं। उन तमाम परिभाषाओं के साथ, साहित्य आखिरकार तो एक कंटेंट है जिसे कवि-लेखक अपने बिम्बों , प्रतीकों, विचारों अलंकारों के माध्यम से एक स्वरूप देता है। उसे साहित्य बनाता है। यानि, हर साहित्यिक कृति को अगर रिड्यूस करें तो उसकी सबसे छोटी इकाई उसकी संकल्पना है। जब हम कहते हैं दाने आए घर के अंदर – तो इसका अर्थ हम रोटी ही लेते हैं, या फिर दाने लाने वाले मज़दूर -लक्षणा शक्ति के बल पर। और भूख का निदान, भरापन और समृद्धि क्रमशः अर्थ लेते हैं व्यंजना शक्ति के बल पर। मूल बात कंटेंट की है। साहित्य में जो सामग्री है उसमें विचार निहित होते हैं। असल में सबसे मूल्यवान तो विचार ही होते हैं। यही विचार, साहित्य,

विज्ञान, समाज-शास्त्र सभी प्रकार के ज्ञान का निर्माण करते हैं और इन्हीं को साहित्य में से परख कर/ढूँढ कर हम विज्ञापन का निर्माण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए यह विज्ञापन देखिए-



अब इस विज्ञापन को देख कर आपको कुछ परिचित –परिचित-सा लगा। हाँ, आपने कली और अलि पढ़ कर बिहारी को याद किया होगा। जी हाँ, नहिं पराग नहिं मधुर मधु वाला ही यह दोहा है। लेकिन साहित्य के अध्येताओं को इतनी सरलता से यह बात गले नहीं उतरेगी। यह बात बड़ी बेतुकी और विचित्र भी लग सकती है। इसे हम अपनी परंपरागत साहित्यिक दृष्टि पर आक्रमण ही समझेंगे। हम अब तक इस दोहे के साथ जिस सौन्दर्य दृष्टि को जोड़ते आए हैं, वह जैसे एकाएक कहीं ग़ायब हो जाती है। लेकिन अगर आप सोचेंगे तो इस दोहे के अब तक हुए अर्थ हमारी ज्ञान-संपदा का हिस्सा तो बन ही चुके हैं। इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। वह तो यथावत् है ही। इसमें कोई परिवर्तन तो नहीं होगा। जितनी सूक्ष्मता से हमारे इन कवियों का विश्लेषण हुआ है वह तो हमारे पास सुरक्षित है ही। उसे कोई बदल तो नहीं सकता। पुराने साहित्य को हम नए विमर्शों की दृष्टि से भी देखते-परखते हैं। उससे पुराने विश्लेषण पर कोई खतरा तो नहीं आ जाता। सवाल यह है कि यह हमारी एक पूँजी है जिसे हम अपने लिए नई दृष्टि से उपयोग मे ला सकते हैं। वेदादि तथा पुराणों को हमने भक्ति विमर्श में इस्तेमाल किया फिर उसी को हमने श्रृंगार-चित्रण तथा सत्ता की तरफ़दारी में प्रयुक्त किया। सामग्री वही है पर उसका उपयोग युगानुरूप अलग-अलग ढंग से करते रहे हैं।
इसी तरह एक और प्रसिद्ध दोहा लीजिए- कहत, नटत, रीझत खीजत...... इस दोहे को याद कर के हम सभी का दिल बाग़-बाग़ हो जाता है। इस के मूल विचार तक इसे जब हम रिड्यूस करते हैं , तो हमारी समझ में आ जाता है कि –Privacy in public place. भीड़ के स्थानों पर हमें अपने प्रियजन से संवाद करना है। इसका विस्तार करें तो भीड़ में खोए हुए लोगों को एक दूसरे को खोजना है। आपको यह बताना है कि अब कुंभ के मेले में कोई भाई अपने भाई से जुदा नहीं होगा। यानी कि कहत नटत .... एक मोबाईल का विज्ञापन बन सकता है। आप इसमें समाज के कई अन्य चित्र और संदर्भ जोडते चले जाएं। एक पूरी सीरीज़ बन सकती है विज्ञापन की।

हम सब कहीं-न-कहीं इस बात को समझते हैं कि अब हमारे पाठ्यक्रमों में मध्यकाल को पढ़ने-पढ़ाने वालों की संख्या भी कम होती जा रही है। उसकी उपयोगिता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। अतः हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या पर उसका असर पड़ता जा रहा है। ज़रूरी यह है कि अपने पाठ्यक्रमों के इन यूनिट्स को आज की आवश्यकता के अनुसार ढाल लेना चाहिए। हम यह भी सोचते हैं कि इसका मतलब तो यह हुआ हमें बाज़ार की आवश्यकताओं के सामने क्या घुटने टेक देने चाहिए। लेकिन बात को इस सिरे से नहीं पकड़ना चाहिए। हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि कृति के केन्द्र में तो विचार अथवा भाव ही है। उस विचार के बीज को अगर आप पकड़ सकते हैं, तो आप उसका विनियोग विज्ञापन में कर सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्य पक्ष तथा उसके सामाजिक पक्ष की जानकारी जितनी गहरी होगी उतने बेहतर विज्ञापन आप बना सकते हैं। हैवेल्स का विज्ञापन प्रेमचंद की ईदगाह कहानी ही तो है। वहाँ हामिद और दादी है यहाँ एक बच्चा और उसकी माँ है। हैवेल्स के इस विज्ञापन की संवेदनशीलता के मूल में प्रेमचंद की उस कहानी की संवेदनशीलता ही तो है, जो उस तरह के मेले और उस तरह के बच्चे समाप्त हो जाने पर भी समय के साथ बदल जाती है, किन्तु प्रभावित तो करती ही है।
आपने देखा होगा कि श्रृंगार रस का यह(बिहारी) दोहा सामाजिक जागृति का काम करता है। (अगर इस तरह आप देखेंगे तो) आपको यह भी ध्यान आएगा कि उस समय के कवि समाज के प्रति विमुख तो नहीं थे। क्योंकि कोई भी रचना अपना कंटेंट समाज से ही लेती है। उस समय राजा से प्रजा तक यह बात विद्यमान होगी। लेकिन जिस के सिर पर राष्ट्र की, शासन की, राज्य की ज़िम्मेदारी है वह तो विमुख नहीं ही हो सकता है। लेकिन अगर वही कंटेंट आज भी है , और अगर लोकतंत्र भी है, तो इसका इस्तेमाल हम सामाजिक जागृति के विषयों में कर सकते हैं। साहित्य में देखा जाए तो सामाजिक संदर्भों के ऐसे कूट समाए होते हैं जो हो सकता है कि हमें तत्काल समझ में न आएं, पर परिस्थितियाँ, भूतकाल में रचे साहित्य के वर्तमान अर्थों को खोलने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एक ही कंटेंट को अभिव्यक्ति के भिन्न माध्यमों द्वारा भिन्न अर्थ-स्तरों तक पहुँचते हुए हम देख सकते हैं। रीतिकाल में जो श्रृंगार रस की रचना थी आज विज्ञापन के माध्यम से आप उसके द्वारा सामाजिक जागृति के अर्थ तक पहुँच सकते हैं।
आज बाज़ार में सर्वाधिक अगर कुछ बिकता है तो सौन्दर्य प्रसाधन। रीतिकाल में नायक-नायिकाओं के सौन्दर्य निरूपण एवं अंग-निरूपण के इतने उदाहरण हैं कि सौन्दर्य प्रसाधनों से पटे पड़े बाज़ार में इससे बेहतर और कौन-सा कंटेंट हो सकता है।
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विज्ञापन की दुनिया हमारी वास्तविक दुनिया के इतने क़रीब एक ऐसा मायाजाल रचती है कि हम उसे एक ठोस वास्तविकता के रूप में ही स्वीकारने लगते हैं। विज्ञापन की दुनिया हमारी वास्तविक दुनिया से ही पदार्थ लेती है, वह हमारी इच्छा, स्वप्न तथा आकांक्षाओं पर पलती-बढ़ती है, निर्मित होती है। अतः वह एक तरह से हमारी वास्तविक दुनिया ही है ऐसा कहा जा सकता है। परन्तु यह मायाजाल इसलिए है कि यह दुनिया हमें ऐसे काल्पनिक और कई बार असंभव दुनिया में ले जाने का स्वप्न दिखाती है, जो अक्सर सही नहीं साबित होते , अतः यह मायाजाल है। जैसे कोई भी शैंपू आपके बालों को इतना सशक्त नहीं बनाता कि आप अपने बालों से ट्रैक्टर खींच सकें। या कोई भी साबुन आपको सुंदर नहीं बना सकता अगर आप सुंदर नहीं हैं तो ! या आप अचानक स्वस्थ नहीं बन सकते, चाहे जो खाएं। अतः यह एक प्रकार का मायजाल ही है। पर फिर भी विज्ञापन के बिना आज की दुनिया की कल्पना करना कठिन ही है। ये विज्ञापन हमारे संबंधों, भावनाओं के साथ जुड़ गए-से लगते हैं। समय के साथ हम यह भी देख सकते हैं कि जिन्सों के अलावा अब हमारे तीज-त्यौहार, हमारी पूजा अर्चना, हमारे पारिवारिक व्यवहार तथा संवेदना के मूल्य भी विज्ञापनों के द्वारा ही हमारी स्मृति का द्वार खटखटाते दिखाई पड़ते हैं। अपने काम-काज में व्यस्त बाहरी दुनिया में काम करती पीढ़ी(स्त्री-पुरुष- दोनों ही) को इन विज्ञापनों से ही पता चलता है कि कब करवा चौथ है, कब रक्षा-बंधन और कब गणेश-चतुर्थी। उसे जो कुछ भी करना-कराना है, विज्ञापन ही बताएंगे मसलन उसे तोहफ़े में क्या ले जाना है और कौन-सी मिठाई खानी है।
विज्ञापन हमें प्रभावित करते हैं। चाहे जितना हम उनसे बचना चाहें, पर रेडियो द्वारा, टी.वी द्वारा. सड़क पर लगे होर्डिंग्स द्वारा, अख़बारों, पत्रिकाओं, पैम्फ्लेट, दीवारें.... कितनी ही जगहों के बारे में और तरीकों के बारे में आप सोचें – विज्ञापन तो आपको दिख ही जाएंगे। उत्पाद बेचते विज्ञापन, सरकारी योजनाओं को प्रचारित करते विज्ञापन, विकास की सरकारी नीतियों की ओर ले जाते विज्ञापन .... अर्थात् हमारा पूरा जीवन, हमारी सोच, हमारी भविष्य संबंधी चिंताएं.... सभी को इस दौर में अभिव्यक्त करने का काम विज्ञापन करते हैं।
विज्ञापन अभिव्यक्ति (कॉम्युनिकेशन) का एक अलहदा माध्यम है। और जैसा कि ऊपर कहा गया है वह हम तक उत्पाद, विकास तथा विचार का संप्रेषण करते हैं। उत्पाद तथा विकास ठोस हैं। दृश्यमान है। विचार ठोस तो हो सकते हैं पर दृश्यमान नहीं होते। उत्पाद पदार्थ है, विकास क्रिया है, कार्य है। पर दोनों ठोस हैं, दिखाई पड़ते हैं। विचा,र पदार्थ तथा विकास की तरह नहीं होते। अर्थात् न ही वह पदार्थ की तरह

स्थिर है, न विकास की तरह क्रियाशील ही ।( यही बात साहित्य के बारे में भी कही जा सकती है। लेकिन इनके अंतर के विषय में आगे बात होगी।) परन्तु विज्ञापन के माध्यम से, विचार, ठोस तथा क्रियाशील दोनों ही बन सकता है। विचार उत्पाद में वैचारिकता तथा विकास में ठोसत्व लाने का काम करता है। वह उसमें एक प्रकार का आकर्षण भी उत्पन्न करता है।
साहित्य भी एक प्रकार का संप्रेषण ही है।( एक दृष्टि से वह(साहित्य) स्वयं उत्पाद है।) पर वह न तो पदार्थ का संप्रेषण करता है न ही विकास की क्रियाशील प्रस्तुति करता है। आपके मन में तुरंत यह बात आ सकती है कि रस की चर्चा करते समय रस का उल्लेख पदार्थ की तरह किया गया है। लेकिन रस का पदार्थत्व उत्पाद के पदार्थत्व से भिन्न है। एक का भौतिक तथा दूसरे का अ-भौतिक। अतः साहित्य अ-भौतिक पदार्थों(भाव रसादि एवं छन्द-अलंकारादि) का संप्रेषण करता है। इन सब अ-भौतिक तत्वों से मिल कर वह एक अ-भौतिक पदार्थ बनता है। प्राचीन काल में पांडुलिपियाँ तथा वर्तमान काल में पृष्ठों(कागज़) में निबद्ध उसका उत्पादन असल में उसकी पैकेजिंग है। जो प्रकाशन संस्था जितनी समृद्ध है वह उतना ही बढिया पैकेजिंग करती है।
साहित्य का संबंध मनुष्य की उन वृत्तियों से है जो बाजार में बिकाऊ नहीं हैं। पर इन अ-भौतिक पदार्थों को (भाव-सौन्दर्यादि) समाज में संप्रेषणीय बनाने के लिए साहित्यकार कुछ बिम्ब कुछ चित्र कुछ ऐसे सामाजिक प्रतीकों को चुनता है, जो भौतिक पदार्थों का आकार ग्रहण करते हैं। नायिका की सुन्दरता को चाँद, गुलाब, कमल मछली आदि बताना या लोगों के बीच को संबंधों तथा आशा-निराशाओं वफादारियाँ-धोखेबाज़ियाँ, उत्साह-ईर्ष्या को बताने के लिए पदार्थ-प्रतीकों,प्रसंगों, घटनाओं, मिथकों का उपयोग किया ही जाता है। यही वह स्थान है जब साहित्य की रचनाएं हमारे काम आ सकती हैं। साहित्य में भी भाव-सौन्दर्य का जो ठोस स्वरूप है जिसे बिम्बों,अलंकारों आदि के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है, वह विज्ञापन की संकल्पना निर्माण में बहुत उपयोगी हो सकता है।
विज्ञापन में विचार की संकल्पना के बीज साहित्य की कृतियों में बिखरे पड़े हैं। लेकिन इन बीजों को पकड़ने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम इन बातों को समझ लें-
1-विज्ञापन-निर्माण के बिन्दु
2-विज्ञापन का टार्गेट-ग्रुप

3-विज्ञपित वस्तु, पदार्थ का प्रकार( कैटेगरी)
4-विज्ञापन का माध्यम (पत्र-पत्रिकाएं, दृश्य-श्राव्य आदि)
5- साहित्य कृति में से विचार, संकल्पना को आकारित करने की क्षमता का विकास करना।
6- कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करने की क्षमता को विकसित करना।
7- संकल्पना को ठीक-ठीक भाषा में अभिव्यक्त करने के लिए भाषा की बारीकियों को समझना तथा भाषा का दोष-हीन प्रयोग करने के लिए भाषा-ज्ञान की पूरी जानकारी।
8-साहित्य के सौंदर्य-पक्ष तथा साहित्य के समाज-शास्त्रीय पक्ष की पहचान करना।
हम लोग तो साहित्य के विद्यार्थी हैं, अतः हमें विज्ञापन कैसे बनता है, इसकी तकनीकी जानकारी नहीं होती, यह स्वाभाविक ही है। पर जैसे नाट्यकार के लिए रंगमंच का ज्ञान होना ज़रूरी है, इतना भर कि वह नाटक लिखते समय यह देख सके कि रंगमंच पर लिखा हुआ दृश्य संभव है या नहीं। यानी उसे अपने माध्यम की जानकारी होनी चाहिए ठीक उस स्क्रिप्ट लेखक की तरह जिसे कुछ-कुछ फिल्म टेकनीक का पता होना चाहिए जैसे कि एक अंपायर, चाहे न बल्लेबाजी करता हो न गेंदबाजी, पर उसे क्रिकेट की जानकारी तो होनी ही चाहिए। हम विज्ञापन की कॉपीराइटिंग करने का काम कर सकते हैं। पर कॉपीराइटर के रूप में हमें यह पता होना चाहिए कि इस विज्ञापन का टार्गेट ऑडियंस कौन-सा है। हमारा कंटेंट, हमारी भाषा , हमारा अंदाज़- सभी उस टार्गेट ऑडियन्स पर आधारित होना चाहिए। फिर हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि जिस विज्ञापन के लिए हमें कॉपीराइटिंग करना है, उसकी श्रेणी कौन-सी है। वह व्यावसायिक विज्ञापन है अथवा सामाजिक, राजनैतिक जागृति से संबंधित है अथवा विकास से जुड़ा है। सभी श्रेणियों के विज्ञापन का स्वरूप तथा गौण संरचना अलग होगी। प्राथमिक संरचना तो एक जैसी ही होती है। प्राथमिक संरचना का अर्थ है- प्रत्येक विज्ञापन प्रचार के लिए होता है और संप्रेषणीयता उसकी पहली शर्त है। वह बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि वह प्रभावशाली होना चाहिए। गौण संरचना का अर्थ यह है कि श्रेणियों के अनुरूप भाषा तथा दृश्यों का प्रयोग। वैसे, दृश्य भी विज्ञापनों में भाषा का काम देते हैं। पर दृश्य कैसा होना चाहिए, यह भी विज्ञापन की कॉपीराइटिंग का कच्चा हिस्सा होते हैं।(कच्चा इसलिए कि बाद में उस पर काम होता है।) फिर व्यावसायिक विज्ञापन कई बार श्रेणी बद्ध रूप से तैयार

किए जाते हैं। एक ही विचार या संकल्पना को विभिन्न परिस्थितियों में विकसित किया जाता है। जैसे कोई कवि एक ही बात को विभिन्न बिम्बों के माध्यम से प्रकट करता है। इस बात को हमने कहत नटत वाले उदाहरण से भी देखा ।
विज्ञापन मीडिया के किस माध्यम के द्वारा प्रसारित होना है, उसके आधार पर कॉपीराइटर को अपना काम करना होता है। वह पत्र-पत्रिकाओं में अथवा अख़बार में छपने वाला है अथवा रेडियो से प्रसारित होगा या फिर दृश्य माध्यमों द्वारा पहुँचाया जाने वाला। दृश्य माध्यमों में कम लेखन, श्रव्य माध्यमों में ध्वनि का आधिक्य (संगीत आदि) एवं लेखन तथा प्रकाशित माध्यमों में ज़बरदस्त प्रभावशाली भाषा-प्रयोग- बहुत आवश्यक है। आप अगर हिन्दी में कंप्यूटिंग सीख लेंगे तो आप इन तीनों माध्यमों द्वारा बेहतर विज्ञापन के कॉपीराइटर बन सकेंगे। लेकिन इतना सब करने के लिए भाषा का दोषहीन प्रयोग अथवा भाषा की पूरी जानकारी या सही जानकारी ही आपको अच्छा कॉपीराइटर बना सकेगा। निराला ने छन्द तोड़ने की बात इसलिए की, क्योंकि उन्हें छन्द का ज्ञान था। ठंडा यानी कोका कोला सुनने पर सरल लगता है, पर इस सरलता तक तभी पहुँच सकेंगे जब आप भाषा पर अधिकार रखते हों। कोका कोला तभी कोकाकोला होता है जब वह ठंड़ा होता है। उसका मूल कंसेप्ट साहित्य के विद्यार्थी बेहतर निकाल सकते हैं क्योंकि हमने अपने विभिन्न कोर्सेस में उसे पढ़ रखा है। आप देखिए आपको विज्ञापन के लिए कॉपीराइटर बनाने में साहित्य की बेहतर समझ ही काम आएगी। आप साहित्य के समाजशास्त्रीय पक्ष को तथा सौन्दर्य पक्ष को जितनी गहराई से समझेंगे उतना ही विज्ञापन लेखन में सफल होंगे।
देश की सुरक्षा बिना सैनिकों के संभव नहीं है। सालभर में सैनिकों को हम अलग अलग अवसरों पर याद करते हैं। हमारे कवियों ने ढेरों रचनाएं इन पर लिखी हैं। आप को अगर इस से संबंधित कोई कॉपीराइटिंग करनी हो, तो आप कौन-सी कविता चुनेंगे ? आप जब देखना शुरु करेंगे और कॉपीराइटिंग की दृष्टि से उस पर सोचना आरंभ करेंगे कि संदेश पहुँचे भी, मार्मिक भी हो, दृश्य की दृष्टि से सटीक भी और आपका पढ़ा साहित्य आपके काम भी आए..... तो आप किस कविता को चुनेंगे। आप सोच कर देखिए। क्या पुष्प की अभिलाषा कविता प्रभावशाली होगी... तो बना कर देखिए कोई विज्ञापन। उसका टार्गेट ऑडिएंस कौन-सा होगा, उसकी भाषा कौन-सी होगी, वह किस श्रेणी में आता हे......इत्यादि, इत्यादि।
अब आप देखिए उसने कहा था कहानी है... वह किस प्रकार के विज्ञापन में आपकी मदद कर सकती है। कहानी तो प्रेम की है, उसका बैकड्रॉप युद्ध है.....। आप सोच कर देखिए। इसकी एक प्रोसेस है। प्रेम

आपको क्या देता है- आश्वासन एवं शीतलता। वह आजीवन साथ का आश्वासन देता है। उससे आपका जीवन निश्चिंत हो जाता है। अब इस थीम के आस पास आप एक व्यावसायिक एवं जीवन सुरक्षा का कोई विज्ञापन बना सकते हैं। जीवन सुरक्षा में क्या आता है, यह अब आप सोचिए। बीमा पॉलिसी ? व्यावसायिकता में किस उत्पाद की बात हो सकती है। लेखक ने तो कहानी में लिखा ही है। लहनासिंह क्या खरीदने बाज़ार गया था। अब यह एक कहानी आपको दो श्रेणियों के विज्ञापनों की कॉपीराइटिंग करने में मदद कर सकती है।
' देखा मुझे उस दृष्टि से जो मार खा रोई नहीं...' यह पंक्ति ग्रास रूट के स्तर तक हुए स्त्री –सशक्तिकरण तथा स्त्री जागृति को बताने के लिए कितना प्रभावशाली विज्ञापन बनाने में मददरूप हो सकती है।
पूरा शहर अँधेरे में डूबा है,
शर्माजी के घर उजाला !?! कैसे।
जी हाँ...--------- लैंप का कमाल!
अब बताइए, इस विज्ञापन के मूल में कौन-सी रचना है। (आप भी खरीदिए और एक चाँद अपने घर ले आइए।)
आपको किसी नए वाद्य या किसी म्यूज़िक कंपनी के लिए विज्ञापन बनाना हो तो आप को किस कविता से मदद मिल सकती है ? क्या आप को कुछ याद आता है ? आपको यह बताना है कि यह नया वाद्य सर्वथा नया है, औरों से अलग... तो आप किस कविता के उपयोग के बारे में सोच सकते हैं- इस पर सोचिए। क्या- नव गति नव लय ताल छन्द नव- से आप कुछ बना सकते हैं ?!?
आपने अब तक अंदाज़ा लगा लिया होगा कि अगर हम अपने विषय ( हिन्दी साहित्य) को ठीक से हृदयंगम करेंगे और भाषा पर प्रभुत्व प्राप्त कर सकेंगे तो इस क्षेत्र में हम से अच्छा कॉपीराइटर कहाँ मिलेगा। आप इतिहास पढ़ते हैं, तो सामग्री को एकत्रित करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। आप गद्य-पद्य पढ़ते हैं तो सौन्दर्य तथा समाजशास्त्रीय पक्ष को जानने लगते हैं, आप काव्य-शास्त्र पढ़ते हैं तो संकल्पनाओं का आकलन करना आपको आ जाता है, आप अनुवाद, प्रयोजन मूलक आदि पढ़ते हैं तो सही स्थान पर सही एवं

9498औचित्यपूर्ण शब्द रखने का बोध आपको हो जाता है, मध्यकालीन साहित्य आपको एक सांस्कृतिक आधार देता है, नाटक आपको सिखता है कि समय को सही रूप में कैसे पकड़ें.... यह सभी गुण एक कॉपीराइटर में होना ज़रूरी है।


Sunday, 3 July 2011

विज्ञापन


एक आवश्यक सूचना

आपने साहित्य का विज्ञापन में विनियोग वाला लेख देखा होगा। उसमें लेख के बीच में बड़ा गैप आपको मिलेगा। असल में वहाँ एक विज्ञापन जाना था जो कुछ तकनीकी समस्या की वजह से नहीं जा सका। मैं कोशिश कर रही हूँ कि उसे किसी अन्य फ़ॉर्मेट में भेजूँ। वरना उसी हार्ड-कॉपी आप को सत्र आरंभ होते ही मिल जाएगी। अतः उस विज्ञापन की कल्पना कर के आगे का लेख पढ़ें।

Saturday, 2 July 2011

विज्ञापन उद्योग में साहित्य का विनियोग



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आप कल्पना कीजिए एक ऐसे समूह की, जिसमें कई तरह के लोग बैठे हैं। विभिन्न धर्म, जाति वर्ग के इस समूह में एक रोबो भी है - दिखता तो वह मनुष्य की तरह ही है, पर है तो वह मानवेतर -इतर-मानव। अगर हम जाति प्रथा में मानते हैं या पुरुष वर्चस्व वाली मानसिकता हमारी है, तो स्त्रियों एवं वर्णेतर समूह के प्रति हम कुछ संकोचशील एवं खिंचे-खिंचे रहेंगे। पर उस रोबो के प्रति हमारी वैसी मानसिकता नही होगी। केवल एक कुतुहल – सा , पर, फिर 'वह है तो मनुष्य-इतर', यह सोचकर हमारे लिए वह कोई खास महत्व का कभी नहीं होगा। परिधि पर का साहित्य( विशेष रूप से -दलित, नारी) अब भी कई लोगों के लिए वैसा ही है (अछूत-सा),पर प्रयोजन-मूलक तो उस रोबो की तरह है जो कुतूहल तो पैदा करता है परन्तु उपेक्षा जितना भी महत्वपूर्ण हमें कभी नहीं लगता। जहाँ तक कार्यालय से जुड़े प्रयोजनमूलक का संबंध है , तो हमें वह कभी भी अवरोध-रूप नहीं लगता । अर्थात् हमें उससे कोई ख़ास लेना-देना नहीं होता। पत्रकारिता ठीक है , कई बार हमें काम आती है और विज्ञापन से तो हमारा कोई लेना- देना ही नहीं होता। वही रिश्ता,अर्थात् कौतूहल अथवा मतलब का, किसी भी ग्राहक का एक उत्पाद से होता है। लेकिन हमारे कान तब खड़े हो जाते हैं जब हम साहित्यिक कृतियों के विज्ञापन में रूपांतरण करने की बात करते हैं। हमें अचानक लगने लगता है कि यह तो ज्यादती है। और लगना भी चाहिए। जो सुन्दर छवियां हमारे मन में कविताओं आदि की छप चुकी हैं उन्हें बाज़ार में लाते हुए हमारी सौन्दर्य-धर्मी ( जिसे ज़रूरत पड़ने पर हम मूल्य-धर्मी भी कहते हैं) रूह काँप जाती है।
साहित्य क्या है- इस परम्परागत प्रश्न का उत्तर देते हुए हम अपनी बात को शुरु करते हैं। उसके अनेकविध जवाब ढेरों पन्नों में छप चुके हैं, जिन्हें आप फुर्सत से पढ़ सकते हैं। उन तमाम परिभाषाओं के साथ, साहित्य आखिरकार तो एक कंटेंट है जिसे कवि-लेखक अपने बिम्बों , प्रतीकों, विचारों अलंकारों के माध्यम से एक स्वरूप देता है। उसे साहित्य बनाता है। यानि, हर साहित्यिक कृति को अगर रिड्यूस करें तो उसकी सबसे छोटी इकाई उसकी संकल्पना है। जब हम कहते हैं दाने आए घर के अंदर – तो इसका अर्थ हम रोटी ही लेते हैं, या फिर दाने लाने वाले मज़दूर -लक्षणा शक्ति के बल पर। और भूख का निदान, भरापन और समृद्धि क्रमशः अर्थ लेते हैं व्यंजना शक्ति के बल पर। मूल बात कंटेंट की है। साहित्य में जो सामग्री है उसमें विचार निहित होते हैं। असल में सबसे मूल्यवान तो विचार ही होते हैं। यही विचार, साहित्य,

विज्ञान, समाज-शास्त्र सभी प्रकार के ज्ञान का निर्माण करते हैं और इन्हीं को साहित्य में से परख कर/ढूँढ कर हम विज्ञापन का निर्माण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए यह विज्ञापन देखिए-

































अब इस विज्ञापन को देख कर आपको कुछ परिचित –परिचित-सा लगा। हाँ, आपने कली और अलि पढ़ कर बिहारी को याद किया होगा। जी हाँ, नहिं पराग नहिं मधुर मधु वाला ही यह दोहा है। लेकिन साहित्य के अध्येताओं को इतनी सरलता से यह बात गले नहीं उतरेगी। यह बात बड़ी बेतुकी और विचित्र भी लग सकती है। इसे हम अपनी परंपरागत साहित्यिक दृष्टि पर आक्रमण ही समझेंगे। हम अब तक इस दोहे के साथ जिस सौन्दर्य दृष्टि को जोड़ते आए हैं, वह जैसे एकाएक कहीं ग़ायब हो जाती है। लेकिन अगर आप सोचेंगे तो इस दोहे के अब तक हुए अर्थ हमारी ज्ञान-संपदा का हिस्सा तो बन ही चुके हैं। इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। वह तो यथावत् है ही। इसमें कोई परिवर्तन तो नहीं होगा। जितनी सूक्ष्मता से हमारे इन कवियों का विश्लेषण हुआ है वह तो हमारे पास सुरक्षित है ही। उसे कोई बदल तो नहीं सकता। पुराने साहित्य को हम नए विमर्शों की दृष्टि से भी देखते-परखते हैं। उससे पुराने विश्लेषण पर कोई खतरा तो नहीं आ जाता। सवाल यह है कि यह हमारी एक पूँजी है जिसे हम अपने लिए नई दृष्टि से उपयोग मे ला सकते हैं। वेदादि तथा पुराणों को हमने भक्ति विमर्श में इस्तेमाल किया फिर उसी को हमने श्रृंगार-चित्रण तथा सत्ता की तरफ़दारी में प्रयुक्त किया। सामग्री वही है पर उसका उपयोग युगानुरूप अलग-अलग ढंग से करते रहे हैं।
इसी तरह एक और प्रसिद्ध दोहा लीजिए- कहत, नटत, रीझत खीजत...... इस दोहे को याद कर के हम सभी का दिल बाग़-बाग़ हो जाता है। इस के मूल विचार तक इसे जब हम रिड्यूस करते हैं , तो हमारी समझ में आ जाता है कि –Privacy in public place. भीड़ के स्थानों पर हमें अपने प्रियजन से संवाद करना है। इसका विस्तार करें तो भीड़ में खोए हुए लोगों को एक दूसरे को खोजना है। आपको यह बताना है कि अब कुंभ के मेले में कोई भाई अपने भाई से जुदा नहीं होगा। यानी कि कहत नटत .... एक मोबाईल का विज्ञापन बन सकता है। आप इसमें समाज के कई अन्य चित्र और संदर्भ जोडते चले जाएं। एक पूरी सीरीज़ बन सकती है विज्ञापन की।

हम सब कहीं-न-कहीं इस बात को समझते हैं कि अब हमारे पाठ्यक्रमों में मध्यकाल को पढ़ने-पढ़ाने वालों की संख्या भी कम होती जा रही है। उसकी उपयोगिता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। अतः हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या पर उसका असर पड़ता जा रहा है। ज़रूरी यह है कि अपने पाठ्यक्रमों के इन यूनिट्स को आज की आवश्यकता के अनुसार ढाल लेना चाहिए। हम यह भी सोचते हैं कि इसका मतलब तो यह हुआ हमें बाज़ार की आवश्यकताओं के सामने क्या घुटने टेक देने चाहिए। लेकिन बात को इस सिरे से नहीं पकड़ना चाहिए। हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि कृति के केन्द्र में तो विचार अथवा भाव ही है। उस विचार के बीज को अगर आप पकड़ सकते हैं, तो आप उसका विनियोग विज्ञापन में कर सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्य पक्ष तथा उसके सामाजिक पक्ष की जानकारी जितनी गहरी होगी उतने बेहतर विज्ञापन आप बना सकते हैं। हैवेल्स का विज्ञापन प्रेमचंद की ईदगाह कहानी ही तो है। वहाँ हामिद और दादी है यहाँ एक बच्चा और उसकी माँ है। हैवेल्स के इस विज्ञापन की संवेदनशीलता के मूल में प्रेमचंद की उस कहानी की संवेदनशीलता ही तो है, जो उस तरह के मेले और उस तरह के बच्चे समाप्त हो जाने पर भी समय के साथ बदल जाती है, किन्तु प्रभावित तो करती ही है।
आपने देखा होगा कि श्रृंगार रस का यह(बिहारी) दोहा सामाजिक जागृति का काम करता है। (अगर इस तरह आप देखेंगे तो) आपको यह भी ध्यान आएगा कि उस समय के कवि समाज के प्रति विमुख तो नहीं थे। क्योंकि कोई भी रचना अपना कंटेंट समाज से ही लेती है। उस समय राजा से प्रजा तक यह बात विद्यमान होगी। लेकिन जिस के सिर पर राष्ट्र की, शासन की, राज्य की ज़िम्मेदारी है वह तो विमुख नहीं ही हो सकता है। लेकिन अगर वही कंटेंट आज भी है , और अगर लोकतंत्र भी है, तो इसका इस्तेमाल हम सामाजिक जागृति के विषयों में कर सकते हैं। साहित्य में देखा जाए तो सामाजिक संदर्भों के ऐसे कूट समाए होते हैं जो हो सकता है कि हमें तत्काल समझ में न आएं, पर परिस्थितियाँ, भूतकाल में रचे साहित्य के वर्तमान अर्थों को खोलने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एक ही कंटेंट को अभिव्यक्ति के भिन्न माध्यमों द्वारा भिन्न अर्थ-स्तरों तक पहुँचते हुए हम देख सकते हैं। रीतिकाल में जो श्रृंगार रस की रचना थी आज विज्ञापन के माध्यम से आप उसके द्वारा सामाजिक जागृति के अर्थ तक पहुँच सकते हैं।
आज बाज़ार में सर्वाधिक अगर कुछ बिकता है तो सौन्दर्य प्रसाधन। रीतिकाल में नायक-नायिकाओं के सौन्दर्य निरूपण एवं अंग-निरूपण के इतने उदाहरण हैं कि सौन्दर्य प्रसाधनों से पटे पड़े बाज़ार में इससे बेहतर और कौन-सा कंटेंट हो सकता है।
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विज्ञापन की दुनिया हमारी वास्तविक दुनिया के इतने क़रीब एक ऐसा मायाजाल रचती है कि हम उसे एक ठोस वास्तविकता के रूप में ही स्वीकारने लगते हैं। विज्ञापन की दुनिया हमारी वास्तविक दुनिया से ही पदार्थ लेती है, वह हमारी इच्छा, स्वप्न तथा आकांक्षाओं पर पलती-बढ़ती है, निर्मित होती है। अतः वह एक तरह से हमारी वास्तविक दुनिया ही है ऐसा कहा जा सकता है। परन्तु यह मायाजाल इसलिए है कि यह दुनिया हमें ऐसे काल्पनिक और कई बार असंभव दुनिया में ले जाने का स्वप्न दिखाती है, जो अक्सर सही नहीं साबित होते , अतः यह मायाजाल है। जैसे कोई भी शैंपू आपके बालों को इतना सशक्त नहीं बनाता कि आप अपने बालों से ट्रैक्टर खींच सकें। या कोई भी साबुन आपको सुंदर नहीं बना सकता अगर आप सुंदर नहीं हैं तो ! या आप अचानक स्वस्थ नहीं बन सकते, चाहे जो खाएं। अतः यह एक प्रकार का मायजाल ही है। पर फिर भी विज्ञापन के बिना आज की दुनिया की कल्पना करना कठिन ही है। ये विज्ञापन हमारे संबंधों, भावनाओं के साथ जुड़ गए-से लगते हैं। समय के साथ हम यह भी देख सकते हैं कि जिन्सों के अलावा अब हमारे तीज-त्यौहार, हमारी पूजा अर्चना, हमारे पारिवारिक व्यवहार तथा संवेदना के मूल्य भी विज्ञापनों के द्वारा ही हमारी स्मृति का द्वार खटखटाते दिखाई पड़ते हैं। अपने काम-काज में व्यस्त बाहरी दुनिया में काम करती पीढ़ी(स्त्री-पुरुष- दोनों ही) को इन विज्ञापनों से ही पता चलता है कि कब करवा चौथ है, कब रक्षा-बंधन और कब गणेश-चतुर्थी। उसे जो कुछ भी करना-कराना है, विज्ञापन ही बताएंगे मसलन उसे तोहफ़े में क्या ले जाना है और कौन-सी मिठाई खानी है।
विज्ञापन हमें प्रभावित करते हैं। चाहे जितना हम उनसे बचना चाहें, पर रेडियो द्वारा, टी.वी द्वारा. सड़क पर लगे होर्डिंग्स द्वारा, अख़बारों, पत्रिकाओं, पैम्फ्लेट, दीवारें.... कितनी ही जगहों के बारे में और तरीकों के बारे में आप सोचें – विज्ञापन तो आपको दिख ही जाएंगे। उत्पाद बेचते विज्ञापन, सरकारी योजनाओं को प्रचारित करते विज्ञापन, विकास की सरकारी नीतियों की ओर ले जाते विज्ञापन .... अर्थात् हमारा पूरा जीवन, हमारी सोच, हमारी भविष्य संबंधी चिंताएं.... सभी को इस दौर में अभिव्यक्त करने का काम विज्ञापन करते हैं।
विज्ञापन अभिव्यक्ति (कॉम्युनिकेशन) का एक अलहदा माध्यम है। और जैसा कि ऊपर कहा गया है वह हम तक उत्पाद, विकास तथा विचार का संप्रेषण करते हैं। उत्पाद तथा विकास ठोस हैं। दृश्यमान है। विचार ठोस तो हो सकते हैं पर दृश्यमान नहीं होते। उत्पाद पदार्थ है, विकास क्रिया है, कार्य है। पर दोनों ठोस हैं, दिखाई पड़ते हैं। विचा,र पदार्थ तथा विकास की तरह नहीं होते। अर्थात् न ही वह पदार्थ की तरह

स्थिर है, न विकास की तरह क्रियाशील ही ।( यही बात साहित्य के बारे में भी कही जा सकती है। लेकिन इनके अंतर के विषय में आगे बात होगी।) परन्तु विज्ञापन के माध्यम से, विचार, ठोस तथा क्रियाशील दोनों ही बन सकता है। विचार उत्पाद में वैचारिकता तथा विकास में ठोसत्व लाने का काम करता है। वह उसमें एक प्रकार का आकर्षण भी उत्पन्न करता है।
साहित्य भी एक प्रकार का संप्रेषण ही है।( एक दृष्टि से वह(साहित्य) स्वयं उत्पाद है।) पर वह न तो पदार्थ का संप्रेषण करता है न ही विकास की क्रियाशील प्रस्तुति करता है। आपके मन में तुरंत यह बात आ सकती है कि रस की चर्चा करते समय रस का उल्लेख पदार्थ की तरह किया गया है। लेकिन रस का पदार्थत्व उत्पाद के पदार्थत्व से भिन्न है। एक का भौतिक तथा दूसरे का अ-भौतिक। अतः साहित्य अ-भौतिक पदार्थों(भाव रसादि एवं छन्द-अलंकारादि) का संप्रेषण करता है। इन सब अ-भौतिक तत्वों से मिल कर वह एक अ-भौतिक पदार्थ बनता है। प्राचीन काल में पांडुलिपियाँ तथा वर्तमान काल में पृष्ठों(कागज़) में निबद्ध उसका उत्पादन असल में उसकी पैकेजिंग है। जो प्रकाशन संस्था जितनी समृद्ध है वह उतना ही बढिया पैकेजिंग करती है।
साहित्य का संबंध मनुष्य की उन वृत्तियों से है जो बाजार में बिकाऊ नहीं हैं। पर इन अ-भौतिक पदार्थों को (भाव-सौन्दर्यादि) समाज में संप्रेषणीय बनाने के लिए साहित्यकार कुछ बिम्ब कुछ चित्र कुछ ऐसे सामाजिक प्रतीकों को चुनता है, जो भौतिक पदार्थों का आकार ग्रहण करते हैं। नायिका की सुन्दरता को चाँद, गुलाब, कमल मछली आदि बताना या लोगों के बीच को संबंधों तथा आशा-निराशाओं वफादारियाँ-धोखेबाज़ियाँ, उत्साह-ईर्ष्या को बताने के लिए पदार्थ-प्रतीकों,प्रसंगों, घटनाओं, मिथकों का उपयोग किया ही जाता है। यही वह स्थान है जब साहित्य की रचनाएं हमारे काम आ सकती हैं। साहित्य में भी भाव-सौन्दर्य का जो ठोस स्वरूप है जिसे बिम्बों,अलंकारों आदि के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है, वह विज्ञापन की संकल्पना निर्माण में बहुत उपयोगी हो सकता है।
विज्ञापन में विचार की संकल्पना के बीज साहित्य की कृतियों में बिखरे पड़े हैं। लेकिन इन बीजों को पकड़ने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम इन बातों को समझ लें-
1-विज्ञापन-निर्माण के बिन्दु
2-विज्ञापन का टार्गेट-ग्रुप

3-विज्ञपित वस्तु, पदार्थ का प्रकार( कैटेगरी)
4-विज्ञापन का माध्यम (पत्र-पत्रिकाएं, दृश्य-श्राव्य आदि)
5- साहित्य कृति में से विचार, संकल्पना को आकारित करने की क्षमता का विकास करना।
6- कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करने की क्षमता को विकसित करना।
7- संकल्पना को ठीक-ठीक भाषा में अभिव्यक्त करने के लिए भाषा की बारीकियों को समझना तथा भाषा का दोष-हीन प्रयोग करने के लिए भाषा-ज्ञान की पूरी जानकारी।
8-साहित्य के सौंदर्य-पक्ष तथा साहित्य के समाज-शास्त्रीय पक्ष की पहचान करना।
हम लोग तो साहित्य के विद्यार्थी हैं, अतः हमें विज्ञापन कैसे बनता है, इसकी तकनीकी जानकारी नहीं होती, यह स्वाभाविक ही है। पर जैसे नाट्यकार के लिए रंगमंच का ज्ञान होना ज़रूरी है, इतना भर कि वह नाटक लिखते समय यह देख सके कि रंगमंच पर लिखा हुआ दृश्य संभव है या नहीं। यानी उसे अपने माध्यम की जानकारी होनी चाहिए ठीक उस स्क्रिप्ट लेखक की तरह जिसे कुछ-कुछ फिल्म टेकनीक का पता होना चाहिए जैसे कि एक अंपायर, चाहे न बल्लेबाजी करता हो न गेंदबाजी, पर उसे क्रिकेट की जानकारी तो होनी ही चाहिए। हम विज्ञापन की कॉपीराइटिंग करने का काम कर सकते हैं। पर कॉपीराइटर के रूप में हमें यह पता होना चाहिए कि इस विज्ञापन का टार्गेट ऑडियंस कौन-सा है। हमारा कंटेंट, हमारी भाषा , हमारा अंदाज़- सभी उस टार्गेट ऑडियन्स पर आधारित होना चाहिए। फिर हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि जिस विज्ञापन के लिए हमें कॉपीराइटिंग करना है, उसकी श्रेणी कौन-सी है। वह व्यावसायिक विज्ञापन है अथवा सामाजिक, राजनैतिक जागृति से संबंधित है अथवा विकास से जुड़ा है। सभी श्रेणियों के विज्ञापन का स्वरूप तथा गौण संरचना अलग होगी। प्राथमिक संरचना तो एक जैसी ही होती है। प्राथमिक संरचना का अर्थ है- प्रत्येक विज्ञापन प्रचार के लिए होता है और संप्रेषणीयता उसकी पहली शर्त है। वह बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि वह प्रभावशाली होना चाहिए। गौण संरचना का अर्थ यह है कि श्रेणियों के अनुरूप भाषा तथा दृश्यों का प्रयोग। वैसे, दृश्य भी विज्ञापनों में भाषा का काम देते हैं। पर दृश्य कैसा होना चाहिए, यह भी विज्ञापन की कॉपीराइटिंग का कच्चा हिस्सा होते हैं।(कच्चा इसलिए कि बाद में उस पर काम होता है।) फिर व्यावसायिक विज्ञापन कई बार श्रेणी बद्ध रूप से तैयार

किए जाते हैं। एक ही विचार या संकल्पना को विभिन्न परिस्थितियों में विकसित किया जाता है। जैसे कोई कवि एक ही बात को विभिन्न बिम्बों के माध्यम से प्रकट करता है। इस बात को हमने कहत नटत वाले उदाहरण से भी देखा ।
विज्ञापन मीडिया के किस माध्यम के द्वारा प्रसारित होना है, उसके आधार पर कॉपीराइटर को अपना काम करना होता है। वह पत्र-पत्रिकाओं में अथवा अख़बार में छपने वाला है अथवा रेडियो से प्रसारित होगा या फिर दृश्य माध्यमों द्वारा पहुँचाया जाने वाला। दृश्य माध्यमों में कम लेखन, श्रव्य माध्यमों में ध्वनि का आधिक्य (संगीत आदि) एवं लेखन तथा प्रकाशित माध्यमों में ज़बरदस्त प्रभावशाली भाषा-प्रयोग- बहुत आवश्यक है। आप अगर हिन्दी में कंप्यूटिंग सीख लेंगे तो आप इन तीनों माध्यमों द्वारा बेहतर विज्ञापन के कॉपीराइटर बन सकेंगे। लेकिन इतना सब करने के लिए भाषा का दोषहीन प्रयोग अथवा भाषा की पूरी जानकारी या सही जानकारी ही आपको अच्छा कॉपीराइटर बना सकेगा। निराला ने छन्द तोड़ने की बात इसलिए की, क्योंकि उन्हें छन्द का ज्ञान था। ठंडा यानी कोका कोला सुनने पर सरल लगता है, पर इस सरलता तक तभी पहुँच सकेंगे जब आप भाषा पर अधिकार रखते हों। कोका कोला तभी कोकाकोला होता है जब वह ठंड़ा होता है। उसका मूल कंसेप्ट साहित्य के विद्यार्थी बेहतर निकाल सकते हैं क्योंकि हमने अपने विभिन्न कोर्सेस में उसे पढ़ रखा है। आप देखिए आपको विज्ञापन के लिए कॉपीराइटर बनाने में साहित्य की बेहतर समझ ही काम आएगी। आप साहित्य के समाजशास्त्रीय पक्ष को तथा सौन्दर्य पक्ष को जितनी गहराई से समझेंगे उतना ही विज्ञापन लेखन में सफल होंगे।
देश की सुरक्षा बिना सैनिकों के संभव नहीं है। सालभर में सैनिकों को हम अलग अलग अवसरों पर याद करते हैं। हमारे कवियों ने ढेरों रचनाएं इन पर लिखी हैं। आप को अगर इस से संबंधित कोई कॉपीराइटिंग करनी हो, तो आप कौन-सी कविता चुनेंगे ? आप जब देखना शुरु करेंगे और कॉपीराइटिंग की दृष्टि से उस पर सोचना आरंभ करेंगे कि संदेश पहुँचे भी, मार्मिक भी हो, दृश्य की दृष्टि से सटीक भी और आपका पढ़ा साहित्य आपके काम भी आए..... तो आप किस कविता को चुनेंगे। आप सोच कर देखिए। क्या पुष्प की अभिलाषा कविता प्रभावशाली होगी... तो बना कर देखिए कोई विज्ञापन। उसका टार्गेट ऑडिएंस कौन-सा होगा, उसकी भाषा कौन-सी होगी, वह किस श्रेणी में आता हे......इत्यादि, इत्यादि।
अब आप देखिए उसने कहा था कहानी है... वह किस प्रकार के विज्ञापन में आपकी मदद कर सकती है। कहानी तो प्रेम की है, उसका बैकड्रॉप युद्ध है.....। आप सोच कर देखिए। इसकी एक प्रोसेस है। प्रेम

आपको क्या देता है- आश्वासन एवं शीतलता। वह आजीवन साथ का आश्वासन देता है। उससे आपका जीवन निश्चिंत हो जाता है। अब इस थीम के आस पास आप एक व्यावसायिक एवं जीवन सुरक्षा का कोई विज्ञापन बना सकते हैं। जीवन सुरक्षा में क्या आता है, यह अब आप सोचिए। बीमा पॉलिसी ? व्यावसायिकता में किस उत्पाद की बात हो सकती है। लेखक ने तो कहानी में लिखा ही है। लहनासिंह क्या खरीदने बाज़ार गया था। अब यह एक कहानी आपको दो श्रेणियों के विज्ञापनों की कॉपीराइटिंग करने में मदद कर सकती है।
' देखा मुझे उस दृष्टि से जो मार खा रोई नहीं...' यह पंक्ति ग्रास रूट के स्तर तक हुए स्त्री –सशक्तिकरण तथा स्त्री जागृति को बताने के लिए कितना प्रभावशाली विज्ञापन बनाने में मददरूप हो सकती है।
पूरा शहर अँधेरे में डूबा है,
शर्माजी के घर उजाला !?! कैसे।
जी हाँ...--------- लैंप का कमाल!
अब बताइए, इस विज्ञापन के मूल में कौन-सी रचना है। (आप भी खरीदिए और एक चाँद अपने घर ले आइए।)
आपको किसी नए वाद्य या किसी म्यूज़िक कंपनी के लिए विज्ञापन बनाना हो तो आप को किस कविता से मदद मिल सकती है ? क्या आप को कुछ याद आता है ? आपको यह बताना है कि यह नया वाद्य सर्वथा नया है, औरों से अलग... तो आप किस कविता के उपयोग के बारे में सोच सकते हैं- इस पर सोचिए। क्या- नव गति नव लय ताल छन्द नव- से आप कुछ बना सकते हैं ?!?
आपने अब तक अंदाज़ा लगा लिया होगा कि अगर हम अपने विषय ( हिन्दी साहित्य) को ठीक से हृदयंगम करेंगे और भाषा पर प्रभुत्व प्राप्त कर सकेंगे तो इस क्षेत्र में हम से अच्छा कॉपीराइटर कहाँ मिलेगा। आप इतिहास पढ़ते हैं, तो सामग्री को एकत्रित करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। आप गद्य-पद्य पढ़ते हैं तो सौन्दर्य तथा समाजशास्त्रीय पक्ष को जानने लगते हैं, आप काव्य-शास्त्र पढ़ते हैं तो संकल्पनाओं का आकलन करना आपको आ जाता है, आप अनुवाद, प्रयोजन मूलक आदि पढ़ते हैं तो सही स्थान पर सही एवं

9498औचित्यपूर्ण शब्द रखने का बोध आपको हो जाता है, मध्यकालीन साहित्य आपको एक सांस्कृतिक आधार देता है, नाटक आपको सिखता है कि समय को सही रूप में कैसे पकड़ें.... यह सभी गुण एक कॉपीराइटर में होना ज़रूरी है।

Monday, 6 June 2011

नए सत्र में स्वागत!

आप लोग जून 2011 से एम.ए पाठ्यक्रम के तीसरे सेमिस्टर मे प्रवेश करेंगे। मैं जानती हूँ अभी आप में से कई लोग सोचेंगे कि अभी पहले सेमिस्टर का तो परिणाम आया नहीं, दूसरे का तो आते-आते आएगा, और आप तीसरे सेमिस्टर में स्वागत कर रही हैं। देखिए, स्वागत तो मुझे करना ही है आप सबका क्योंकि चाहे परिणाम अभी आया नहीं है, पर जब आएगा अच्छा ही आएगा। इस नए सेमिस्टर का पाठ्यक्रम भी क्रमशः मैं आपके लिए ब्लॉग पर रखूंगी ही, परन्तु मुझे लगा कि इस सत्र के पाठ्यक्रम के विषय में कुछ प्रारंभिक बातें हो जाएं।
पिछले दोनों सेमिस्टर में अपके पाठ्यक्रम की पहचान 4 से होती थी। अब अगले दोनों सेमिस्टर में अपके पाठ्यक्रम 5 से पहचाने जाएंगे। अर्थात् सेमिस्टर तीन में आप 501 से 506 तक के पाठ्यक्रम पढेंगे। इस पाठ्यक्रम में आप इतिहास, काव्यशास्त्र तो पढेंगे ही, पर साथ ही प्रयोजनमूलक हिन्दी, दलित/महिला लेखन, तुलनात्मक/विश्व/ प्रादेशिक/प्रवासी/ आदि के चुनाव से रू-ब-रू होंगे। इस बार सेमीनार के कोर्स में हमने जो यूनिट्स डाले हैं उसमें आपके पास विशेष अवसर रहेगा। आपने अब तक जो पढ़ा है अथवा आपके भीतर जो कल्पनाशीलता है उसे अवर मिलेगा कि वह अभिव्यक्त हो। आप को शायद आपके अध्यापकों ने बताय होगा कि अब सेमीनार के कोर्स में अंकों का आबंटन अन्य कोर्स की तरह 70/30 का रहेगा। अर्थात् 70 का बाह्य परीक्षण एवं आंतरिक का 30 अंकों का परीक्षण। प्रस्तुति के लिए शब्द संख्या यथावत रहेगी।
इस वर्ष ऐसे अनेक कोर्स दाखिल किए हैं कि जिन्हें अगर आप ध्यान से सीखेंगे तो यह आपके लिए आजीविका की बेहतर क्षमता प्राप्त करने का अवसर होगा। समय के साथ चलते हुए हमारे विश्वविद्यालय ने हिन्दी का अद्यतन एवं व्यापक पाठ्यक्रम दाखिल किया है। हमारी यह ब्लॉग शिक्षा पद्धति भी उसी नवीनीकरण का एक हिस्सा है। मैं जानती हूँ कि आप लोग लाभान्वित तो हुए हैं। परन्तु आप लोगों की तरफ से जितनी भागीदारी अपेक्षित है, उतनी मिल नहीं रही। मुझे विश्वास है कि इस वर्ष आप अवश्य इसमें अपनी भागीदारी करेंगे।
इस वर्ष का काव्य शास्त्र का पाठ्यक्रम एक तरह से अपनी प्रकृति में तुलनात्मक है। काव्यालोचन के जितने प्रमुख घटक हैं उन पर हम एक साथ भारतीय तथा पाश्चात्य चिंतकों को पढेंगे। जैसे रस-निष्पत्ति तो अपने आप में विलक्षण है। उसके बराबर पाश्चात्य साहित्य में कुछ नहीं मिलेगा। अतः उसे एक अलग यूनिट दिया है। इसके बाद काव्य की समझ के लिए सौन्दर्य, भाषा और छन्द ज़रूरी है, साथ ही सृजन प्रक्रिया । अतः भारतीय तथा पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में कौन से समान बिन्दु हो सकते हैं उसके कुछ अंश को हमने लिया है। सारा लेना तो कठिन ही है। इस समझ के साथ आप यह कोर्स पढेंगे , तो आपके लिए इस पाठ्यक्रम को पढ़ना सरल होगा।
इस बार इतना ही , शेष बाद में।

Thursday, 17 March 2011

कामायनी पुनर्पाठ

(कामायनी को हम विभिन्न दृष्टियों से पढ़ सकते हैं। उसकी कई व्याख्याएं मौजूद हैं। हमारे अपने समय की दृष्टि से यह भी उसकी एक व्याख्या है। नारीवाद में आती सिस्टरहुड की संकल्पना और विस्थापन के विमर्श को भी कामायनी प्रस्तुत करती है। अप इस पर सोचें और अपनी टिप्पणी अवश्य दें)


कोई भी रचना बड़ी इसलिए होती है कि वह हर युग में एक नया अर्थ देती है। इस बात की प्रतीति कामायनी पढ़ कर होती है। अगर मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण कामायनी के कथानक को युगीन संदर्भ से जोड़ते हैं या जिस तरह मुक्तिबोध ने उसकी व्याख्या की है, वह भी उसे अपने समय की मार्क्सवादी चेतना के साथ जोड़ देती है, तो हमारे अपने समय के संदर्भ भी उसमें जुड़े हुए दिखते हैं। इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि इडा के मन में जो अपराध भाव है वह मनु के साथ किए गए उसके अपने अथवा प्रजा के व्यवहार को ले कर नहीं है बल्कि एक अन्य स्त्री उसके कारण दुखी हुई है, यह देख कर होता है। यह इडा और श्रद्धा का एक तरह का बहनापे का भाव है। तभी अपनी संतान को इडा के भरोसे छोड़ कर वह (श्रद्धा) मनु की खोज में चल देती है। वह उसे चिर चढी कहती अवश्य है पर इडा के प्रति किसी विश्वास के कारण ही अपने पुत्र को उसके हवाले भी कर पाती है। यहाँ इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि अंत में जब इडा उस स्थान पर जाती है जहां श्रद्धा और मनु है , तब भी मनु के प्रति किए गए व्यवहार के लिए वह शर्मिन्दा नहीं है पर जहाँ मानव श्रद्धा के अंक में समाता है वहीं इडा श्रद्धा के चरणों में यह कहकर गिरती है कि उससे मिल कर वह कितनी कृतार्थ हुई है। श्रद्धा के प्रति कृतीरथता का बोध और अपने बचपने के प्रति सजगता तथा उसका श्रेय श्रद्धा को देना – एक अद्भुत बहनापे का बोध प्रकट करता है।
कामायनी को पढ़ते हुए मुझे इस बात की भी प्रतीति हुई कि इसमें विस्थापन का विमर्श भी है। मनु हमारा पहला विस्थापित है। देव-संस्कृति का अंतिम प्रतिनिधि और मानव संस्कृति का आरंभकर्ता मनु अपनी इच्छा से विस्थपित नहीं हुआ था। पर विस्थापन के जो अनेक कारण हैं, जिनमें प्राकृतिक आपदा भी एक कारण माना जाता है, मनु उसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हो कर हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठा हुआ अपनी बीती जिन्दगी को याद कर रहा है। वह अपने जीवन को ठीक वैसे ही आरंभ करता है, जैसे वह पहले जी रहा था। वहाँ उसके अलावा कोई था नहीं। अतः इस उम्मीद में कि शायद कोई और हो जीवित उसी की तरह वह अन्न-भाग रखता है। उसके पास कोई नया विकल्प नहीं था , जीवन के किसी नए प्रारूप पर सोचने के लिए कोई कारण या प्रेरणा भी नहीं थी। फिर उसकी भेंट श्रद्धा से होती है। श्रद्धा गंधर्व देश की रहने वाली है , इस उत्सुकता से वहाँ आ पहुँचती है कि – सीख लूं ललित कलाओं का ज्ञान- वह अपने पिता की प्यारी संतान है- अर्थात् अपने घर से किसी मजबूरी में या संकट में या दुखी हो कर नहीं चली थी पर अपने विकास के लिए चल पड़ी थी। विस्थापन का एक कारण यह भी है। इस तरह विस्थापित हो कर जो कहीं और जा कर रहते हैं वे ही प्रवासी भी कहलाते हैं।
श्रद्धा आयी तो थी ललित कलाओं का ज्ञान सीखने पर उसका जीवन किसी और दिशा में मुड़ जाता है। जैसा कि हम आगे चलकर देखते हैं कि मनु बहुत जल्दी ही श्रद्धा से विरत हो कर चला जाता है। वह अपनी इच्छा से , असंतुष्टि के कारण हिमप्रदेश छोड़ कर सारस्वत प्रदेश में आ पहुँचता है। वहाँ वह नव-निर्माण करता है, वर्ण जातियों का निर्माण करता है और फिर अपनी ही वृत्तियों के कारण अपना अंत भी देखता है। फिर एक बार वह वहाँ से चल देता है, परन्तु इस बार पलायन करता है और जैसा कि हम जानते हैं आनंद-लोक को प्राप्त होता है। अपनी अंतिम परिणति को प्राप्त करने तक मनु तीन बार विस्थापित होता है। श्रद्धा भी तीन बार विस्थापित होती है। परन्तु दोनों के कारण अलग-अलग हैं। दोनों के कारणों को अगर देखा जाए तो प्राकृतिक आपदा, नूतन ज्ञान की खोज, व्यक्तिगत अहं, स्वजन की चिंता, लज्जा और एक हद तक लोक भय- इन कारणों से विस्थापन हुआ देखा जा सकता है। अंत में मनु-श्रद्धा जहाँ होते हैं, जिसे अब उज्जवलतम और पावनतम तीर्थ कहा जाने लगा था,वहाँ इडा का सबको ले कर जाना एक तरह का सामूहिक एक्ज़ोडस(स्थानांतरण) ही कहा जा सकता है। इतिहास में प्रजाओं का ऐसा एक्ज़ोडस हुआ भी है। इडा सारस्वत प्रदेश के यात्रियों के साथ इसलिए जाती है कि-

सारस्वत नगर निवासी हम आए यात्रा करने
यह व्यर्थ रक्त – जीवनपट जीवन – पीयूष से भरने।
इस वृषभ-धर्मप्रतिनिधि को उत्सर्ग करेंगे जाकर
चिर-मुक्त रहे यह निर्भय स्वच्छन्द सदा सुख पाकर

इडा भूल से उस प्रदेश में आयी है जहाँ समरसता को प्राप्त श्रद्धा और मनु का निवास है। वह कृतार्थ है। मनु का यह कथन-

देखो कि यहाँ पर कोई भी नहीं पराया
हम अन्य न और कुटुंबी हम केवल एक हमीं हैं
तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ नहीं कमी है।
शापित न यहाँ कोई है तापित पापी न यहाँ हैं
जीवन-वसुधा समतल है समरस है जो कि जहाँ है।

विस्थापित हो कर कहीं जा कर बसने वाले इसी बात के लिए लालायित रहते हैं कि उनका स्वीकार हो। इतने सारे विस्थापनों को भोग कर मनु इस भूमिका पर आते हैं।
इस तरह से इस रचना का यह एक और नया आयाम खुलता है। कामायनी आज अपनी भाषा के कारण नई पीढ़ी को हिन्दी की कम संस्कृत की रचना अधिक लगती है। अपने युगीन, अतः जटिल सौन्दर्यबोध के कारण क्लिष्ट भी लगती है, अतः उसकी टेक्स्ट को पढ़ना बहुत दूभर भी लग सकता है। परन्तु इस बात को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि कामायनी आधुनिक काल की ऐसी महत्वपूर्ण कृति के रूप में उभरती है जिसमें आने वाले युगों में भी नए संदर्भों के होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

कामायनी पुनर्पाठ

(कामायनी को हम विभिन्न दृष्टियों से पढ़ सकते हैं।




कोई भी रचना बड़ी इसलिए होती है कि वह हर युग में एक नया अर्थ देती है। इस बात की प्रतीति कामायनी पढ़ कर होती है। अगर मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण कामायनी के कथानक को युगीन संदर्भ से जोड़ते हैं या जिस तरह मुक्तिबोध ने उसकी व्याख्या की है, वह भी उसे अपने समय की मार्क्सवादी चेतना के साथ जोड़ देती है, तो हमारे अपने समय के संदर्भ भी उसमें जुड़े हुए दिखते हैं। इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि इडा के मन में जो अपराध भाव है वह मनु के साथ किए गए उसके अपने अथवा प्रजा के व्यवहार को ले कर नहीं है बल्कि एक अन्य स्त्री उसके कारण दुखी हुई है, यह देख कर होता है। यह इडा और श्रद्धा का एक तरह का बहनापे का भाव है। तभी अपनी संतान को इडा के भरोसे छोड़ कर वह (श्रद्धा) मनु की खोज में चल देती है। वह उसे चिर चढी कहती अवश्य है पर इडा के प्रति किसी विश्वास के कारण ही अपने पुत्र को उसके हवाले भी कर पाती है। यहाँ इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि अंत में जब इडा उस स्थान पर जाती है जहां श्रद्धा और मनु है , तब भी मनु के प्रति किए गए व्यवहार के लिए वह शर्मिन्दा नहीं है पर जहाँ मानव श्रद्धा के अंक में समाता है वहीं इडा श्रद्धा के चरणों में यह कहकर गिरती है कि उससे मिल कर वह कितनी कृतार्थ हुई है। श्रद्धा के प्रति कृतीरथता का बोध और अपने बचपने के प्रति सजगता तथा उसका श्रेय श्रद्धा को देना – एक अद्भुत बहनापे का बोध प्रकट करता है।
कामायनी को पढ़ते हुए मुझे इस बात की भी प्रतीति हुई कि इसमें विस्थापन का विमर्श भी है। मनु हमारा पहला विस्थापित है। देव-संस्कृति का अंतिम प्रतिनिधि और मानव संस्कृति का आरंभकर्ता मनु अपनी इच्छा से विस्थपित नहीं हुआ था। पर विस्थापन के जो अनेक कारण हैं, जिनमें प्राकृतिक आपदा भी एक कारण माना जाता है, मनु उसी प्राकृतिक आपदा का शिकार हो कर हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठा हुआ अपनी बीती जिन्दगी को याद कर रहा है। वह अपने जीवन को ठीक वैसे ही आरंभ करता है, जैसे वह पहले जी रहा था। वहाँ उसके अलावा कोई था नहीं। अतः इस उम्मीद में कि शायद कोई और हो जीवित उसी की तरह वह अन्न-भाग रखता है। उसके पास कोई नया विकल्प नहीं था , जीवन के किसी नए प्रारूप पर सोचने के लिए कोई कारण या प्रेरणा भी नहीं थी। फिर उसकी भेंट श्रद्धा से होती है। श्रद्धा गंधर्व देश की रहने वाली है , इस उत्सुकता से वहाँ आ पहुँचती है कि – सीख लूं ललित कलाओं का ज्ञान- वह अपने पिता की प्यारी संतान है- अर्थात् अपने घर से किसी मजबूरी में या संकट में या दुखी हो कर नहीं चली थी पर अपने विकास के लिए चल पड़ी थी। विस्थापन का एक कारण यह भी है। इस तरह विस्थापित हो कर जो कहीं और जा कर रहते हैं वे ही प्रवासी भी कहलाते हैं।
श्रद्धा आयी तो थी ललित कलाओं का ज्ञान सीखने पर उसका जीवन किसी और दिशा में मुड़ जाता है। जैसा कि हम आगे चलकर देखते हैं कि मनु बहुत जल्दी ही श्रद्धा से विरत हो कर चला जाता है। वह अपनी इच्छा से , असंतुष्टि के कारण हिमप्रदेश छोड़ कर सारस्वत प्रदेश में आ पहुँचता है। वहाँ वह नव-निर्माण करता है, वर्ण जातियों का निर्माण करता है और फिर अपनी ही वृत्तियों के कारण अपना अंत भी देखता है। फिर एक बार वह वहाँ से चल देता है, परन्तु इस बार पलायन करता है और जैसा कि हम जानते हैं आनंद-लोक को प्राप्त होता है। अपनी अंतिम परिणति को प्राप्त करने तक मनु तीन बार विस्थापित होता है। श्रद्धा भी तीन बार विस्थापित होती है। परन्तु दोनों के कारण अलग-अलग हैं। दोनों के कारणों को अगर देखा जाए तो प्राकृतिक आपदा, नूतन ज्ञान की खोज, व्यक्तिगत अहं, स्वजन की चिंता, लज्जा और एक हद तक लोक भय- इन कारणों से विस्थापन हुआ देखा जा सकता है। अंत में मनु-श्रद्धा जहाँ होते हैं, जिसे अब उज्जवलतम और पावनतम तीर्थ कहा जाने लगा था,वहाँ इडा का सबको ले कर जाना एक तरह का सामूहिक एक्ज़ोडस(स्थानांतरण) ही कहा जा सकता है। इतिहास में प्रजाओं का ऐसा एक्ज़ोडस हुआ भी है। इडा सारस्वत प्रदेश के यात्रियों के साथ इसलिए जाती है कि-


सारस्वत नगर निवासी हम आए यात्रा करने
यह व्यर्थ रक्त – जीवनपट जीवन – पीयूष से भरने।
इस वृषभ-धर्मप्रतिनिधि को उत्सर्ग करेंगे जाकर
चिर-मुक्त रहे यह निर्भय स्वच्छन्द सदा सुख पाकर


इडा भूल से उस प्रदेश में आयी है जहाँ समरसता को प्राप्त श्रद्धा और मनु का निवास है। वह कृतार्थ है। मनु का यह कथन-


देखो कि यहाँ पर कोई भी नहीं पराया
हम अन्य न और कुटुंबी हम केवल एक हमीं हैं
तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ नहीं कमी है।
शापित न यहाँ कोई है तापित पापी न यहाँ हैं
जीवन-वसुधा समतल है समरस है जो कि जहाँ है।


विस्थापित हो कर कहीं जा कर बसने वाले इसी बात के लिए लालायित रहते हैं कि उनका स्वीकार हो। इतने सारे विस्थापनों को भोग कर मनु इस भूमिका पर आते हैं।
इस तरह से इस रचना का यह एक और नया आयाम खुलता है। कामायनी आज अपनी भाषा के कारण नई पीढ़ी को हिन्दी की कम संस्कृत की रचना अधिक लगती है। अपने युगीन, अतः जटिल सौन्दर्यबोध के कारण क्लिष्ट भी लगती है, अतः उसकी टेक्स्ट को पढ़ना बहुत दूभर भी लग सकता है। परन्तु इस बात को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि कामायनी आधुनिक काल की ऐसी महत्वपूर्ण कृति के रूप में उभरती है जिसमें आने वाले युगों में भी नए संदर्भों के होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

Monday, 14 March 2011

कामायनी पर एक टिप्पणी

कई बार लंबे समय के बाद मिलने पर जिस तरह पुराने परिचित आपको बिल्कुल नए और भिन्न लगते हैं और उन्हें वैसा पा कर आपको लगता है कि यह किसी नए व्यक्ति से मिलना हुआ है कुछ इस तरह वर्षों बाद पिछले दिनों कामायनी पढ़ने पर लगा। 1978 में एम.ए द्वितीय वर्ष में अध्ययन करते हुए कामायनी कोर्स में थी। हम लोग बहुत भाग्यवान थे कि डॉ. भोलाभाई पटेल कामायनी पढ़ाते थे। कामायनी का अर्थ कितना समझ में आया था नहीं कह सकती , परन्तु कामायनी का सौन्दर्य अभी भी उनकी अध्यापन मुद्राओं के साथ मन में सजीव है। अच्छे अध्यापक के मार्गदर्शन में अगर कविता पढ़ने को मिल जाए, तो विद्यार्थी जीवन सार्थक हो जाता है।
परन्तु अर्थ की गहराई और विस्तार को उतना ही समझ पाई थी जितना उस समय संभव था। बाद में उसे पढ़ने का कोई अवसर या कारण नहीं था, सो पुरानी सुखद स्मृतियों के साथ कामायनी मेरे भीतर हमेशा जीवित रही। एकाध बार कामायनी के अंग्रेज़ी अनुवाद को पढ़ते हुए उसका कुछ अंश पढ़ा था। तब गुजरात में भूकंप आया था, शहर अव्यवस्थित हो गया था इसलिए सारस्वत प्रदेश का वर्णन मुझे एकदम प्रासंगिक – सा लगा था। तब ऐसे ही उसे पढ़ लिया था।
अभी पिछले दिनों मैंने फिर जब कामायनी पढ़ा तो उसकी कुछ, बल्कि अनेक बातें मुझे बड़ी विलक्षण लगीं। रामचंद्र शुक्ल का चिंतामणी भाग-1 तथा कामायनी का रचना-समय तो एक ही है। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ आलोचक जो आज भी अपने पद से डिगा नहीं है, मनोभावों का विश्लेषण गद्य में कर रहा था और अपने समय का इतना बड़ा कवि उन्हीं मनोभावों को काव्य के सौन्दर्य में वेष्टित कर रहा था। कामायनी और चिंतामणी में कोई समानता है ऐसा मैं नहीं कह रही , परन्तु यह एक विलक्षण बात है कि दोनों ही, एक प्रकार की बात कर रहे थे। एक ही विषय पर चिंतन कर रहे थे। एक में मनोभावों का सामाजिक स्वरूप और भूमिका दृष्टिगोचर होती है और दूसरे में मनोभावों का वैयक्तिक स्वरूप , जो आख़िरकार तो सामाजिक समरसता की बात करता है। कामायनी महाकाव्य में प्रसाद की विशेषता यह है कि उन्होंने इन मनोभावों को छायावादी सौन्दर्य के स्तर पर प्रस्तुत किया है। शुक्लजी के यहाँ मनोभावों का यह चित्रण जितना गुरु-गंभीर और वज़नदार लगता है , प्रसादजी के यहाँ उतना ही सुंदर, शोभामय और प्रीतिकर लगता है। एक ही कंटेंट मानों विभिन्न रूप धारण करता दिखाई पड़ता है। क्या यह अंतर इस बात की ओर इशारा नहीं करता कि मनोभावों का इस तरह विश्लेषण उस युग की अपनी विशेषता बन जाती है। आगे चलकर मनोवैज्ञानिक उपन्यासों का आरंभ भी, जैनेन्द्र, इलाचंद्र जोशी आदि के साथ हो ही जाता है। शुक्लजी पर तो रिचर्ड्स का प्रभाव माना जाता है परन्तु प्रसाद पर किसी का प्रभाव था, यह नहीं कहा जा सकता , यह शोध का विषय है।
गोदान तक आते-आते यह कहा जाने लगा कि उपन्यास महाकाव्य का स्थानापन्न है। क्या ऐसा नहीं लगता कि भाषा-विन्यास को अगर एक क्षण के लिए विस्मृत कर दें तो कामायनी का स्ट्रक्चर औपन्यासिक है। इसमें नाट्यात्मकता भी है, एक औत्सुक्य भी है। कामायनी की कथा जिस तरह गूँथी गई गयी है, एक के बाद एक प्रसंग का आयोजन हुआ है, ऐसा लगता है कि कविता में लिखा एक उपन्यास है। परन्तु ज़ाहिर है कि है तो यह एक महाकाव्य ही , क्योंकि कृति के अंत में जीवन के महान् सत्य को महाकाव्य का नायक(उत्तम कुलोत्पन्न) फल के रूप में प्राप्त करता है। यह महाकाव्य ही है क्योंकि इसका नायक महाकाव्यात्मक श्रेणी का है। इसमें मध्यवर्ग की कोई गाथा नहीं है, बल्कि मनुष्य मात्र की भूलों – उसके अहं, अधिकार भवना का वर्णन, उसके परिणाम और उनसे मुक्ति के उपाय कवि ने दिए हैं। परन्तु फिर भी कामायनी की बुनावट और प्रसंग- आयोजन औपन्यासिक हैं।
महाकाव्य के आरंभ में बाढ़( प्रलय) के उतर जाने के बाद बचे हुए एक मनुष्य का का चित्रण है। देव संस्कृति का शेष बचा हुआ प्रतिनिधि यह पुरुष जिसका नाम मनु है अपने बीते कल की समृद्धि को याद करते हुए चिंता करता है। इस सौरचक्र में आवर्त्तन होता रहता है.... कामायनी के आरंभ में ऐसा ही एक आवर्त्तन हुआ और मनु बच गया है- अकेला। निर्जनता में कही गयी उसकी विषाद-वार्ता को केवल पवन पी रहा है। एकान्त क्रंदन करता हुआ मनु चिंता से भरा हुआ हमारे समक्ष उपस्थित है। अकेलेपन की चिंता और देव-सृष्टि के विलास की स्मृतियां मनु की बेचैनी का मुख्य कारण है। लेकिन फिर प्रलय-निशा का प्रात होता है। कामायनी में मनु की चिंता भरी स्थिति के बाद जिस तरह श्रद्धा की उससे भेंट होती है, श्रद्धा के प्रति उसका आकर्षण , श्रद्धा के मन में मनु के प्रति सहज आकर्षण फिर अकेलापन दूर होने के बाद मनु का और बातों में रुचि लेना, किरात-अकुलि के साथ मिल कर उसी नष्ट हुई देव संस्कृति को फिर जीवित करने का उपक्रम, आरंभिक आकर्षण का क्रमशः कम होते जाना, देव-दंभ तथा अहं और सत्ता-भाव का फिर उदय होना, मानव के जन्म की संभावनाओं के फलस्वरूप श्रद्धा का उसकी तैयारी में लग जाना , मनु का श्रद्धा को उसी के हाल पर (गर्भवती श्रद्धा को)छोड़ कर कहीं दूर चले जाना , इडा के सारस्वत प्रदेश में जा कर नव निर्माण करना, अधिकार भाव को पुष्ट और पुष्टतर करते जाना, प्रजा पर अत्याचार, इडा पर अधिकार जमाना, जन-विद्रोह का सामना करना, श्रद्धा का वहाँ आना, मनु को इस हाल में देखना, मनु का वहाँ से चुपचाप चल देना , श्रद्धा द्वारा इडा के पास मानव को छोड़ कर, मनु की खोज में जाना और तीन लोकों की यात्रा कराते हुए फिर जीवन को जीने की गति में लाना, मानव तथा सारस्वत प्रदेश के लोगों के साथ इडा का मनु और श्रद्धा से मिलना और सामरस्य के संदेश के साथ कृति का अंत होना।
प्रसाद ने सामाजिक समस्याओं को केन्द्र में रखते हुए कंकाल और तितली उपन्यास लिखे। 1936 तक मनोवैज्ञानिक उपन्यास लिखने का आरंभ तो हो चुका था । प्रसाद की मृत्यु बहुत जल्दी हो गई थी। परन्तु कामायनी में क्या एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास का बीज नहीं हैं? हो सकता है कि प्रसाद अगला कोई उपन्यास मनोबैज्ञानिक ही लिखते। हालाँकि यह एक हायपोथिटीकल विधान है, पर ऐसा सोचा तो जा ही सकता है। अहं और अधिकार भाव मनु का निर्माण करते हैं- जिससे उसका विकास और पतन दोनों ही होता है। सारस्वत देश का निर्माण और' सब कुछ मेरा है और मेरे लिए बना है'- का उद्दाम भाव उसके पतन का कारण बनता है। इसमें स्वप्न की टेकनीक का प्रयोग किया गया है। वरना श्रद्धा को उस स्थल तक पहुँचाना कठिन था, जहाँ मनु था। इसमें अपराध भाव है, इडा और मनु दोनों में इसे देखा जा सकता है। श्रद्धा की उपस्थिति से इडा को अपने किए के प्रति अपराध इसलिए होता है कि एक अन्य स्त्री की पीड़ा और दुख में उसकी भूमिका निश्चित ही थी। यह पॉज़िटिव अपराध भाव है जिसके कारण वह मानव की देखभाल करने का तथा पुनः नगर निर्माण की दिशा में बढ़ती है। पर मनु में स्यूडो- अपराध भाव है, जिसके कारण वह पलायन कर जाता है। और फिर यह तीनों लोकों की यात्रा क्या है ? यह श्रद्धा द्वारा मनु का मनोवैज्ञानिक इलाज ही तो है। मनु यथार्थ का सामना नहीं करना चाहता। वह इतना साहसी नहीं है , पर श्रद्धा उसे ढूँढ़ती है और वह सब दिखाती है जो उसने किया और ग़लत था। उसे अपने स्मृति पथ की यात्रा करवाती है। जैसे हिप्नोटीज़ कर के कोई डॉक्टर मरीज़ को उसके अवचेतन के अनेक स्तरों की यात्रा करवाता है , कुछ इस तरह प्रसाद यहाँ करते हैं। पर प्रसाद जब इसे लिख रहे थे तब हिन्दी में मनोविज्ञान अथवा मनोविश्लेषण की थियोरी अभी आयी नहीं थी। फ़ेथ इज़ दी बेस्ट हीलर--- श्रद्धा ही वह काम करवा सकती थी। कामायनी में यह पूरा प्रसंग इसलिए रहस्यमय और दार्शनिक लगता है कि कवि ने उसे वैसा रूप दिया । इसी बात को प्रसाद प्रत्यभिज्ञा के माध्यम से बताते हैं। परम तत्व को देखने के लिए किसी मीडीएटर(मध्यस्थ) की आवश्यकता होती है। प्रत्यभिज्ञा की दृष्टि से श्रद्धा वह मीडिएटर है।
कामायनी अपने आरंभ से ले कर अंत तक प्रत्यभिज्ञा दर्शन से इस तरह आवेष्टित है कि जयशंकर प्रसाद के काव्यत्व के प्रति आदर भाव जागता है। इसमें बड़ी बात यह भी है कि प्रत्यभिज्ञा दर्शन के पूर्ण ज्ञान के अभाव में भी इस काव्य का आनंद उठाया जा सकता है। यहाँ हमें भक्तिकाल की उन रचनाओं का स्मरण आ जाता है जिनके दार्शनिक आधारों को जाने बिना भी काव्य का आनंद उठाया जा सकता है। उदाहरण के लिए सूरदास की रचनाओं को बिना पुष्टिमार्ग के सैद्धांतिक पक्ष के ज्ञान के भी उतनी ही प्रिय लगती है।
प्रत्यभिज्ञा दर्शन या समरसता दर्शन का परिचय कामायनी के प्रथम छन्द से ही हो जाता है। इस संदर्भ में इस उद्धरण को देखा जा सकता है-
कश्मीर के शैवाद्वैत दर्शन के अनुसार चिति या चैतन्य संज्ञक एक आत्मा ही नाना रूपों में (विश्वात्मक रूप में) सर्वत्र विद्यमान है, उस चिति या आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी कहीं भी नहीं है। अस्तित्व है तो केवल आत्म-रूप का हैं। इस कारण जड और चेतन दोनों ही चैतन्य रूप हैं। दोनों प्रकृति में, स्व-भाव में एक-दूसरे से पृथक नहीं है। उनमें अन्तर (भेद) केवल प्रकाश या चैतन्य की मात्रा का है। जैसे नदी संज्ञक परिमित जलराशि सागर संज्ञक अपरिमित जलराशि को पाकर उसमें लय हो जाती है अर्थात् समरसत्व को प्राप्त होती है वैसे ही जड संज्ञक परिच्छिन्न प्रकाश या परिमित चैतन्य चेतन संज्ञक अपरिमित चैतन्य में (साधना, गुरु कृपा, शक्तिपात आदि के द्वारा) लय हो जाता है, समरसीभूत होता है। इस प्रकार जड और चेतन के सामरस्य से सर्वत्र एक ही तत्त्व की स्थिति हो जाती है। सारांश यह है कि कामायनी की आरम्भिक पंक्तियों में महाकवि प्रसाद द्वारा प्रयुक्त जड और चेतन शब्द कश्मीर के शैवागम शास्त्र के पारिभाषिक शब्द हैं तथा वहाँ जो दृश्य है अर्थात् जो जड है वह और जो चेतन द्रष्टा मनु है, दोनों के समरसीभाव से कवि-कथन एक तत्त्व की ही प्रधानता की सत्यता स्पष्ट हो जाती है। (जोशी)
महाकाव्य के आरंभ में ही मनु हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर शिला की शीतल छांह में बैठे प्रलय का प्रवाह देख रहे हैं। ऊपर और नीचे दोनों ही दिशाएँ जल-मग्न हैं- एक तरल है एक सघन उसे चाहे जड़ कहो या चेतन एक ही तत्व प्रधान है- ऐसा कवि कहते हैं। सामान्य व्यक्ति जल के तरल एवं जड रूप के अर्थ में इसका आनंद उठाते हैं। अर्थ-घटन करते हैं। कोई दिक्कत नहीं आती । पर जल चाहे जिस रूप में हो, जड ही है। चेतन तो मनु है । मनु जो दृष्टा है, वह चेतन है। अतः जल एवं मनु दोनों ही एक हैं। लेकिन अभी इसमें श्रद्धा का प्रवेश नहीं हुआ है अतः वह समरसी भाव को प्राप्त नहीं हुआ है।
कवि कहता है - हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छाँह, एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय-प्रवाह। नीचे जल था, ऊपर हिम था एक तरल था, एक सघन, एक तत्त्व की ही प्रधानता कहो उसे जड या चेतन। वे शंका करने वाले कहते हैं कि नीचे जल और ऊपर हिम ये दोनों तो तत्त्वतः एक ही तत्त्व हैं क्योंकि जल और हिम दोनों में जल तत्त्व हैं। हिम के पिघल कर जल बन जाने पर और फिर उस हिम-जल का प्रलय-सागर की विस्तृत, अपरिमित जलराशि में लय हो जाने पर एक तत्त्व की स्थिति सिद्ध हो जाती है, किन्तु हिम और जल का उक्त प्रकार से द्वैत समाप्त हो जाने पर भी उस दृश्य (हिम और जल) का द्रष्टा मनु तो उस दृश्य से पृथक बचा रहता है तब वहाँ कवि-कथित एक तत्त्व की प्रधानता कैसे हुई? दूसरे, वह दृश्य (हिम और जल) तो जड है, किन्तु उस दृश्य का द्रष्टा जो मनु है वह तो चेतन है। इस तरह जड और चेतन का द्वैत विद्यमान रहने पर पर भी ही से जोर देकर कवि के द्वारा एक तत्त्व की प्रधानता बताना पहेली जैसा लगता है। यह शंका एक प्रकार से स्वाभाविक भी है, क्योंकि कामायनी काव्य पर अब तक जितनी टीकाएँ, भाष्य या व्याख्याएँ लिखी गई हैं और जितने शोध-ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं उनमें से किसी में भी उक्त उलझन को सुलझाने का प्रयत्न दृष्टिगत नहीं होता। इसका कारण यह नहीं समझा जाए कि कवि का उपर्युक्त विरोधाभासी कथन महत्त्वपूर्ण नहीं है, इसलिए किसी विद्वान् ने इस पर ध्यान नहीं दिया। ऐसा समझना निश्चय ही भारी भूल होगी, क्योंकि कामायनी का बीज-स्थानीय कवि का कथन वस्तुतः बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसलिए उस पर विचार करना भी आवश्यक है। पहेली जैसा बताये जाने वाले कवि-कथन की स्पष्टता के लिए कामायनी के अन्तिम छन्द में व्यक्त कवि का वह निष्कर्ष सहायक हो सकेगा जिसमें जड और चेतन के समरस होने पर सर्वत्र एक चेतनता को विलसित बताया गया है - समरस थे जड या चेतन सुन्दर साकार बना था चेतनता एक विलसती (जोशी) यहाँ तक आते आते श्रद्धा मनु के भीतर के द्वैत को अद्वैत में बदलने में अपनी भूमिका निभाती है।
कामायनी का कथा विन्यास भी समरसता दर्शन पर आधारित है। प्रथम सर्ग में मनु चिंता से ग्रस्त है। सब कुछ नष्ट हो जाने के बाद मनु पुनः जीवन आरंभ करता है। कथा तो हम सब जानते हैं। परन्तु अंत में इडा सारस्वत नगर के वासियों के साथ मनु और श्रद्धा के पास जाते हैं । मनु सभी को वह दिखाते हैं जिसका दर्शन वे कर चुके थे। यहाँ आनंद का भाव विलसता हुआ दिखाई पड़ता है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन में सामुहिक मुक्ति की बात है। अतः कथा के आरंभ से अंत तक कवि, प्रत्यभिज्ञा दर्शन को अपनी कृति का आधार बनाते हैं।
कई बार यह सवाल भी उठता है कि छायावाद के पंत और प्रसाद दोनों ने दार्शनिक महाकाव्य के रचयिता हैं , पर 'कामायनी' आज भी उतना ही प्रभावित करती है और 'लोकायतन' कितने लोगों ने पढ़ा है , यह एक प्रश्न तब भी था और आज भी है। दर्शन को कथा के साथ काव्य सौन्दर्य के साथ कामायनी में इस तरह घुला दिया गया है कि पढ़ते ही बनता है। फिर मनु के चरित्र का जो आलेखन किया है उससे आप चाहे नारी विमर्श कर लें या मानव विमर्श कह लें – सभी अर्थ प्रकट होते हैं। कामायनी पर कई तरह से विवेचना हुई है। गजानन माधव मुक्तिबोध जब 'कामायनी एक पुनर्विचार' लिखते हैं तब वे सामन्ती शोषण के पक्ष को भी उजागर करते हैं। रमेश कुंतल मेघ- 'कामायनी-एक युटोपिया' अथवा 'अथातो सौन्दर्य जिज्ञासा' अथवा मिथक की दृष्टि से उस पर विचार करते हैं तो कामायनी का एक नया पहलू हमारे सामने आता है। यह एक ऐसी रचना है, जो अपने विचार और सौन्दर्य के कारण हमेशा ही महत्वपूर्ण रहेगी।
रंजना अरगडे